
“झूठ बोलना पाप है”- छवि ने ब्लैकबोर्ड पर लिखा और पूरी कक्षा को एक- एक शब्द पढ़ना सिखाया, बार- बार दोहराया। सभी बच्चे उसके पीछे पीछे बार बार दोहराने लगे- ‘‘झूठ बोलना पाप है, झूठ बोलना पाप है….’’
कक्षा के शोर में छवि के अंदर से कभी एक अध्यापिका, कभी एक माँ, और कभी एक पत्नी बाहर निकलकर हँसने लगीं..
“झूठ बोलना पाप है? और तू? तू तो सबसे बड़ी पापी है। स्कूल देर से पहुँचने पर झूठ बोलती है…जी सर…बेटे की तबियत खराब हो गई थी….घर में झूठ बोलती है कि ट्रैफिक में फँस गई थी; इसलिए देर हो गई…..फ़िल्म देखने जाती है, तो बेटे से झूठ बोलती है, डॉक्टर के पास जा रही हूँ।”
छवि को ग्लानिबोध होने लगा। क्यों वह किसी को भी संतुष्ट नहीं रख पाती? क्यों उसे स्कूल में रहते हुए घर पर मन रखा रहने का और घर में रहते हुए स्कूल में मन रखा रहने का अपराधभाव हरदम सताता रहता है? पिछले महीने प्रिंसिपल से उसने एक एक्स्ट्रा छुट्टी माँगी थी। प्रिंसिपल ने साफ मना कर दिया था, “आपकी सारी सी एल खत्म हो चुकी हैं। आपके बीमार पति को देखने वाले और लोग घर पर नहीं है क्या ?” घर पर सास अपने बीमार बेटे की तीमारदारी करने के कारण मुँह फुलाकर बैठीं थीं, “नौकरी ज्यादा प्रिय है, छुट्टी नहीं ले सकती महारानी।”
यह तो एक उदाहरण है। प्रतिदिन उसे इसी खींचतान में सामंजस्य बिठाना पड़ता है। इस तनाव से बचने के लिए यदि वो कभी-कभार अपनी महिला सहकर्मियों के साथ घूमने चली जाए तो आफत ही आ जाती है। सबको खुश रखने की कोशिश करते- करते उसकी स्वयं की खुशी कहाँ गुम हो गई, किसी को ख़्याल भी है? छवि की आँखें नम हो आई।
बच्चे इतनी देर में शोर करने लगे, तो छवि अपनी तंद्रा से बाहर आई। उसने गहरी साँस छोड़ी। कमरे में घुटन बढ़ जाए, तो साँस लेने के लिये खिड़की खोल लेना चाहिए। ब्लैकबोर्ड पर उसने दूसरी पंक्ति लिखी और कहा-
“बच्चो !, अब पढ़ो….किसी की जान बचाने के लिये बोला गया झूठ, पाप नहीं है…”
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