गढ़वाली अनुवाद;डॉ कविता भट्ट
री बगत वु सचमुचि मोरी गेन। मौत खुणि सचमुचि बुन्न सच्ची भौत अजीब लगदु। मनखि क्य बार-बार मुर्दु…? सैत ना, पर वु कै बगत म्वरिन। पहली बगत तब जब भौत सारा लोखु क समणी पीड़ा कि मूर्ति बणि घौरवळी म वूंन लपटांदी जुबान म बोलि छौ, “अपड़ा मुंन्नौं कु मि तैं इतगा दुःख़ नी च, जतगा ईं बातौ कु कि मि पैसा सिवाय त्वी तैं क्वी हौर सुख नी दे सक्यों..” अर तब रौ रिस्तादारू क जांदु ई वूं तैं अचेत जाणिक घौरवळि बरड़णि छै, “दिन भर यूँ कु गू-मूत सप्पा करदु-करदु मेरी त ज़िन्दगी ई नरक बणि ग्याई। कई तरौं मोरी जौंन, त क्वी सुख़ मिलु।”
और दूसरी बगत तब जब प्राण कण्ठ म अटक्याँ ई छा कि तब्बि रौ रिस्तादारू की गिद्ध सि नजर पैंसा पर अटकि गे छै अर वे नाप-जोख़ म लगी गे छा। जल्दी मोरू, त वे सब्बि कुछ बि मिलु …सैरी ज़िन्दगी वुंकी चीफलैस म बीति गे… आखिर अब त कुछ मुआवजा मिल्लु।
अर तीसरी बगत…संतान त क्वी छै नी छै अर घौरवळी सुद्दि मुद्दि क विलाप म व्यस्त छै, तब रिस्तेदारू न अचाणचक म ई सा
सैरी तैयारी करियाली छै। एक न वूँ तैं बिना नहवयां-धुलांयां ई सस्ता क़फ़न म लपटै द्याई अर दूसर न जल्दबाजी म बणये गे लचकदार बाँसा की डांडी म थेड़ी दे, त वूँन (आत्मा) ये भौतिक संसार से विदा लेणि ठिक समझी।
थोड़ी देर बाद जब भाई-भतीजों क कंधा पर सस्ती-लचकदार बाँसा की डांडी छै अर “राम नाम सत्य…” क एकी स्वर म घौरवळि क जोर जोर क विलाप म गड्मड हूणा छा, वु सच म मोरी गे छा।
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