1-चुइंगम

‘हाँ तो अभी आपने देखा, पीडित महिला ने बताया कि किस तरह वह शाम को खेत से काम करके लौट रही थी और किस तरह पाँच बदमाशों ने उसे दबोच लिया।’ टीवी संवाददाता बडे जोश के साथ बता रहा था।
चौबीस घंटे चैनल का पेट भरने के लिए डबलरोटी का बड़ा टुकड़ा उसे मिल गया था< जिसे कुतर-कुतर कर पूरी रात चबाते रहना था।
‘बिल्कुल प्रमोद, आप बने रहिए वहीं, हम थोडी देर में फिर आपके पास लौटेंगे।’ सीधे प्रसारण को बीच में रोकते हुए स्टूडियो में बैठे सूत्रधार ने संवाददाता से कहा, फिर दर्शकों से मुखातिब होकर बोला-‘जाइएगा नहीं, आगे हम जानेंगें किस प्रकार पीडित आदिवासी महिला ने बहादुरी के साथ अकेले बदमाशों का सामना किया लेकिन अपनी आबरु बचाने में नाकायमाब रही। प्रशासन और राजनेताओं से भी पूछेंगे कि इसी घटनाओं के लिए कौन जिम्मेदार है और इन्हे रोकने के लिए उनके स्तर पर क्या प्रयास किए जा रहे हैं,लेकिन फिलहाल एक छोटा-सा ब्रेक।’
उधर टीवी स्क्रीन पर अभिनेत्री ने साबुन बेचने के लिए अपनी देह को मोहक मुस्कान बिखेरते हुए सहलाने लगी इधर एक बच्चे ने रिमोट का बटन दबा दिया। दूसरे चैनल पर संवाददाता और सूत्रधार एक बडी और रसीली चुइंगम चबा रहे थे।
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2-घुलती पृथ्वी
बहूमूल्य रत्नों के व्यापारी ने अपनी बिटिया के विवाह के उपलक्ष्य में भव्य आशीर्वाद समारोह का आयोजन किया था । ऐसा लग रहा था, रत्नों की सारी चमक पंडाल में उतर आई हो।
तथाकथित बडे लोग पंडाल के अंदर अपने भरे हुए पेटों को और भरने की असफल कोशिश कर रहे थे। बाहर कुछ छोटे लोग भव्य समारोह के विरोध में प्रदर्शन कर रहे थे।
इन बड़े और छोटे लोगों से अलग बैठा छीतू यह समझ पाने में असमर्थ था कि बड़े लोगों के आयोजन पर ये छोटे लोग नारे क्यों लगा रहे हैं। क्या मिलेगा उन्हे ऐसा करके, क्यों नहीं वे नारे लगाना छोड़कर पंडाल के पीछे चले आते ? कम से कम आज तो उन्हें ऐसा लजीज खाना मिल जाएगा, जिसका स्वाद कई हफ़्तों तक जुबान पर बना रहेगा।
तभी एक व्यक्ति पंडाल के पिछवाड़े आया और बाल्टी भर खाना वहाँ उडेल गया। इससे पहले कि छीतू के पास बैठा कुत्ता भोजन पर झपटता, उसने फेंके गए भोजन से लड्डू उठाकर तुरंत मुँह में रख लिया।
छीतू को लगा जैसे उसनें लड्डू नहीं; बल्कि पूरी पृथ्वी को अंपने मुँह में कैद कर लिया हो और दुनिया भर की मिठास उसके हलक से नीचे उतरती जा रही हो।
पंडाल के सामने नारे बदस्तूर जारी थे। अंदर टेबलों पर पकवानों की नई प्लेटें सजाई जा रही थीं; लेकिन छीतू के मुँह में कैद पृथ्वी अब तक पूरी तरह घुल चुकी थी।
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3-रंग- बेरंग
छब्बीस जनवरी से लेकर पन्द्रह अगस्त जैसे त्योहारों पर वह आशा करता रहता था कि शायद इस बार उसकी दुकान से तिरंगे के कपड़ों के थान बिक जाएँ, लेकिन ऐसा होता नही था। लोग बने-बनाए झंडे खादी भंडार से खरीद लिया करते थे।
लेकिन इस बार कुछ विचित्र घटा। एक बूढा व्यक्ति, जिसके बारे में लोग सिर्फ इतना जानते थे कि वह सिलाई वगैरह करके अपना गुजारा करता रहा है , उसकी दुकान पर आया और केसरिया रंग का पूरा थान खरीद ले गया। दुकानदार को बडी खुशी हुई कि उसका बेकार पड़ा कुछ माल तो बिका।
कुछ दिनों बाद वही बूढा व्यक्ति पुन: उसकी दुकान पर आया और उसने हरे रंग के कपडे की माँग की और पूरा हरे रंग का थान खरीद लिया। दुकानदार बडा प्रसन्न हुआ। अगले हफ्ते उसने देखा शहर के हर गली-मोहल्ले में हरे और केसरिया रंग के झंडे-झंडियाँ लहरा रहे थे।
किंतु एक दिन अचानक सारे शहर में लाल ही लाल रंग बिखर गया। दंगे भड़क गए थे। कर्फ्यू लगा। सेना आई। राजनीतिक शतरंज खेला गया। और फिर अंतत: शांति के दौरान कर्फ्यू में कुछ समय के लिए छूट भी दी गई।
दुकानदार ने छूट के दौरान अपनी दुकान भी खोली। वही बूढा पुन: उसकी दुकान पर उपस्थित हुआ। इस बार उसने दुकानदार से दो मीटर सफेद कपडे की माँग की। दुकानदार को आश्चर्य हुआ,पूरा थान खरीदने वाले बूढे से जिज्ञासावश उसने पूछ लिया-‘क्यों बाबा< अबकी बार सिर्फ इतना ही? क्या पूरा थान नही खरीदोगे?’
बूढा फफककर रो पड़ा, बोला-‘यह कपड़ा तो मैं अपने पोते के लिए खरीद रहा हूँ बेटा, जो कल के दंगों की चपेट में आ गया…।’
कुछ ही घंटों में दुकानदार का सफेद कपड़े का थान भी बिक गया, दो-दो मीटर के टुकडों में कट कर।
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4-लूट
‘पुराने अखबार की रद्दी क्या भाव लोगे भैया?’ सडक से गुजरते पुराना सामान खरीदने वाले की आवाज सुनकर मैडम ने पुकारा।
‘चार रुपये किलो ले लेंगें मैडम ।’ अटालेवाले ने कहा ।
‘यह तो बडी लूट है भैया। बडे शॉपिंग मॉल वाले तो पच्चीस रुपये किलो में खरीद रहें हैं ,और बदले में डिस्काउण्ट कूपन भी दे रहें हैं ।’
‘बहनजी, वहां आपको चार गुना अधिक कीमत का सामान भी तो खरीदना पड़ता है । हमें तो बच्चे भी पालना हैं, झूठ नहीं बोलेंगें, एक किलो की रद्दी पर केवल पचास पैसे बचते हैं । अटालेवाले नें स्पष्ट किया ।
‘तो जाने दो भैया, रद्दी नहीं है अभी ।’
शाम को मैडम पच्चीस किलो पुराने अखबार कार में भरकर एक लीटर पेट्रोल फूंककर बडे शॉपिंग मॉल में बेच आर्ईं। बदले में चार हजार रुपयों का बहुत सारा सामान खरीद लाई, जिसकी अभी फिलहाल कोई आवश्यकता ही नहीं थी ।
मैडम को इस बात से कोई लेना देना नहीं था कि अपनी जरूरतों की पूर्ति के लिये अटाले वाले को उस दिन कितनी अधिक कॉलोनियों में कितनी अधिक फेरियाँ लगानी पडी थीं ।
दूसरे दिन किटी पार्टी में अन्य मैडमों को बडे गर्व से उन्होनें बताया कि किस तरह कल उन्होंने बड़ा किफायती सौदा किया और रद्दी के भाव बाजार लूट लिया ।
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5-विश्वास
भगवान महावीर की विशाल प्रतिमा को प्रणाम करके मंदिर से बाहर आकर भारतीदेवी धीरे-धीरे अपने घर की ओर बढने लगी। सत्तर वर्ष की विदुषी का यह नित्य कर्म था। शायद ही कभी ऐसा कोई दिन रहा हो जब उन्होने मन्दिर जाए बगैर कभी भोजन किया हो। जब से इस कॉलोनी के मकान मे रहने आए, वे अकेले ही दर्शन को चली आती हैं । यह बड़ा अच्छा रहा कि यहाँ पहले से मंदिर बना हुआ था अन्यथा शहर के मकान से तो किसी को रोज साथ लेकर ही जाना पड़ता था।
अपने विचारों मे डूबीं वे मंदिर से कोई सौ कदम आगे जैसे ही अपनी गली मे दाखिल होने के लिए मुड़ने लगीं, सामने से मोटर साइकिल पर दो पुलिस जवान आते दिखाई दिए। दोनों बड़ी हड़बडी और जल्दबाजी मे लग रहे थे। न्होने भारतीदेवी के समीप आकर अपनी बॉइक रोक दी और कहने लगे -‘ माताजी कुछ खबर है कि नही, इसी गली में पुष्पा मेडम की किसी ने हत्या कर दी है, डाका भी पड़ा है, जरा सावधान रहना़ और हाँ, ये आपके कंगन,चैन भी निकालकर अलग रख लो, कहीं भगदड़ मे कोई झपट न ले।’
पुष्पा मेडम की हत्या ! भारतीदेवी हतप्रभ रह गईं , अरे वह तो उनकी पड़ोसी है़ ! सुधबुध खोकर वे गले में पहनी चैन खोलकर जल्दी-जल्दी हाथों के कंगन उतारने लगीं। एक पुलिसकर्मी ने उनके गहने लेकर अपने रुमाल में लपेटकर भारतीदेवी को थमा दिए । इसके पहले कि वे गहनों की पोटली अपने पल्लु में बाँधतीं, बाइक चौराहे की ओर तेजी से दौड़ गई।
कुछ देर बाद भारतीदेवी ने अपने को सँभाला< तो आशंका से भर गईं कि कहीं वे भी उन ठगों का शिकार तो नहीं हो गईं हैं, जो पुलिस बनकर बुजुर्ग महिलाओं को अपना निशाना बनाते रहे हैं ।
तुरंत पोटली खोलकर देखी,सचमुच रुमाल में लोहे की चूड़ियाँ तथा तार के टुकडे बँधे हुए थे। वे चीख पड़ीं। माथे पर पसीने की बूँदें उभर आईं, लगा अभी चक्कर खा कर गिर पड़ेंगी। किसी तरह अपने को संयत करने लगीं।
उनके आसपास तब तक भीड़ जमा हो गई थी। लोग पूछ रहे थे-‘क्या हो गया माताजी ? क्या किसी ने टक्कर मार दी है?
‘नही, टक्कर नही हुई है, जेवर ठग कर ले गए मोटर साइकिल वाले़।’ बड़ी मुश्किल से वे बोल पाईं।
‘क्या पुलिसवाले थे माताजी ?’ किसी ने पूछा ।
भारतीदेवी को अनायास बचपन मे पढ़ी एक कहानी याद आ गई। कहीं ऐसा ना हो कि लोगों का पुलिस पर से विश्वास ही उठ जाए,बरबस उनके मुँह से निकला-‘ नहीं वे पुलिसवाले नही, कोई बदमाश लोग ही थे ।’
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6-शब्दशक्ति का निष्कासन
उस दिन हमारी एक व्यंग्य रचना अखबार में छपी थी। तारीफ़ में बहुत से बधाई फोन भी सुबह से आ रहे थे। लेकिन इससे उलट मित्र साधुरामजी स्वयं अखबार पकड़े साक्षात पधार गए। आते ही शुरू हो गए-‘आज चड्डी-बनियान गिरोह पर आपने जो लेख लिखा है, उसमें चोरों के प्रति आप का रवैया सहानुभूतिपूर्ण लग रहा है। आप अपराधी के पक्ष में खड़े दिखाई देते हैं।’ साधुरामजी ने आपत्ति जताई।
‘वह व्यंग्य लेख है मित्र, उन फटेहाल चोरों के पक्ष में नहीं है, जो रात में छोटी मोटी चोरियाँ करते हैं। बल्कि पूरी टीम वर्क के साथ दिन के उजाले में देश को लूटने वाले सफेदपोश बड़े अपराधियों पर व्यंजना और लक्षणा शब्द शक्तियों में प्रहार करने की कोशिश की गई है उस रचना में।’ हमने सफाई देते हुए कहा।
‘किंतु ऐसा स्पष्टतः समझ में आता नहीं लेख पढ़कर।’ साधुरामजी बोले।
‘वह तो समझना पड़ता है मित्र। साहित्य में बहुत से अव्यक्त को पढ़ना आना चाहिए।’ व्यंग्यकार ने कहा।
‘फिर भी, आपको स्पष्ट लिखना चाहिए कि आप सफेदपोश लुटेरों पर प्रहार कर रहे हैं।’ साधुरामजी अपनी बात पर अड़े रहे।
‘साहित्यिक विधा में ऐसा नहीं होता मित्र, पत्थर फेंकने और लाठी चलाने से अलग होता है रचनात्मक प्रहार। और अभिधा में लिखी रचना तो फिर एक रिपोर्टिंग में बदल जाती है। व्यंजना, लक्षणा शक्तियां व्यंग्य के खास औजार होते हैं।’ हमने तनिक ज्ञान बांटा।
‘नहीं, यह तो ठीक नहीं है बिल्कुल। स्वीकार्य नहीं हमें। ये शक्तियाँ तो बहुत अराजक और आतंकी लगती हैं अपने आचरण से। इन्हें तुरंत निष्काषित कीजिए साहित्य से। अन्यथा हमें कोई कानून लाना पड़ेगा।’ कहते हुए साधुरामजी नें अभिधा शक्ति में देशभक्ति से परिपूर्ण एक जोशीले नारे का उद्घोष किया और निकल लिए।
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7-अभिमत
उनकी कविताओं का नया संग्रह आया, तो साधुरामजी बधाई देते हुए बोले- ‘बढ़िया है किताब आपकी।’
‘धन्यवाद, कुछ सामग्री पर भी कहिए!’ उन्होंने खुश होकर कहा।
‘सामग्री भी बढ़िया है, कागज की क्वालिटी बेहतर है।’ साधुरामजी बोले।
‘मेरा मतलब है, कविताओं पर अपना अभिमत व्यक्त कीजिए।’
‘मेरे कुछ कहने से क्या होगा? फ्लैप पर जो वरिष्ठ कवि ने व्यक्त कर दिया है, उससे बेहतर भला मैं और आगे क्या कुछ कह पाऊँगा!’ साधुरामजी ने कहा।
‘अरे ,नहीं मित्र! आप मेरी कविताओं पर अपने विचार रखेंगे तो वे मौलिक होंगे।’
‘ऐसा क्यों? क्या फ्लैप पर वरिष्ठ कवि का लिखा ब्लर्ब मौलिक नहीं है?’
‘जी, वह मैंने स्वयं ही लिख लिया था,उनके नाम से।’
‘अरे भाई तो जो पिछले दिनों अखबार में समीक्षा आई है,उसमें भी तो वरिष्ठ आलोचक ने बड़ी प्रशंसा की है, तुम्हारी कविताओं की।’
‘अब जाने दीजिए!’ उन्होंने निराश होकर कहा ‘आपसे नहीं होगा, मैं ही लिख लेता हूँ आपका अभिमत।’
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