जून 2026

संचयनलघुकथाएँ     Posted: August 1, 2023

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तुम यहीं हो

4 जनवरी 2020

आज अर्पिता की बहुत याद आ रही है। सुबह अलमारी से शर्ट निकालने लगा तो सामने हैंगर में लटकी अर्पिता की चार दर्जन साड़ियां दिखाई दीं। पिछले चार वर्षों से इन्हें किसी ने नहीं पहना। यह मेरून और नीले रंग की साड़ी उसे खूब पसंद थी। विवाह की पच्चीसवीं साल गिरह पर दिलवाई थी मैने उसे। सिक्सटी फोर ।  भला  यह भी कोई  उम्र है दुनिया छोड़कर जाने की। मन रह रहकर उदास हो रहा है।

5 जनवरी 2020

चालीस पैंतालीस वर्ष पहले जब हमारी शादी हुई थी तो मज़ाक में पूछा था अर्पिता ने-कितनी तनख्वाह  मिलती है आपको ?  तीन सौ रुपये की बात सुनकर देर तक हँसती रही थी वह। और मैं अपना- सा मुँह लेकर रह गया था।

6 जनवरी 2020

धीरे धीरे गृहस्थी सँभाल ली थीअर्पिता ने। मुझे याद है एक बार आखिरी सप्ताह में पैसे खत्म हो गए थे। मैंने  बैंक से पैसे निकालने की बात की तो कहने लगी – जमा रकम क्यों निकालते हो। मैं रद्दी अखबार बेच दूँगी। पहली तारीख तक काम चल जाएगा। उसकी सूझ-बूझ पर मैं मुस्करा दिया था। उस दिन हल्की बरसात हो रही थी। मेरा मन दफ्तर जाने का नहीं था। वह किचन में गई और ट्रे में  चाय पकोड़े मेरे सामने रख कर मुझसे सटकर बैठ गयी थी।

7 जनवरी2020

मेरा बेटा स्कूल जाने लगा था। ऑफिस में ओवरटाइम करके रात्रि दस बजे कड़कड़ाती सर्दी में जब घर आता तो अर्पिता बेटे को होमवर्क करवाकर, उसे खाना खिलाकर सुला देती थी। मेरे आने पर  वह मुझे गरमागरम खाना परोस देती और एक तृप्ति का भाव उसके चेहरे पर हुआ करता था। मेरे विभागीय प्रमोशन पर उसने सारे मोहल्ले में लड्डू बाँटे थे, जैसे वह खुद सेक्शन अफसर के पद पर आसीन हो गई हो।

8 जनवरी 2020

बेटे का विवाह हो गया था। शिवानी के रूप में वह बहुत समझदार बहू चुनकर लायी थी। अर्पिता की आकस्मिक मौत के बाद शिवानी ने पूरे घर और मुझे सँभाला हुआ है। जब कभी अर्पिता की याद आती है तो शिवानी ढाढस देकर कहती है-पापाजी, आप घर के मुखिया हैं। आप ही उदास रहेंगे तो हमे ढाढस कौन देगा। और मैं नज़रे बचाकर आँसू पोंछ लेता हूँ।

9 जनवरी 2020

अर्पिता को किसी न किसी ज़रूरतमंद को दान आदि देने में बड़ी रुचि थी। पूरे चार वर्ष हो गए है अर्पिता को बिछुड़े हुए। आज मैंने घर में काम करने वाली सहायिका को बुलाकर  अर्पिता की साड़ियाँ,सूट,शॉल, चूड़ियाँ आदि उसे दे दी हैं। उसने वादा किया है कि वह अपनी बस्ती में रहने वाली सभी औरतों को एक- एक साड़ी वितरित कर देगी। खाली अलमारी और लटके हुए हेंगर उदासी और बेचैनी से जैसे पूछ रहे हैं-बाबूजी, क्या इतना ही प्यार करते थे आप मालकिन से?

मैं निःशब्द हूँ।

10 जनवरी 2020

कल देर रात तक सो नहीं सका। आज सुबह तीन बजे नींद ने आ घेरा था। सपने में मैंने देखा कि बस्ती की सभी औरतें अर्पिता की दी हुई साड़ियों से सज्जित होकर, झूम झूमकर डांडिया नृत्य कर रही हैं । उन सब के बीच अचानक अर्पिता भी प्रसन्न मुद्रा में नृत्य कर रही है। 

        मैं चौंककर उठ बैठता हूँ और स्टूल पर रखा पानी का गिलास होठों से लगा लेता हूँ। फिर समीप रखे ग़ज़ल  संग्रह को खोलकर पृष्ठ पलटने लगता हूँ। मेरे सामने कुछ शेर यूँ हैं-

               वो जो  दूर सफ़र  में है,  उसकी पीर नज़र  में है

               चला गया, विश्वास नहीं,  खुशबू अब तक घर में है

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2-तस्वीर की तक़दीर

            उस दिन मंदिर के बड़े हाल में रेशमी चादर से ढकी कुर्सी पर मुझे गुलाब की माला से सजाया गया था। समाज के प्रतिष्ठित व्यक्तियों की जुबान पर मेरी जिंदादिली और मुस्कान के चर्चे थे।  शोक सभा की समाप्ति पर मुझे घर के एक कमरे में मेज़ पर दीवार के साथ सटा कर रख दिया गया।

         कई दिन बाद मेरे फ्रेम में लटकी माला सूख गई थी। उस माला को उतार कर एक पॉलीथिन में रख दिया गया और मुझे दीवार में ठुकी कील पर लटका दिया गया। एक दिन परिवार के एक सदस्य द्वारा झाड़-पोंछ करते हुए मैं झटके से फ़र्श पर झनझनाकर गिर पड़ी। मेरा ऊपर का चमकदार शीशा टूटकर बिखर गया था। मैं जैसे नंगी हो गई थी।

            तब मुझे  स्टोरनुमा कमरे में एक बड़े से ट्रंक पर रख दिया गया। मैं उम्मीद करती रही कि किसी दिन घर का कोई सदस्य नया शीशा जड़वाकर मेरे नंगेपन को ढक देगा। किंतु ज़िन्दगी की भागदौड़ में किसी को कहाँ फुर्सत थी। दिन, महीने यहां तक कि तीन वर्ष बीत गए थे। मेरा ठिकाना स्टोर में ही बना रहा। मुझ पर धूल की परतें जमती रहीं और एक दिन मैं बदरंग हो गयी।

           दीपावली नज़दीक थी। घर की साफ़-सफाई में फ़ालतू सामान को हटाया जाना  अनिवार्य था। घर के लोगों में मेरे प्रति अभी श्रद्धा शेष थी।

              आज मुझे, मेरी सूखी माला तथा हवन की राख को बहते जल में प्रवाहित कर दिया गया है। जल की  धारा के साथ मैं दूर, बहुत दूर निकल  गयी हूँ। अचानक पानी में भँवर सी बन गई है। मैं उस भँवर में फँसकर घूमने लगी हूँ। धीरे-धीरे  मैं तल की ओर उतरती जा रही हूँ…उतरती जा रही हूँ। और मैं कह उठती हूँ— खुश रहना मेरे बच्चों…खुश रहना।

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3-मोर

          

                  नाम, इज्ज़त, शोहरत और दौलत यूँ ही उसके हिस्से में नहीं आये हैं…कड़ी मेहनत की है उसने। कवि हिमकर ने अपने गीतों और मुक्तकों से देश-दुनिया में एक अलग पहचान बनाई है। उसके अनेक मुक्तक  श्रोताओं की जुबान पर रहते हैं। उनकी तालियों के बीच जब वह झूम-झूमकर कविता पाठ करता है तो लगता है जैसे कोई मोर नृत्य कर रहा है।

                 एक बड़ी संस्था ने हिमकर को सम्मानित करने के लिए आमंत्रित किया हुआ है। अपने काव्य- गुरु के साथ आज वह अपनी महँगी कार में आयोजन स्थल की ओर जा रहा है।

     “तुम खामोश और गुमसुम से क्यों हो हिमकर?”  यह गुरुजी  का स्वर है।

“एक प्रशंसक के पत्र ने मुझे विचलित कर दिया है गुरुजी।”

“क्या लिखा है?”

“यही कि मेरे चर्चित और बहुप्रशंसित मुक्तक में तकनीकी अशुद्धि है; लेकिन मेरे मित्रों ने मुझे कभी भी इस बारे में नहीं टोका ।”

“शायद इसलिए कि तुम बुरा न मान जाओ और अपने आयोजनों में उन्हें बुलाना ही बन्द न कर दो।”

“लेकिन आप तो अधिकारपूर्वक कह सकते थे गुरुजी।”

“जब तक मेरे संज्ञान में बात आई, तुम्हारा काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका था।” गुरुजी ने अपनी सफाई दी है।

            कार आयोजन स्थल पर पहुँच चुकी है। सभागार  खचाखच भरा है।  हिमकर, गुरुजी और मुख्य अतिथि मंच पर विराजमान हो गए हैं।

           प्रशस्ति-पत्र पढ़े जाने के उपरान्त मुख्य अतिथि द्वारा हिमकर को  माला,शॉल,  स्मृति चिह्न  तथा एक लाख रुपये का चेक दे दिया गया है। सभागार में तालियाँ बज उठी हैं।

             श्रोताओं के अनुरोध पर हिमकर झूम-झूमकर अपने कुछ मुक्तक सुनाता है। अब उसके बहुचर्चित मुक्तक को सुनकर समूचा सभागार तालियों और सीटियों से गूँज उठा है। हिमकर ने भी श्रोताओं के अभिवादन में अपना हाथ हवा में लहरा  दिया है।

           तभी हिमकर का बायाँ हाथ कोट की जेब में रखे प्रशंसक के पत्र को स्पर्श करता है। उसके चेहरे की रंगत फीकी पड़ गयी है। वह माइक छोड़कर बोझिल कदमों से चलकर कुर्सी पर आ  बैठा है। उसकी आँखों की कोरों में नमी-सी ठहर गई है।

  श्रोताओं की तालियाँ रुकने का नाम नहीं ले रहीं हैं।

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4-चाँद मेरे आजा रे

 

सुनों, कम से कम आज के दिन तो समय पर आ जाना।

 

मुझे याद है भई! शादी के बाद आज तुम्हारा पहला करवा चौथ है।

आज कोई नई कहानी मत सुनाना घर आकर। पूरे दिन बोर हो जाती  हूँ घर में अकेली।

मैं सात बजे तक पहुँच जाऊँगा डार्लिंग।

सुनो, तुम परसों जो साड़ी लाए थे न, मैंने उसमें फॉल लगवा लिया है और लोकट  ब्लाउज़ भी सिलवा लिया है।

फिर तो जलवा हो जाएगा डिअर।

और हाँ, तुम्हारी पसन्द की केशर की खीर और दही भल्ले भी बनाकर रखूँगी। तुम्हारे हाथों से पानी पीकर व्रत खोलना है मुझे।

मुझे याद है। अच्छा रखता हूँ फोन।

            पति राकेश की बातों से आश्वस्त होकर किरण तेजी से रसोईघर में जाकर भोजन की तैयारी में जुट गई। उसके चेहरे पर उल्लास  था तथा होंठ कोई रोमांटिक गीत गुन गुना  रहे थे।

        सात बजते बजते  किरण ने भोजन तैयार कर लिया था। नई साड़ी में वह एक अप्सरा -सी लग रही थी। अब उसे राकेश की प्रतीक्षा थी।

                  समय बीतता जा रहा था। झुँझलाहट में उसने कई बार मोबाइल से सम्पर्क करने की कोशिश की। लेकिन हर बार “नॉट रीचिंग”  बता रहा था।

           तभी डोर बेल बजी। तेजी से उठकर  दरवाज़ा खोला तो बदहवास सी हालत में राकेश खड़ा था। उसकी सफेद शर्ट पर जगह जगह खून के धब्बे देखकर वह चौंक उठी,,,,,,

ये क्या हो गया जी। किसी से झगड़ा कर बैठे क्या?

पहले अन्दर चलो, बताता हूँ।

तुम्हें पता है मैं कब से इंतज़ार कर रही हूँ। मेरी जान सूख गई थी।

रास्ते में एक आदमी का एक्सीडेंट हो गया था। वह खून से लथपथ था। सब तमाशा देख रहे थे। कई तो मोबाइल से फोटो ले रहे थे।  वह सड़क पर पड़ा कराह रहा था। मैंने एक मजदूर की सहायता से अपनी बाइक पर बिठाकर उसे अस्पताल पहुँचाया। जब उसके रिश्तेदार वहाँ पहुंचे, तब मैं वहाँ से निकला।

और तुम्हें मेरी परेशानी का ज़रा भी ख्याल नहीं आया।

आया था  किरण तुम्हारा खयाल कि तुम सुबह से भूखी बैठी मेरा इंतज़ार कर रही हो। पर ज़रा यह सोचो कि करवा चौथ पर उसका भी तो घर पर उसकी पत्नी इंतज़ार कर रही होगी। उसे  कुछ हो जाता तो!

 ऐसा न कहो जी। 

 किरण ने उसके मुँह पर उँगली रखते हुए कहा…

तुमने बड़ा नेक काम किया है जी।

अच्छा चलो पहले चाँद देख लो। अरे,  चाँद तो बादलों में छुप गया है किरण। राकेश ने अपनी शर्ट उतारते हुए कहा।

मेरे चाँद तो आप हैं जी-किरण लजाते हुए राकेश के सीने से लग गई।

शरारती चाँद बादलों से निकल बाहर आ गया था।

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5-रिज़र्व

                संतोष और मैं  एक   ही कार्यालय  में थे; लेकिन हम दोनों के विभाग अलग थे। उसका घर मेरे घर से एक किलोमीटर दूर था। मैं बस से कार्यालय जाता था, तो संतोष अपने दस साल पुराने स्कूटर से। जब कभी वह मुझे बस स्टॉप पर खड़ा देखता, तो लिफ़्ट देने में खुशी अनुभव करता था।

          संतोष के साथ आते-जाते समय अक्सर उसका स्कूटर रिज़र्व लग जाता था। वह कहता  था कि उसका एक मात्र ध्येय बच्चों को उच्च शिक्षित करना है, चाहे उसे कितनी भी तंगी में रहना पड़े।

        ईश्वर ने उसकी सुन ली थी। उसके होनहार बेटे और बेटी ने इंजीनियरिंग करके एक  बिजनेसमैन के सहयोग से एक कम्पनी स्थापित कर ली थी।

             एक दिन चाय की चुस्कियों के बीच मैंने उससे कहा-“मुझे खुशी है कि तुम्हारी मेहनत से बच्चे बहुत कामयाब हो गए हैं।”

” सब ईश्वर की कृपा और मित्रों की दुआएँ हैं।” संतोष ने इतना-भर कहा।

” लेकिन यार एक बात समझ नहीं आई।”

“वह क्या?”

“सुना है, तुम्हारे बच्चे अपनी कम्पनी के कर्मचारियों को दूसरी  कम्पनियों के मुक़ाबले अधिक वेतन देते हैं।”

            मेरी बात सुनकर सन्तोष मुस्कुराते हुए एक पल को गम्भीर हो गया। फिर बोला-“यार राजपाल, तुम तो जानते हो कि मैंने कैसा- कैसा वक़्त गुज़ारा है। दरअसल मेरे बच्चे चाहते हैं कि उनके किसी कर्मचारी के स्कूटर या बाइक में कभी रिज़र्व न लगे।

          मैंने महसूस किया कि मेरी चाय पहले से अधिक स्वादिष्ट हो गई थी।

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6-छींक

       होटल  में सामान रखते ही मैंने अपने क्लासफेलो संगम को अपने मुंबई पहुँचने की सूचना दी, तो वह बहुत खुश हुआ। यह वही संगम कुमार है, जो क्लास और एग्जामिनेशन में नकल के लिए मेरी मिन्नतें किया करता था। आज वह फ़िल्म इंडस्ट्री का एक चर्चित सुपर स्टार है।

       सुपर स्टार होते हुए भी वह यारों का यार है। उसने अपनी मर्सडीज़ भेजकर मुझे शूटिंग देखने के लिए बुलाया है।

              में स्टूडियो पहुँच गया हूँ। स्टूडियो में बनाया गया जंगल का सीन अद्भुत लग रहा है। कोरियोग्राफर डांसर्स और हीरोइन को सीन समझा रहा है। तभी उसने गले में लटकी व्हिसल  बजा दी है। लाइट, कैमरा ऑन हो गए हैं। तेज़ म्यूजिक के साथ गीत बजते ही हीरोइन और डांसर्स ने अपनी मादक अदाओं के साथ थिरकना शुरू कर दिया है।

               कोरियोग्राफर की दूसरी व्हिसल सुनकर संगम कुमार कैमरे के सामने पहुँच गया है। वह दो मिनट तक डांसर्स और हीरोइन को देखता है। फिर अपना दायाँ हाथ उठाकर लौट आता है।

              अब हम रेस्ट रूम में आ गए हैं। अटेंडेन्ट ने बीयर के दो गिलास हमारे सामने रख दिए  हैं। अटेंडेन्ट तौलिए से  संगम कुमार के माथे का पसीना पोंछ रहा है। गिलास उठाते हुए मैंने कहा-“यार संगम, ये डांसर्स इतनी देर से गाने पर डांस कर रही हैं और तुमने दो मिनट के लिए हाथ को हिलाया-भर है।”

           मेरी बात सुनकर संगम कुमार बड़े मोहक अन्दाज़ में कहा-“तुम्हारा दोस्त एक सुपर स्टार है अरुण। हमारे जैसे चर्चित फ़नकार अगर छींक भी दे, तो आम लोग उसे हमारी अदा समझकर  दिल  थाम लेते हैं।”

                 उसकी बात सुनकर टेबल पर रखी नमकीन की मिर्च से मुझे लगातार कई छींकें आईं। जैसे ही छींकों का सिलसिला रुकता है, मैं देखता हूँ कि संगम कुमार अगले शॉट के लिए  उठकर जा चुका है।

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