गढ़वाली अनुवादः डॉ. कविता भट्ट
बरात द्वार तकैं पौंछी ई छै की नौना का भाय्यों न पटाखा फ्वड़ सुरु करि देन। तीस–तीस रूप्या का एक–एक एटम बम……धाय…..धाँय। नसा म धुत्त बरतियों का तेवर देखिक नौनी का बुबा ब्रजनाथ जी की हालत खराब छै अर वु हाथ जोड़िक खडू ह्वे गेन।
वे गौं माँ वे हि समैं थोड़ी इ दूर सेठ मदन लालै की हवेली पर पहुँचदु इ डाक्ओं न द्वी–चार हवाई फायर करिन। सेठ पसीना–पसीना कौंपिक जोड़िक खडू ह्वे गेन, ‘‘जु चैणु च ली जावा…. बस हमरी जान बगसि द्यावा।’’ डाक्ओं कु सरदार चिल्लै, ‘‘वीरू, चन्दू…राधे…. फटाफट करा, भांडा-कूंडा जु बि मिलु…. फटाफट, फाँचि बाँधी ल्या अर तुरंत निकळी ल्या…’’
गौं म डाका पड़णै की खबर ब्यो वळा घौर बि पौंछि गे छै।
बरतियों माँ बि हड़बड़ी मच गे।
‘‘पंडित जी जल्दी करा…. रघु…. सत्तू… विजय….. फटाफट दैजा कु सामान बाँधा…. भांडा- कूंडा जु कुछ बि च, छुट्यूँ – पुट्यूँ सब समेटा… फाँचौं माँ इ बाँधी ल्या अर निकळी ल्या…’’
ऊँनाँ डाक्ओं कु सरदार चिल्लाणू छौ, ‘‘सेठ। ! रुप्या , गैणा तगाता अफ्वी फटाफट भैर गाड़।’’ अर सेठ जी कौंपि कौंपि क वेकी बात माणी क उन्नि कन्ना छा।
‘‘बधै हो ब्रजनाथ जी!…फेरा भौंरा बि ह्वे गेनि …. अब जरा
गैणा – तगाता अर रुप्या , बि फटाफट दी द्यावा । समैं बडू खराब च । हम थैं अँधेरा माँ इ गैणों की छाँ माँ इ निकळियूँ चैंदु।’’
ऊँनाँ डाक्ओं कु सरदार सिंह बुन्नु छौ , ‘‘दगड्यौं ! याँ सि पैलि कि क्वी मुसीबत खड़ी ह्वे जाउ, हम थैं सुबेर होण से पैलि अँधेरा माँ इ निकळियूँ चैंदु।’’……।’’
डाक्ओं न जांदी बगत दुबरा हवाई फायर करिन। उंका जान्दू इ सेठ जी अर ऊँकु लुट्यूँ–पिट्यूं परिवार रूंण बैठि ग्याई।
डोला चली त एक बार दुबरा बैंड खड़खड़ाण लगि गेन। डोला जांदु इ ब्रजनाथ अर ऊँकि कुटुमदारी
वळा खाली–खाली घौर देखिक उस्कण लगी गेन। जमा रुप्या-पैसा अर ‘लक्ष्मी’ सब कुछ चलि गे।
थोड़ी इ देर म गौं माँ पुलिस ऐ ग्याई । लेकिन पता नि किलै पुलिसौ कु एक बि आदिम ब्रजनाथ जी का घौर नि आई।
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