जैसे ही उन्होंने गटर के ऊपर रखे लोहे के भारी ढक्कन को उठाया दुर्गंध का एक भभका उठा और सारे वातावरण में फैल गया। उसका साँस घुटने लगा। नाक को दुपट्टे से ढाँकती उसने अंदर आकर दरवाजा बंद कर लिया।अब वह काँच के दरवाज़े से उन्हें देख रही थी।वे तीन लोग थे। एक का हाथ ढक्कन उठाते ही कीचड़ से भर गया था। हाथ धोये बिना ही उसने एक लम्बा बाँस उठाया, गटर में डाला, दूसरे ने पीछे से ज़ोर लगाया।बाँस थोड़ा-थोड़ा आगे बढ़ने लगा था।
उसे लगा कितना कठिन काम है जिस दुर्गंध के कारण उसे उबकाई आ रही है, वे लोग उसी गंदगी में खड़े काम कर रहे हैं।कम से कम उनके एक हज़ार रुपये तो बनते हैं। उसने पर्स से पाँच सौ, का एक, दो सौ-सौ के तथा एक सौ रुपये के नोट निकालकर अपने हाथ में रख लिये। उसने बाहर देखा- अब तीसरा आदमी भी उनके साथ लगकर ज़ोर लगा रहा था।शायद कुछ अटका हुआ था, जिसके कारण बाँस आगे बढ़ ही नहीं रहा था। उन्हें प्रयास करते हुए पाँच-सात मिनट हो गए थे। उन्होंने अब बाँस बाहर निकाल दिया था।उसने देखा पानी थोड़ा-थोड़ा आगे जा रहा है। अरे ! समस्या तो सुलझती नज़र आ रही है। उसने मन में सोचा, इतनी सी देर के लिए पाँच सौ ही बहुत हैं। अब उनमें से एक ने हाथ नाली में डाला और उसमें फँसी ईंट का टुकड़ा बाहर निकाल दिया।पानी तेज़ गति से मेन होल में जाने लगा।बस बीस मिनट में सब काम हो गया। पाँच सौ अधिक हैं। तीन सौ बहुत हैं। उसने दरवाजा खोल कर मुट्ठी में रखे रुपयों में से तीन सौ रुपये उन्हें दे दिए। वे हाथ धोकर चले गए।
वातावरण में फैली दुर्गंध धीरे -धीरे दूर होने लगी थी।आँगन में फैला दस दिन का गंदा पानी सीवर के रास्ते निकल गया था।लेकिन उसके मन में कुछ अटक गया था । उसे जल्दी नहीं करनी चाहिए। दो सौ रुपये बहुत थे। बीस मिनट का तो काम था। साँझ तक फाँस उसके मन में अटकी रही।
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