जुलाई 2026

संचयनलघुकथाएँ     Posted: February 1, 2024

1-आँखें

शहर की तमाम सड़कें व्यस्त थीं। चौराहे के बीचोंबीच लाठी थामे, आँखों पर गोल चश्मा डाटे, उस बुड्ढे डोकरे के पास एक युवक अपनी आँखों पर हाथ धरे इधर-उधर डोल रहा था। कुछ बोल रहा था, पर आवाज साफ नहीं थी। अधकचरे शब्दों के साथ उसके मुँह से झाग के कतरे उछल कर बाहर गिर रहे थे, और उनमें लिथड़े अर्थ भी उसी के आस-पास टूट-बिखरकर मरते जा रहे थे।

इस शहर का सम्भ्रान्त इलाका था। बड़े-बड़े, ऊँचे राज करने वाले लोगों का इलाका। युवक हड़बड़ी में था और घबराया हुआ भी।” भटका हुआ है। पागल। अपनी जवानी गारत कर रहा है।” सिपाही ने उसे एक गाली दी और ट्रैफिक में व्यस्त हो गया।

एक क्षण के लिए युवक ने अपनी आँखें खोलीं और फिर मूँद लीं।” शहर में सिर्फ कव्वे हैं और ये मुझे दबोचते जा रहे हैं।” होंठों में बड़बड़ाकर वह ठीक बुड्ढे की लाठी के पास खड़ा हो गया।  इस बार उसने अपने नथुने फुलाकर सिकोड़ लिये और हथेलियों की आँखों पर जोर से कस लिया।

अचानक एक तीखी धारदार चीज उसकी उल्टी हथेलियों से टकराई और मांस की पतली लकीर बाहर लटककर खून के धारें छोड़ने लगी। उसे लगा अब वह सुरक्षित नहीं है। ऐन चौराहे के बीच, इस डोकरे के पास भी। हथेलियों में छेद होते ही उसकी आँखें नोंच ली जाएँगी। तब कुछ भी नहीं देख पाएगा।

उसके चौतरफ पंख फड़फड़ाते हुए काले कव्वे थे, अपनी तीखी चोंच और धारदार पंजों के साथ। डोकरा वर्षों से चुप खड़ा था ऐसी ही, असहाय, कव्वों की फड़फड़ाहट और बीट से ढका हुआ, युवक की आवाज भी खोती जा रही थी। उन आवाजों के बीच। हालाँकि वह चिल्ला अब भी रहा था।

शहर की तमाम सड़कें व्यस्त थीं। चौराहे के बीचोंबीच लाठी थामे, आँखों पर शहर चश्मा डाटे उस बुड्ढे डोकरे के पास एक युवक अपनी आँखों पर हाथ धरे इधर-उधर डोल रहा था। कुछ बोल रहा था, पर आवाज साफ नहीं थी। अधकचरे शब्दों के साथ उसके मुँह से झाग के कतरे उछल कर बाहर गिर रहे थे, और उनमें लिथड़े अर्थ भी उसी के आस-पास टूट-बिखरकर मरते जा रहे थे।

इस शहर का सम्भ्रान्त इलाका था। बड़े-बड़े, ऊँचे राज करने वाले लोगों का इलाका। युवक हड़बड़ी में था और घबराया हुआ भी।” भटका हुआ है। पागल । अपनी जवानी गारत कर रहा है।” सिपाही ने उसे एक गाली दी और ट्रैफिक में व्यस्त हो गया।

एक क्षण के लिए युवक ने अपनी आँखें खोलीं और फिर मूँद लीं।” शहर में सिर्फ कव्वे हैं और ये मुझे दबोचते जा रहे हैं।” होंठों में बड़बड़ाकर वह ठीक बुड्ढे की लाठी के पास खड़ा हो गया। इस बार उसने अपने नथुने फुलाकर सिकोड़ और हथेलियों की आँखों पर जोर से कस लिया।

अचानक एक तीखी धारदार चीज उसकी उल्टी हथेलियों से टकराई और मांस की पतली लकीर बाहर लटककर खून के धारें छोड़ने लगी। उसे लगा अब वह सुरक्षित नहीं है। ऐन चौराहे के बीच, इस डोकरे के पास भी। हथेलियों में छेद होते ही उसकी आँखें नोंच ली जाएँगी। तब कुछ भी नहीं देख पाएगा।

उसके चौतरफ पंख फड़फड़ाते हुए काले कव्वे थे, अपनी तीखी चोंच और धारदार पंजों के साथ। डोकरा वर्षों से चुप खड़ा था ऐसी ही, असहाय, कल्वों की फड़फड़ाहट और बीट से ढका हुआ, युवक की आवाज भी खोती जा रही थी। उन आवाजों के बीच। हालाँकि वह चिल्ला अब भी रहा था।

लेकिन उसकी चिल्लाहट रिरियाहट में बदलकर रह गई थी। वह एक आकार ग्रहण नहीं कर पा रही थी, शब्द नहीं बन पा रही थी।

उसने तमाम कोशिशें कीं। बहुत हाथ-पाँव मारे । एकाध की गर्दनें भी मरोड़ों पर कव्वे रह-रह कर उस पर झपट्टे मार रहे थे।

उसके शरीर के चिथड़े-चिथड़े हो गए। अन्त तक वह अपनी आँखों को बचाने के लिए जूझता रहा, लहूलुहान होता रहा।

कव्वे समझदार थे। वे जानते थे कि आँखें सबसे बाद में निकालनी चाहिए और अब सिर्फ आँखें बची थीं।

इस बार कव्वों ने एक साथ अपने पंख फड़फड़ाए। अपनी चोंचों को बुड्ढे की लाठी से रगड़कर धार तेज की। मुँह ऊपर उठाकर काँव-काँव की आवाज की और एक झपट्टे के साथ उस पर टूट पड़े।

युवक की आँखों के कोटरों में उनकी चोंच एक साथ धँसीं और वापस

लौट आईं। उन्हें आश्चर्य हुआ आँखें कहाँ गईं ? क्योंकि आँखें वहाँ नहीं थीं।

आँखें ऊपर, बहुत ऊपर डोल रही थीं। कव्वों की पहुँच से बहुत परे। हँसती हुई।

तब से शहर भर में कव्वे मंडरा रहे हैं।

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2-आवारा

माँ ने उसे पैदा किया क्योंकि पिता भी यही चाहते थे। दोनों ने पालपोसकर बड़ा किया।

अब वह बड़ा हो गया था; लेकिन उसने वह सब नहीं किया, जो अब तक सब करते आए थे। उसने वह सब किया, जो अब तक घर-परिवार में किसी ने नहीं किया। उसने कहा- मैं अपने ढंग से अपना जीवन जिऊँगा। जो अच्छा लगेगा, वह करूँगा।” लोगों ने उसके पिता से कहा- ‘‘यह आवारा हो गया।’’ पिता ने माँ से। माँ ने भाइयों से और भाइयों ने फिर सबसे । अब वह परिवार के लिए खतरा था। अशुभ था।

“हमारी बेटी को नींद नहीं आती, क्योंकि वह रोज उसके सपने में आता है।” एक दिन पड़ोसी ने उसके पिता से कहा।

बात चारों तरफ फैल गई। उसे देश निकाला दे दिया गया। जब से वह लड़की ही नहीं, सबके सपने में आने लगा।

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3-आईना
आले में आईना रखा रहता। धुँधला,पर हाथ फेरते ही एकदम साफ पिता रोज सवेरे उसके सामने खड़े हो जाते और आहिस्ता–आहिस्ता अपनी दाढ़ी बनाते। सब–कुछ एक ही क्रम में। वह आईना पिता का आईना था। वे सब उसे पिता का आईना कहकर पुकारते, क्योंकि वे किसी को उसे हाथ नहीं लगाने देते थे। कई बार उनकी अनुपस्थिति में वह आईने के सामने खड़े होकर खुद को देखता तो उसमें उसकी जगह पिता का चेहरा तैरने लगता। वह घबराकर वहाँ से हट जाता।
‘जब मैं बड़ा हो जाऊँगा।’ वह सोचता।
‘इस आईने में जरूर कोई खास बात है।’ मन में गुनगुनाता।
‘बड़े हो जाओ तब तुम भी इससे अपनी दाढ़ी बनाना। वह तुम्हारे दादा का है।’ एक दिन पिता ने उससे कहा।
‘पिता का आईना।’ वह हैरान होकर उसे बार–बार छूतां
अपने अन्तिम दिनों में पिता को कम सूझने लगा था। सब–कुछ धुँधला–धुँधला। लेकिन सुबह–सवेरे का क्रम कभी भंग नहीं हुआ। वे निश्चित समय आईने के सामने जाकर खड़े हो जाते। उसे अपनी बंडी से रगड़कर साफ करते और ब्रश से झाग उपजाकर धीरे–धीरे दाढ़ी बनाते।
एक दिन पिता चल बसे। उसके न आँसू आए न वह दहाड़ मारकर रोया। वह सिर्फ़ सन्न–सा सब देखता रहा और चुप हो गया। बहुत कोशिश की, पर आँसू का एक कतरा बाहर नहीं निकला। परिवार के लोग हैरानी से उसे देखते रहे थे।
अब वह बड़ा हो गया था। पता ही नहीं चला धीरे–धीरे कब उसने पिता का स्थान ले लिया। रोज सवेरे उसी तरह उसी आईने के सामने खड़ा होकर दाढ़ीी बनाता। शुरू–शुरू में उसमें से झाँकता पिता का चेहरा दिखाई देता। वह डर जाता। धीरे–धीरे उसका और पिता का चेहरा एकमेक हो गया। कई बार वह तय नहीं कर पता कि वह पिता की दाढ़ी बना रहा है या अपनी।
‘तू अभी बच्चा है।’ कभी ब्लेड से कट लग जाता तो पिता आईने से निकलकर कहते।
‘तुम ठीक अपने पिता पर गए हो। तुम्हारा चेहरा, हाव–भाव, आदतें सब कुछ वैसे हीहैं। यकीन न हो तो फोटो से मिलान करके देख लो।’ पत्नी अक्सर मजाक करती।
उस दिन वह देर से उठा था। पिछले कुछ दिनों से आँखों से धुँधला दिखाई देने लगा था। आईना भी वैसा ही हो गया था। लेकिन हाथ इतने अभ्यस्त हो गए थे कि बिना आईना देखे वह दाढ़ी बना लेता था।
उस दिन देर रात तक नींद नहीं आई थी। सुबह–सवेरे उनींदे की हालत में आईने तक गया। वह वहीं रखा था, जहाँ रोज रहता था। पर आज उसके हाथ जाने क्यों काँप रहे थे। गालों पर साबुन के झाग लथेड़कर उसने आईना उठाया और बनियान से पोंछा। इसी बीच हाथ से फिसलकर आईना फर्श पर कई टुकड़ों में बिखर गया।
वह थर–थर काँपने लगा और वहीं बैठकर जोर से रोने लगा जैसे उसके पिता आज मरे हों।

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4-विनिता
विनिता की शक्ल कैसी है? कहाँ रहती है? कोई विनिता सचमुच है भी या नहीं? या यह भी तुम्हारी और बातों कीतरह एक गप है?
जब भी कोई दोस्त उससे पूछता, तो वह उदास हो उठता; विनिता का नाम ही ऐसा था कि मौसम अच्छा हो, मौसम खराब हो, सबको वह विनिता से जोड़कर देखता।
शराब का एक पैग अंदर जाते ही वह दोस्तों से परे हटकर एक अकेला विनिता का नाम लेकर घण्टों जाने क्या बड़बड़ाता रहता।
बरसों बीत गए।
उम्र उसे देखती रही। वह बूढ़ा हो गया, पर विनिता अब भी वैसे ही थी। उम्र की कोई खरोंच उसके चेहरे पर नहीं आई थी। वह अब भी बीस–बाइस साल की लड़की में विनिता को ढूँढ़ता। वह रोज उसके सपनों में आती। रात के अँधेरे में धीमे से उसके बगल में आकर लेट जाती और उसे चूमती। ठीक वैसे ही, जैसे बीस बरस की उम्र में चूमा था।
आँखें मूँदे वह चुप लेटा रहता था। यह सपना नहीं, सच होता। सुबह वह ताजादम उठता। विनिता की गंध सराबोर कर देती और समूचे दिन उस गंध में लिपटा वह उड़ा–उड़ा फिरता।
‘इसकी टाँगें विनिता जैसी है।’ किसी लड़ी को देखकर वह कहता।
‘अरे, यह बालों की लट। पूछो मत, हूबहू है।’ कहकर किसी दूसरी लड़की के पीछे चल देता।
महीनों तक शाम पाँच बज एक लड़की को उसके दोपहर दफ्तर से छूटने पर पीछे–पीछे अकेले रोज उसके घर तक छोड़ने जाता रहा, क्योंकि उसमें विनिता की कई खूबियाँ थीं।
उसे पसंद आती उन तमाम सुंदर लड़कियों में विनिता की कोई–न–कोई विशेषता जरूर होती और वह विस्तार से उनकी विशेषताओं का बखान करते हुए विनिता से मिलान करता।
विनिता है भी या नहीं। कभी थी भी या नहीं। दोस्तों को ताज्जुब होता, क्योंकि उसका कोई चि उन्हें कभी दिखाई नहीं दिया। फिर वे उस पर अविश्वास यों कैसे करते!
इसी तरह एक दिन उसका अंतिम समय आ गया।
‘अब तो विनिता जरूर आएगी।’ दोस्तों ने सोचा, क्योंकि अब भी वह उसी की बातें कर रहा था।
और एक दिन वह मर गया। अंतिम समय उसके मुँह से सिफ‍र् एक वाक्य निकला, ‘‘अच्छा, तो अलविदा विनिता!’’
लोगों ने अगल–बगल झाँककर देखा, वहाँ कोई विनिता नहीं थी।
क्या सचमुच कभी कोई विनिता थी?
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5-रोटी
उसका सिर गोलमटोल था। पतली–दुबली कायां हवा के संगे उड़ते बिखरे बाल। आँखें जाने क्या–कुछ खोजतीं–सी।
चौदह–पन्द्रह की उमर रही होगी। मूँछों के भूरे रोएँ काले होने लगे थे।
वह लगातार चुप रहता था। उसकी चुप्पी देखकर कई बार घरवाले डर जाते।
एक दिन वह गाँव से भागकर शहर आ गया।
न थाने में रपट लिखाई गई, न गुमशुदगी के परचे छपे, दो–तीन दिन बाट देखकर घरवाले जैसे थे, फिर वैसे ही हो गए। माँ जरूर छुपकर याद करके रो लेती थी।
वह दिन–भर काम की तलाश में भटकता। पर काम कहीं भी नहीं था। रात होने से पहले पस्त हो जाता और कहीं भी गोड़ों में माथा देकर पड़ जाता–अगले दिन तक।
दिन फिर उगता। सपनों के साथ। उसे रोज भाँत– भाँत की रोटियों के सपने आते। आँख खुलते ही वह उनके पीछे दौड़ पड़ता। दौड़ता–हाँफता फिर कहीं भी गिर जाता।
रोटी के पीछे लपकते–लपकते वह बूढ़ा हो गया। पर सपने अब भी वैसे ही आते–रोटियों और रोटियों के।
और एक दिन वह मर गया। अपनी मृत्यु से ठीक पहले उसने बताया कि कुछ दिनों से उसे रोटी के सपने आने बंद हो गए थे। और यही उसकी मौत का कारण बना।
सपने
वह अकेला था।
वह रोज सपने देखता था।
वह अक्सर भीड़ में गुम जाता। उसमें भटकता।
वह सपनों से इतना तंग आ गया था कि रात–रातभर जागता रहता, ताकि सपने न आएँ।
लोग उसका मजाक उड़ाते थे।
वह लोगों की परवाह नहीं करता था।
वह अकेला रहता था।
जब लोग फालतू या जरूरी कामों में इधर–उधर सड़कों पर, बाजारों में भागते–दौड़ते, तब अतिव्यस्त उन लोगों को घण्टों आँखें खोले, डरते–डरते देखता रहता। कई बार एक–एक को रोककर पूछता–‘‘क्या आपको सपने नहीं आते? क्या आप सपने नहीं देखते?’’
लोग उसका मजाक उड़ाकर आगे बढ़ जाते।
चूँकि वह तमाम उम्र सपने देखता रहा, उसकी आँखों में नींद कभी नहीं आई।
एक दिन वह इसी भीड़ के बीच सपनों के बारे में पूछता हुआ मर गया। पर उसकी आँखें तब भी खुली थीं।
क्या वह अब भी सपने देख रहा था?
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