जून 2026

देशभूकंप: उत्तरकथा     Posted: December 1, 2023

यह मज़ाक वैसा ही था , जैसे किसी सबसे छोटे बच्चे के साथ घर का कोई बड़ा आदमी करता है।बच्चे को अपनी गोद से उठाकर हवा में उछालता है। बच्चा जब ज़मीन पर गिरने के भय से चीखता है ,तो हवा से लपककर अपनी गोद में स्नेहवश छुपा लेता है।सोचिए , कहीं बच्चा भूलवश आदमी की लपक मे नहीं आए , तब?

धरती बीते तीन दिनों से उस इलाके के लोगों को ऐसे ही उछालने में लगी हुई थी।रात के ठीक बारह बजे, एक मिनट न पहले, न बाद में; लेकिन , कोई देख आया है! धरती का मन खुद डोलने को होता है, या उसे कोई डोलाता है , कौन जाने ! वैज्ञानिकों का मत था कि भूकंप की तीव्रता रिएक्टर पैमाने पर बेहद न्यून रहती है; लेकिन मैं जिस गाँव का क़िस्सा कहने बैठा हूँ , उसका डर किसी भी चेहरे पर न्यून नहीं था।

चौथे दिन शाम ढलने के साथ ही लोग घरों में ताले लगाकर समूचे परिवार के साथ खेत में आ बैठे। न नींद , न संयत देह।घर के बाहर ही भोजन बना और लोगों ने खा भी लिया। जमीन पर बिछी चटाइयों पर बच्चों को नींद आ गयी,लेकिन बड़ों की निगाहें अपने घरों की पहरेदारी में खड़ी रहीं। घरों से लोग भले निकल आये, सारा सामान तो घरों में ही पड़ा था। चोर ऐसे अवसरों को निकलने नहीं देते। सावधानी ज़रूरी थी। पंडितजी घर में बूढ़ी माँ को छोड़ आए थे, पुत्रवधू की राय थी कि क़रीब नब्बे बरस की दादी एकाध बार खाँस देंगी,तो चोर हिम्मत न करेंगे।अब वैसे भी दादी को कौन- सा सुख देखना शेष रहा।

रात बीत रही थी,पंडितजी को माँ का ख़्याल बेचैन करने लगा। बूढ़ी माँ अकेले उठकर शौचादि को नहीं जा सकतीं , भूखी -प्यासी किस हाल में होंगी ! पंडितजी अचानक कटोरे में दूध-रोटी लेकर बढ़ चले,किसी के रोके न रुके। माँ बेसुध पड़ी थीं,कपड़ों से गंदी बास आ रही थी। पंडितजी ने कटोरा एक ओर रखा और माँ के कपड़े बदलने लगे। माँ कलेजे से अवश होकर चिपकी हुई थीं। फिर पंडितजी ने माँ के मुँह में दूध – रोटी बढ़ाई ही थी कि अपनी कलाई घड़ी देखी , बारह बजने को थे। पर माँ को निवाले चबाने की ज़ल्दीबाज़ी नहीं थी। पंडितजी ने महसूस किया कि तलवे के पास कोई गड्ढा पड़ गया, लेकिन वे न हिले। माँ ने सिर उठाया : ” जमीन तो हमेशा डोलती है , घूमती है बेटा! उसे तो ऊपर का भार सँभाले रहता है। तुम्हारे हाथ को जैसे कटोरे ने डोलने से बचाया, तुम्हारी देह कहाँ डोली! ”
माँ कैसे बोल गयी, पता नहीं।लेकिन पंडितजी को अपने हाथों के कटोरे की स्थिरता ने चौंका दिया।पंडितजी स्तंभित खड़े रहे।ठीक बारह बजे धरती फिर डोली थी।

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