जून 2026

दस्तावेज़कल की शक्ल: बाल-मन की संवेदना     Posted: September 1, 2023

कमल चोपड़ा के लघुकथा संग्रह ‘कल की शक्ल’ में कुल इकहत्तर लघुकथाएँ संगृहीत हैं, जो जनवरी 1982 से दिसम्बर 2022 तक हंस, कथादेश, सारिका, धर्मयुग, कथाक्रम, समांतर, समावर्तन, नया ज्ञानोदय, हरिगंधा, वीणा, वर्तमान साहित्य, दैनिक हिन्दुस्तान, दैनिक ट्रिब्यून, दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका, राष्ट्रीय सहारा जैसे महत्त्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। इकतालीस वर्षों का समय किसी भी साहित्यिक विधा और साहित्यकार के लेखन के स्वरूप और प्रवृत्तियों को समझने के लिए काफी होता है। अपनी लघुकथाओं में कमल चोपड़ा ने जो विषयवस्तु चुनी है, वह सब जीवन के यथार्थ और सामाजिक परिवेश की हैं। काफी समय से लघुकथा में चली आ रही एक निश्चित धारा और उसके बँधे-बँधाए चरित्रों के व्यक्तित्व को कमल चोपड़ा ने अपनी अतिरिक्त सचेष्टता और सक्रियता से तोड़ने का प्रयास किया। बाल मन के भाव को रेखांकित करती कमल चोपड़ा की लघुकथाओं में समाज, परिवारों के वातावरण और परिवेश का यथार्थ तन-मन को झँझोड़ देता है, उनकी शब्दावली और सोचने का ढंग एक-सा दिखाई देता है; इसलिए उन्होंने विस्तृत और स्पष्ट दृष्टि रखते हुए लघुकथाओं का रचनाक्रम सम्पन्न किया है। उनकी लघुकथाओं की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने सामाजिक यथार्थ और संवेदना से संबंध को सार्थक किया है। जो नहीं कहा गया, उसे कहने का प्रयास किया। इन लघुकथाओं में बाल मन के सपने, उनकी अपेक्षाएँ और आकांक्षाएँ हैं। बालश्रम से मुक्ति की छटपटाहट है, तो कहीं अत्यंत कारुणिक तथा हृदयविदारक दृश्य निहारती मासूम आँखंे हैं। कहीं भूख से पथराई आँखें देर तक मर्म को झकझोरती रहती हैं। बालमन की संवेदना पर कलम चलाकर लघुकथाकार ने अपनी संवेदना का विस्तार किया है।

संग्रह की पहली लघुकथा ‘बताया गया रास्ता’ साम्प्रदायिकता से उपजी कट्टरता के सामाजिक परिदृश्यों का चित्रण करती है, जहाँ बाल मन में अविश्वासों के बीच महज विश्वास होता है, उसके लिए रिश्ते ईमानदारी का उजला रंग है, जो कहता है- ‘‘ये मुसलमान थोड़ा ही न हैं। ये तो मेरे शैफू चाचा हैं। सुना नहीं, अभी मुझे बेटी कहकर बुला रहे थे’’  फिर एकाएक उछल कर शैफू के रिक्शे पर चढ़ बैठ गई। ‘अब्बू का मजहब’, ‘चेहरे’, ‘दहशत का नाम’ भी इसी मिजाज की लघुकथाएँ हैं।

‘जात’ लघुकथा हमारी सामाजिक व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न खड़ा करती है और ओमप्रकाश बाल्मिकी की याद दिलाती है, जिन्होंने जातीय दंशों को ‘जूठन’ में अनुभूत किया। कमल चोपड़ा ने उसे निर्मल बालमन और अम्मा के माध्यम से अभिव्यक्त किया- गली में खेल रहे ढाई-पौने तीन वर्ष के नन्हे की नज़र मिठाई से भरी थैली पर पड़ी! वह झठ से उसके पास जा पहुँचा, ’’अम्मा-अम्मा, एक लड्डू दे दो….’’ अम्मा का दिल काँप रहा था। किसी ने देख लिया तो बच्चे को तो कोई कुछ नहीं कहेगा उसकी शामत आ जाएगी।

‘खेलने के दिन’ लघुकथा बाल मजदूरी के विवश पाठ को इस तरह से रेखांकित करती है कि बालमन की भीतरी अश्रुधारा सूखकर प्रकट होती है- ‘‘एक बच्चे ने खिलौने को वापस उनके झोले में डालते हुए कहा, मैं नहीं ले सकता। मैं इसे घर ले जाऊँगा,ख् तो माँ-बापू समझेंगे कि मैंने मालिक से ओवर टाइम के पैसे उन्हें बिना बताए ले लिये होंगे और उनका खिलौना ले आया।’’

‘चमक’ और ‘छोनू’ लघुकथा भी साम्प्रदायिकता की काई हटाती नजर आती है, जिसमें- ‘‘गजब की दिलेरी दिखाई हमारे धर्म वालों नें! और छोनू का वह वाक्य- ‘‘मैं छिक्ख-छुक्ख नई अंू… मैं बीज-ऊज नई अंू…- मैं तो छोनू अंू…-’’।

‘खेल’ लघुकथा हमारे समाज की पतनशीलता पर टिप्पणी करती है, जहाँ पुरुष के लिए स्त्री महज देह होती है- माँ… बाबू ने मुझे भी … ये बाबू जी भी अच्छे थे ना… पर माँ, ये बाबूजी थे कौन?

काँप गई माँ, वीनू ने फिर पूछा तो झुँझला उठी।

‘वैल्यू’ लघुकथा में समाज की परिभाषाओं में उलझे मध्यम वर्ग की सोच को उकेरा गया है। आंचलिकता के पुट ने इस लघुकथा को ज्यादा जीवंत बनाया है। ‘खैरख्वाह’ ‘विषम खेती’ में भी जीवन के कुछ अहम पहलुओं को उजागर किया है। ये लघुकथाएँ ये साबित करती हैं कि घटनाओं को सही परिप्रेक्ष्य में देखना ही गलतियों को दुरुस्त करने का प्रस्थान बिंदु होता है।

‘प्लान’, ‘जीने वाले’, ‘खिलवाड’, ‘कल की शक्ल’, ‘तैसा’, ‘तेजाब में भविष्य’ और ‘परिपक्व’ लघुकथाओं की रचना प्रक्रिया को जो तार्किक दृष्टि मिली है, वह शायद कमल चोपड़ा को निजी व्यवसाय से मिली है, जिसके चलते वे चिकित्साशास्त्र की शब्दावली का सुन्दर प्रयोग करते हैं।

‘बहुत बड़ी लडाई’, ‘अभिन्न’, ‘आप खुद’, ‘आप कहाँ हैं ?’, ‘रामजी का खेत’, ‘पुरस्कार’, ‘पहला आश्चर्य’, ‘किताब का साथ’, ‘चाइल्ड एटवर्क’, ‘कसूर किसका’, ‘सुखी रहे’, ‘इंसान-इंसान’, ‘सोशल’, ‘हारना मत’, ‘बड़ा आया’, ‘हम क्यों नहीं’, ‘चोर’, ‘पुराना’, ‘लेकिन अच्छा’, ‘मुन्ने की बात’ आदि लघुकथाओं में छोटी-छोटी घटनाओं को भी अपना कथानक बनाते हुए  कल्पना क्षमता से कमल चोपड़ा ने प्राण प्रतिष्ठा जैसी की है तथा परिवेश के अनुरूप हिंदी-अंग्रेजी, पंजाबी-देशज शब्दों का प्रयोग किया है, कहीं भी अवांछित भाषा का प्रयोग नहीं किया है। भाषा का प्रवाह कमल चोपड़ा की लघुकथाओं का मूल्यांकन करने में सहायक सिद्ध हुआ है। इस संग्रह का एक विशिष्ट पहलू भी है- संवेदना की सघनता लिए इसके पात्र स्तुति, नन्हे, मुन्ना, छोनू, बिनू, शाबू, अजय, मिन्नी, चरणू, मींकी, रिंकू, निशु, बबलू, अमन प्रीत, टीनू, शुभम, छोटू, पिंकू, रीप्पू, मोनू, शाहिद, तनू, मिंकू, मल्ली, रिजू, संजू, नन्दू, राजू, बन्टी, ननकू आदि जो बाल-मनोविज्ञान के अवलोकन का धरातल देते हुए लघुकथाओं में चार चाँद लगा देते हैं।

-0-कल की शक्लः कमल चोपड़ा, पृष्ठ 144, मूल्य 375 रुपये, ISBN-978-93-92889-09-7,प्रथम संस्करण-2022, प्रकाशक- किताबघर, 4860-62/24, पहली मंजिल, अंसारी रोड़, दरियागंज, नई दिल्ली-110002

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