अखबार पढ़ते-पढ़ते अनुपम ओबराय ने ऐनक से ही पलकें चढ़ाकर फ़ोन को देखा और सहलाते से हाथों से रिसीवर उठाया। उन्हें इसी की प्रतीक्षा थी।
“हैलो।”
“चार बजे, कंपनी गार्डन के फव्वारों वाले पार्क के तीसरे बेंच पर। “
“ठीक है।”-उनका मन बल्लियों उछलने लगा। पंद्रह दिनों की प्रतीक्षा के बाद समय आ ही गया ।
एक प्लेट फ्रूट-चाट पैक करवा वे चल दिए। बेंच पर छोटे-छोटे फूलों का दुपट्टा सूट पहने वह बैठी थी । दुपट्टे के नीचे छिपे हाथ में छोटा-सा बॉक्स था। पोते चिंटू का होगा। प्लास्टिक के डिस्पोज़ेबल चम्मच से दोनों ने गाजर का हलवा खाया। टखनों-घुटनों, वात-पित्त-कफ एवं दाँतों-मसूड़ों पर चर्चा की। गुनगुनी धूप में चाट का मज़ा लिया, घड़ी देखी और फिर अलग-अलग रास्तों पर चल दिए।
साठ वर्षीय पत्नी छोटे के पास और उसका तिरसठ वर्षीय पति पिछले वर्षों से बड़े के पास रह रहे हैं। बड़े की पत्नी नौकरी में हैं, इसलिए घर में वे खाली बोर होते रहते हैं। छोटे की पत्नी महीने में एकाध बार किटी या अन्य कहीं निकलती है और दोनों उसी दिन को सार्थक करने में जुट जाते हैं।
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