
“ये क्या है प्रिया?…यह तू क्या बनाने लगी है? काला आकाश, बिना पत्तों वाला भूरा पेड़, मटमैली घरती…कहाँ गए तेरे गुलाबी फूल और सतरंगी तितलियाँ?..ये क्या करने लगी है आजकल? पहले की तरह लाल, पीले, हरे, नीले चटक रंग क्यों नहीं लगाती अपनी पैंटिंग्स में?”
गुमसुम प्रिया ने उदास आँखों से मम्मी की ओर देखा, बोली कुछ नहीं. आँखों के कोने गीले हो उठे. मम्मी बिना उसकी ओर देखे बोली।
“बेटा, चटक ख़ूब चटक रंग भर इसमें. तभी तो तेरी पेंटिंग खिलेगी. जा अपने अंकल को भी दिखा दे।”
“अंकल! नहीं- नहीं.” वह सकपका उठी ।
मम्मी पलटकर किचन में चली गई और बदरंग पेंटिंग हाथ में लिए गुमसुम उदास खड़ी रह गई प्रिया।
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