बीसवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध कई अर्थों में महत्वपूर्ण रहा है। युगानुरूप परिवर्तन की लहर ने जीवन के हर क्षेत्र को प्रभावित किया। ऐसे में साहित्यकार भी अपने परिवेशगत बोध को ग्रहण कर, व्यक्ति, समाज और साहित्य के बीच संतुलन स्थापित करने की चेष्टा करने लगे। युगीन यथार्थ के स्तर पर नई वैचारिकता, अनुभूति की प्रामाणिकता, संवेदनशीलता और मानवीयता के समन्यय के प्रयास शुरू हुए। पारम्परिक बोध से पृथक् निरीह, निराश्रित और निर्बल मनुष्य की जीवनस्थितियों का आकलन-अन्वेषण आरंभ हुआ। हम देख सकते हैं कि आठवें दशक की लघुकथा में मनुष्य के जीवन-संघर्ष, विघटित होते जीवन मूल्यों तथा संवेदनाओं से गहरा तादात्म्य स्थापित हुआ। लघुकथा जनजीवन के समान्तर चलने लगी।
आठवें और नवें दशक के संधिकाल में जिन सशक्त रचनाकारों का अभ्युदय हुआ उनमें सुकेश साहनी का नाम प्रमुख है। एक ओर उन्होंने अपने पूर्ववर्ती लघुकथाकारों के द्वारा स्थापित मानकों को सुदृढ़ किया। दूसरी ओर लघुकथा को साहित्यिक स्तर पर विधागत दृढ़ता प्रदान करने में अपना अनवरत योगदान दिया, और अपनी इस कोशिश में वे आज भी सक्रिय हैं। सुकेश जी का साहित्यिक रूप इतना प्रबल है कि उसका मूल्यांकन केवल लघुकथाकार की सीमाओं में आबद्ध होकर नहीं किया जा सकता है। ऐसे में साहित्यकार की चिन्तन दृष्टि पर प्रकाश डालना आवश्यक हो जाता है। सुकेश जी की अन्तर्दृष्टि बहुत व्यापक और संवेदनशील है, उनकी संवेदना का गठन युगबोध पर आधारित होता है। परिवेशन यथार्थ की कठोर भूमि पर उनकी संवेदना अपने कथाचरित्रों को संयोजित करती है, अतएव उनकी सृजन-प्रक्रिया दीर्घकालीन अनुभवों से गुजरती हुई अपना धरातल तलाश करती है। वे लघुकथाओं का उत्पादन नहीं करते, वरन उनके कथानक जीवनस्थितियों के बीच से आकर उनके पास ठहरते हैं। इस अर्थ में उनकी संवेदना का सीधा सम्बन्ध उनके अन्तर्जगत से स्थापित होता है, जो पीड़ा के कारणों का विश्लेषण करने के बाद ही मुखर होती है अर्थात उनका रचनाकार बाह्ययथार्थ को भीतर मथता है, जो उनकी रचना प्रक्रिया का कठिन आयाम है, पर उन्हें कहीं विचलित नहीं होने देता, सम्यक चिन्तन दृष्टि सदैव उनके साथ रहती है, परिणाम स्वरूप संवेदना का विवेकसंगत प्रयोग उनकी लघुकथाओं का वैशिष्टय है। इस तरह लेखक अपने कव्य को लघुता में समेट कर बड़ा कर देता है। उनके कथाचरित्र हृदयस्पन्दन के समानान्तर पाठक के साथ चलते हैं। व अपनी अन्तर्ध्वनि से कालबोध की गहन समीक्षा करते हैं। उदाहरण के तौर पर उनकी इस नामक लघुकथा अपने चरम बिन्दु पर पहुँच यह बताने में सफल होती है कि ईश्वर कहाँ रहता है। कथा के मूल में ईश्वर की उपस्थिति की संवेदना कई स्तरों पर पाठक की मनः स्थिति को आन्दोलित करती है। कैंसरग्रस्त पति की जीवन रक्षा के लिए पत्नी निर्जल उपवास रखती है। घर में जागरण होता है, ऊपरी बलाओं से मुक्ति दिलाने के लिए कई सिद्ध पुरुष आते हैं। मंत्रोच्चारण झाड़-फूंक के धुएँ के ढीच कहीं ईश्वर दिखाई नहीं देता। पति की मृत्यु से रिक्त हुए पद पर पत्नी को नौकरी मिल जाती है। नौकरी और गृहस्थी में व्यस्त पत्नी वे सभी दायित्व पूरे करती है जो उसके पति के जिम्मे थे। लघुकथा का चरमबिन्दु ‘श्मशान से मेरी अस्थियाँ चुनकर नदी में विसर्जित की जा चुकी हैं। पत्नी की आँखों के आँसू सूख गए हैं। मेरी मृत्यु से रिक्त हुए पद पर वह नौकरी कर रही है। घर में साड़ी के पल्लू को कमर में खोंसे, वह काम में जुटी रहती है। मेरे बूढ़े माँ-बाप के लिए बेटा और बच्चों के लिए बाप भी बनी हुई है। पूजापाठ (ईश्वर) के लिए अब उसे समय नहीं मिलता। ईश्वर?.. वह उसकी आँखों से झाँक रहा है।’ यह कहना उपयुक्त होगा कि सुकेश जी छोटी-छोटी स्थितियों को अपना सूक्ष्म विश्लेषण और निहितार्थ के साथ प्रस्तुत करने में सिद्धहस्त हैं। कैंसरग्रस्त पति के मन की हलचल के माध्यम से बेलघुकथा में निहित संवेदना की व्याप्ति और सामाजिक संरचना के यथार्थ को पूरी समग्रता के साथ देखते हैं। आजकल के जागरणों में घुस आई फिल्मी गानों की लय-ताल और डांस की विकृत प्रस्तुतियाँ, पूजा-पाठ व धार्मिक अनुष्ठानों का अतिरेक, झाड़-फूँक के आडम्बर पर गहरे कटाक्ष हैं। धर्म के नाम पर रूढ़िग्रस्त समाज को ईश्वर की उपस्थिति के कितने विकल्प सुझाए जाते हैं। उसकी जिजीविषा को पराजित करने के कितने बहाने जाते हैं और धर्म की दुकानें चलाने वालों को ऐसे बहाने मिल भी जाते हैं। ऐसी बहुत-सी जीवन स्थितियाँ लघुकथा के मर्म से निकलकर पाठक पर प्रभाव छोड़ती हैं। मैं समझता हूँ लघुकथा के नेपथ्य से कई और प्रश्न भी उभरकर सामने आते हैं जो अपनी अन्तर्ध्वनि से हमें हतप्रभ करते हैं। ईश्वर के बिम्ब के पीछे हमारी अन्ध आस्था का कितना कड़वा यथार्थ निहित है कहीं बाबागीरी की आड़ में स्त्री अस्मिता का शोषण, कहीं धर्म के नाम पर दंगों की आशंका हर पल हमें असुरक्षित किए रहती है। निष्कर्ष में पाठक को संदेश मिलता है कि ईश्वर की उपस्थिति आस्था, अतिरेक या उन्माद की आँधियों में नहीं दो जून की रोटी कमाने वाले मेहनतकश मजदूर की हथेलियों में है। ईश्वर का बोध बाह्याडम्बरों में नहीं मनुष्य की आन्तरिकता में है। लघुकथा अपनी अन्तर्ध्वनि से पूरे कालबोध की व्यंजना करती है।
सुकेश जी की लघुकथाओं में जनपक्ष गहरी संवेदना के साथ व्यक्त हुआ है। ‘सारिका’ के लघुकथा विशेषांक 1984 में छपी उनकी लघुकथा ‘डरे हुए लोग’ की चर्चा प्रासंगिक है। 1991 में इसी नाम से उनका लघुकथा संग्रह भी आया। भूगर्भ जल वैज्ञानिक होने के नाते दूरदराज क्षेत्रों में परिवेश से जुड़ाव होना स्वाभाविक है। ‘डरे हुए लोग’ लघुकथा इसी ग्रामीण परिवेश से जन्म लेती है। भूमिगत जलपरीक्षण और विश्लेषण करना उनकी विभागीय प्राथमिकता में रहा है, तो देश के ग्रामीण जो अपने कालखण्ड की पृष्ठभूमि को रेखांकित करती है। रूढिग्रस्त और बहुत से सामाजिक निषेधों से घिरे अशिक्षित समाज की चिन्ताओं से परिचित कराती है कि किस तरह सरकारी योजनाओं को भी वह संदेह की दृष्टि से देखता है। सुकेश जी के लघुकथा लेखन की प्रारंभिक रचनाओं से ही जनपक्ष दृढ़ता के साथ उभरकर सामने आया है। रचनाकार डरे हुए जनपक्ष की चिंताओं को बहत संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत करता है। भारतीय संदर्भ में लघुकथा का बूढ़ा किसान बड़े जनसमूह का प्रतिनिधित्व करता है जो व्यवस्था की विसंगतियों में पिस रहा है। यही डर उसे व्यवस्था पर अविश्वास के लिए प्रेरित करता है। सुकेश साहनी की लघुकथाएँ मानवीय संवेदना के व्यापक आधार के कारण ही महत्त्वपूर्ण हैं। उनकी रचनाएँ जनसामान्य के जीवन को अपनी पैनी दृष्टि और पूरी समग्रता से देखती हैं। कथ्य की दृष्टि से सुकेश जी की पहुँच बहुत व्यापक और विविध है किन्तु इस बड़ी रेंज में भी वे कहीं शुष्क नहीं होते। संवेदना की नमी हर कथानक में उपस्थित रहती है। उनकी ‘वापसी’ शीर्षक लघुकथा मानवीय मूल्यों की छटपटाहट को व्यक्त करती है। पुल के निर्माण कार्य का निरीक्षण करते समय कुछ बच्चे एक सरकारी अभियंता के निकट आ जाते हैं। कौतुहलवश उनमें से एक दस वर्षीय बालक अभियन्ता से पूछ बैठता है, यह पुल तुम्हीं ने बनाया है, मैं भी तुम्हारी तरह बनना चाहता हूँ। अभियन्ता उस बच्चे की भाव-भंगिमाओं में तैरती जिज्ञासा, सरलता और आत्मीयता में खो जाता है “ अगर मेरे जैसा बनना है तो खूब पढ़ो, लिखो” कहते हुए वह गम्भीर हो जाता है। उसे उस बालक की आँखों में अपने बेटे की झलक दिखाई देती है। लघुकथा यहीं पर अभियन्ता को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करती है कि क्या वह उन बालकों के समूह का रोल मॉडल बनने के योग्य है जिसमें सबसे आगे उसे अपने बेटे का प्रतिरूप दिखाई देता है। यहाँ लघुकथा तंत्र व्यवस्था की पूरी पड़ताल करती है। भ्रष्ट व्यवस्था सरकारी निर्माण कार्यों में गुणवत्ता का कैसे चीर हरण करती है अभियन्ता स्वयं भी जिसमें संलिप्त है किन्तु एक बच्चे के भीतर का विश्वास उसे झकझोर डालता है, आत्मग्लानि से भर देता है। अंततः एक निर्भीक निर्णय की गूँज उसके भीतर से निकल कर बाहर तक फैल जाती है “काम स्पेसिफिकेशन के हिसाब से ही होगा।” लघुकथा में युगीन यथार्थ का चित्रण एक घटना और दो चरित्रों के माध्यम से निरूपित होता हुआ विस्तृत होता है। घटना और चरित्रों का अन्योन्याश्रित सम्बन्ध वस्तुस्थितियों की मीमांसा करता है। सुकेश जी की ऐसी अनेक लघुकथाएँ हैं जो व्यवस्था के कड़वे सच को रेखांकित करती हैं। ‘टेक इट ईजी’, ‘चक्रव्यूह’, ‘यम के वंशज’, ‘मास्टर प्लान’, ‘भेड़िये’, ‘नीति निर्धारक’, ‘चतुर गाँव’, ‘श्रेयपति’, ‘नरभक्षी’, ‘सोडा वाटर’, ‘दीमक’, ‘खरबूजा’, ‘मछली-मछली कितना पानी’ आदि इसी सच को उजाकर करती हैं। ‘सोडा वाटर’ लघुकथा के चीफ साहब और मिस्टर वर्मा, ‘दीमक’ लघुकथा के बड़े साहब या ‘मछली-मछली कितना पानी’ के दबंग युवक जैसे चरित्र सरकारी विभागों और समाज में सर्वत्र फैले हुए दिखाई देते हैं। सुकेश जी की लघुकथाओं के अधिकांश चरित्र परिस्थितियों के बीच से उठकर आते हैं किन्तु बहुत चरित्रों का गठन होता है जो परिस्थितियों को बदलने का हौसला रखते हैं। ‘वापसी’ लघुकथा भी अभियंता इसका उदाहरण है। अंतःकरण की आवाज़ का व्यवहार में रूपान्तरण हमें आश्वस्त करता का है। उनके पात्रों की पार्श्वभूमि में जीवन-मूल्यों के स्थापन की छटपटाहट साफ देखी जा सकती है। उनके पात्रों का चरित्र पर्त-दर-पर्त खुलता जाता है और लघुकथा आदि से अपने अंत तक उनके अंतरंग और बाह्यरंग दोनों से परिचित कराती है। पात्रों की मनः स्थितियों में कथ्य के निष्कर्ष निहित होते हैं जो पात्रों के व्यक्तित्व संगठन के माध्यम से पाठकों तक आसानी से पहुँच जाते हैं। लघुकथाकार अपने युग की समस्याओं के प्रति पूर्णतया जागरुक है और उसके पास उनके समाधान भी हैं जो पाठक को आत्मालोचन के लिए प्रेरित करते हैं। यही कारण है उनकी लघुकथाएँ केवल अवधारणा- मूलक नहीं है। उनके नेपथ्य में उद्देश्य जीवन्त रहता है। रचनाओं में आवेग, आग्रह या विचार थोपने की स्थिति नहीं रहती वरन कथानक सामान्य ढंग से पाठकों पर प्रभाव छोड़ते हैं। ऐसी लघुकथाओं में ‘गोश्त की गंध’ उल्लेखनीय है। मध्यम वर्गीय परिवारों में दामाद की स्थिति बहुत महत्त्वपूर्ण होती है। परिजनों की यही कोशिश रहती है कि उसके स्वागत-सत्कार में कोई कमी न रह जाए। लघुकथा दामाद के माध्यम से सामाजिक व्यवस्था पर गहरा कटाक्ष करती है, मनुष्यता को परिभाषित करती है। व दामाद की छवि का नये रूप में प्रस्तुतीकरण निश्चय ही जीवन मूल्यों के प्रति संवेदनशील बनाता है। लघुकथा आरंभ से लेकर अपने समापन तक अपनी विशेष कहन, शैली व विषय वस्तु के आधार पर लघुकथा साहित्य में अपना महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। लघुकथा की वस्तु और संवेदना को गहरा करने के लिए उत्प्रेक्षा-अन्योक्ति के प्रयोग उनकी भाषिक संरचना को महत्त्वपूर्ण बनाते हैं, यथा “रसोई से स्टोव के जलने की आवाज़ आ रही थी। एकाएक ताजे गोश्त और खून की मिली-जुली गंध उसे नथुनों में भर गई। वह उसे अपने मन का वहम समझता रहा, पर जब सास ने खाना परोसा तो वह सन्न रह गया। सब्जी की प्लेटों में खून के बीच आदमी के गोश्त के बिल्कुल ताजा टुकड़े तैर रहे थे। बस, उसी क्षण उसकी समझ में सब कुछ आ गया। ससुर महोदय पूरी आस्तीन की कमीज पहन कर बैठे हुए थे ताकि वह उनके हाथ से उतारे गए गोश्त रहित भाग को न देख सके। अपनी तरफ से उन्होंने शुरू से ही काफी होशियारी बरती थी। उन्होंने अपने गालों के भीतरी भाग से गोश्त उतरवाया था, पर ऐसा करने से गालों में पड़ गए गड्ढों को नहीं छिपा सके । सास भी बड़ी चालाकी से एक फटा सा दुपट्टा ओढ़े बैठी थी ताकि कहाँ-कहाँ से गोश्त उतारा गया है, समझ न सके। साला दीवार के सहारे सिर झुकाए उदास खड़ा था और अपनी ऊँची-ऊँची नेकर से झाँकती गोश्त रहित जाघों को छिपाने का असफल प्रयास कर रहा था।’
ससुरालियों की विवशता को रेखांकित करने के लिए सब्जी में गोश्त की संभावना एक नया भावबोध उत्पन्न करती है। “मैं आदमी का गोश्त नहीं खाता” प्लेट को धकेलते हुए उसने कहा। अपनी चोरी पकड़े जाने से उनके चेहरे सफेद पड़ गये थे। “क्या हुआ आपको?…सब्जी तो शाही पनीर की है” पत्नी ने विस्फारित नेत्रों से उसकी ओर देखते हुए कहा।
लघुकथाकार दामाद के माध्यम से “मुझे दिल से अपना बेटा समझिए और अपना मांस परोसना बन्द कीजिए।” समझने की मानसिकता पर कटाक्ष करता है। सुकेश जी यही भाषिक संरचना उनके शिल्प को कहलवाकर बड़ा संदेश देता है। मांस यहाँ अन्योक्ति के द्वारा दामाद को अतिविशेष वैशिष्ट्य प्रदान करती है। अन्ततः लघुकथा में दामाद का व्यक्तित्व अपने चरम बिन्दु पर पहुँचकर परिवर्तन की सार्थक पहल करता है।
‘सांसों के ठेकेदार’, ‘अपने-अपने संदर्भ’, ‘दादा जी’, ‘अपने लोग’, ‘जहाँ के तहाँ’, ‘तंगी’, ‘आखिरी पड़ाव का सफर’, ‘हारते हुए’, ‘तृष्णा’, ‘पितृत्व’, ‘स्कूटर’ आदि रचनाएँ पात्रों के माध्यम से समाजगत स्थितियों का गहन मनोविश्लेषण करती हैं। लघुकथाओं के मूलपात्रों की विवशताएँ ● और उनका अन्तर्द्वन्द्व सूक्ष्मता के साथ उभरता है। उनकी लघुकथाओं की सीधी सरल सरचना का कथ्य पाठकों को तुरन्त प्रभावित करता है। वह कभी दुविधाग्रस्त स्थितियों को जन्म नहीं देता। बात कहने का कौशल उनकी लघुकथाओं में सर्वत्र मिलता है। उनकी सरलता में ही व्यंग्य की वक्रता का को प्रहारक बनाती है।
‘इमीटेशन’ लघुकथा बच्चों में संस्कार की अपेक्षा करने वाले मातापिता की संस्कारहीनता का सटीक चित्रण करती है। ब्लू फिल्म देखकर विलासिता को तृप्त करते समय बच्चों की उपस्थिति को सोता हुआ समझकर भूल जाते हैं कि बालमन का कौतूहल कभी भी जाग सकता है, अनुकरण उनके स्वभाव में होता है। इन स्थितियों का चित्रण माता-पिता के सारे नैतिक मूल्यों को धराशायी कर देता है- “आप रात को मम्मी के साथ वी0डी0ओ0 पर जो मूवी देखते हैं उसमें भी तो सब ऐसे ही खेलते हैं…” तरु ने जल्दी से कहा । “आप भी मम्मा के साथ ऐसे…” राहुल बोला। “आपने हमें मारा क्यों…” तरु सिसकने लगी। समाज के वर्ग विशेष का अभिजात दर्प खण्ड-खण्ड होकर कालीन पर बिखर जाता है। लघुकथा एक भीषण विस्फोट करती है जहाँ विलासिता हजारों टुकड़ों में छितरा जाती है। कथ्य में अन्तर्गुम्फित उच्चवर्गीय जीवन शैली का कटु यथार्थ सोचने पर विवश कर देता है कि मूल परिवेश से कट कर जीना हमें कहाँ-कहाँ पराजित करता है। दरअसल विलासिता पूर्ण जीवनशैली और स्वयं में सिमटकर जीने की मानसिकता एक संवेदनहीन चक्रव्यूह का निर्माण कर देती है जिसे भेद पाना सरल नहीं होता। ऐसी स्थितियों को ‘मोह भंग’, ‘कुत्तेवाले घर’, ‘नरभक्षी’, ‘आदमजात’, ‘बिरादरी’, ‘मृगमरीचिका’, ‘गाजरघास’, ‘पैण्डुलम’ आदि लघुकथाओं में व्यक्त होता देख सकते हैं। ‘मोहभंग’ में पारिवारिक रिश्तों का खोखलापन, ‘कुत्तेवाले घर’ में धनिक वर्ग का ‘अहंकार, ‘नरभक्षी’ में ईमानदार कर्मचारी की पग-पग पर पराजय, ‘आदमजात’ में अंधविश्वासों, ‘बिरादरी’ में उपयोगितावादी सोच, ‘मृग मरीचिका’ में क्लब संस्कृति का घिनौना सच, ‘गाजरघास में बुजुर्गों की दयनीय स्थिति तथा ‘पैण्डुलम’ में सास-बहू के तनावपूर्ण रिश्तों जैसे वैविध्यपूर्ण कष्य ध्यानाकर्षित करते हैं। लघुकथाकार का दृष्टिबोध बहुत व्यापक है। वे सूखे पेड़ों पर हरापन लाने वाले लघुकथाकार हैं, वे जानते हैं जहाँ हरापन होगा एक दिन वहाँ नीड़ जरूर बनेंगे। समकालीन परिस्थितियों में सुकेश जी की ‘जागरुक’ लघुकथा प्रासंगिक है। जहाँ एक लड़की बदमाशों के बीच फँसी अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए चीख रही है लेकिन पाश कालोनी की किसी कोठी के दरवाजे नहीं खुलते। एक कुत्ता जोर-जोर से भौंक कर कोठी वालों को जगाने की विफल कोशिश करता है। संघर्षरत लड़की के कपड़े तार-तार हो जाते हैं, लड़की असहाय है बदमाशों को अपने उद्देश्य में सफलता मिलती नजर आती है। बेचैन कुत्ता अन्ततः रोने लगता है, रोने की तेज आवाज को अशुभ मानकर सब बाहर आकर कुत्ते को पीटने लगते हैं। लड़की की लाज लुटने पर कोई ध्यान नहीं देता। लघुकथा पाश कालोनी की संवेदनहीनता पर कटाक्ष करती है। कुत्ते के रोने की आवाज को अशुभ मानकर बाहर निकलने वालों की दृष्टि में बेबस लड़की की चीखों में कोई अशुभता दिखाई नहीं देती। लड़की की लाज का लुट जाना कोई मायने नहीं रखता। यहाँ नागरिक बोध की उदासीनता को संवेदना के धरातल पर कथ्य में रूपान्तरित किया गया है। समाज की इसी उदासीनता का लाभ असामाजिक तत्व उठाते हैं। आज के परिप्रेक्ष्य में ऐसी संवेदनहीनता हमारे मनुष्य होने के औचित्य को व्यर्थ करती है। नगरबोध के संत्रास और तनाव की अभिव्यक्ति लेखक लघुकथा के स्तर पर करता है। यंत्र सभ्यता मैं ऐसा संत्रास भोगने का अभिशाप अधिक गहराता जा रहा है। अब यह स्थितियाँ पाश कालनियों में ही नहीं आम स्थानों और गली मोहल्लों तक उतर आई हैं। जहाँ नागरिकों का मौन गुण्डों का दुस्साहस बनता जा रहा है और भीड़ एक इकाई में बदलती जा रही है। मानवीय संबंधों के विघटन व जीवनमूल्यों के टूटने की त्रासदी उनकी कई लघुकथाओं में रेखांकित होती हैं। ‘त्रिभुज के कोण’, ‘मृत्युबोध’, ‘बिजेता’ आदि इसका उदाहरण हैं। इन लघुकथाओं में बिखराव की त्रासदी के बीच भी कथ्य के केन्द्र में संवेदना का ऐसा घनत्व विद्यमान है जो सचेत करता है कि जीवन मूल्यों के संरक्षण में ही सामाजिक सम्बन्धों की जीवन्तता सुरक्षित रह सकती है। लघुकथा में अन्तर्लीन विचार तत्त्व आपको ठहरने के लिए बाध्य करता है। शब्दों के संकेत इतने हल्के और बारीक कि उनको पकड़ने के लिए उनके समानान्तर चलना पड़ता है। सुकेश जी की चर्चित लघुकथा ‘ठण्डी रजाई’ इसकी बानगी है। पड़ोसी द्वारा रजाई माँगने पर पहले इंकार कर देना, किन्तु इंकार के बाद मन में ठहर गई बेचैनी से अपनी रजाई का और ठण्डा लगना। बाद में पड़ोसी के घर रजाई पहुँचा देने पर गर्माहट का सुख अनुभव करना, मानवीय संवेदना का उत्कर्ष प्रस्तुत करता है। लघुकथा का शब्द विन्यास अन्तर्वस्तु के साथ अद्भुत आनुपातिक रिश्ता निभाता है- “एक बात कहूँ, बुरा तो नहीं मानोगी” पति ने कहा। “कौन सी बात करते हो?” “आज जबदस्त ठण्ड है, सामने वालों के यहाँ मेहमान भी आये हैं। ” “हाँ, तो?” उसने आशा भरी नज़रों से पति की ओर देखा । “मैं सोच रहा था….मेरा….. मतलब यह था कि… हमारे यहाँ एक रजाई फालतू ही तो पड़ी है।” “तुमने तो मेरे मन की बात कह दी, एक दिन के इस्तेमाल से रजाई घिस थोड़े ही जाएगी।” वह उछलकर खड़ी हो गयी, मैं अभी सुशीला को रजाई देकर आती हूँ। वह सुशीला को रजाई देकर लौटी तो उसने हैरानी से देखा, वह उसी ठंडी रजाई में बोड़े बेचकर सो रहा था। वह भी जम्हाइयाँ लेती हुई अपने बिस्तर में घुस गई। उसे सुखद आश्चर्य हुआ, रजाई काफी गर्म थी’ आदि में शब्द और उनके संकेत अपनी लघुता में भी लक्षणा के प्रयोग से कितने बड़े हो जाते हैं। जो जीवनमूल्यों की सघन स्थापना करते हैं। ‘धुएँ की दीवार’, ‘अनुताप’, ‘ओएसिस’, ‘बापसी’, ‘मास्टर’, ‘रास्तों से दोस्ती’, ‘काला घोड़ा’, ‘सन्नाटा’, ‘खारापानी’, ‘अन्ततः’, “आक्सीजन’ आदि लघुकथाएँ मानवीय मूल्यों के स्थापन में अपना योगदान करती हैं। ‘मास्टर’ लघुकथा स्पष्ट करती है कि मनुष्यता की सबसे अधिक पहचान मेहनतकश लोगों में होती है, “चालीस साल हो गए यह काम करते हुए। जूते चप्पल हाथ में आते ही हमसे बतियाने लगते हैं … हमने अपना पूरा मेहनताना ले लिया।” इस लघुकथा का एक ही संवाद मानवीय रिश्तों की पक्की बुनियाद रख देता है। इसी तरह ‘खारा पानी’ लघुकथा की सगुनिया कहती है, “आँसुओं की बरसात को रोका •जाए-मुख्यमंत्री जी भी उसी कुएँ का पानी पीएँ जिससे प्रदेश की जनता पीती है।” इनकी लघुकथाओं की खूबी है, वे शब्दों से संवेदना के चित्र बनाती हैं। कहीं-कहीं वे इतनी व्यंजक हो जाती हैं कि उनकी अर्थवत्ता को समेटेने के लिए कई बार लघुकथा पढ़ते-पढ़ते आँखे बन्द करनी पड़ती है ताकि अर्थ आत्मसात हो जाएँ, कहीं बाहर न निकल सके। उनकी कल्पना अपने कथानक के लिए बिम्बों प्रतीकों और शब्दशक्तियों का प्रयोग करती हैं। अभिधा के साथ कथ्य को प्रभावशाली और मार्मि बनाने के लिए लक्षणा और व्यंजना अपनी सार्थक भूमिका निभाती हैं। संवाद योजना को गहराई और पैनापन इन्हीं शब्दशक्तियों से मिलता है। उनके बिम्ब समकालीन यथार्थ के अर्थ रूपान्तरण में गाँ छाप छोड़ते हैं। ‘प्रतिमाएँ’, ‘गोश्त की गंध’, ‘ठंडी रजाई’, ‘कस्तूरी मृग’, ‘मैं और वह’, ‘कुछ’ ‘स्कूल’ आदि लघुकथाएँ विविध आयामी अर्थवत्ता को साथ लेकर चलती हैं। साम्प्रदायिक सोच है अन्धे कुएँ में तेज रोशनी डालती हैं ‘तौबा’, ‘शिनाख्त’, ‘चादर’, ‘आइसबर्ग’ जैसी चर्चित लघुकथाएँ अपनी व्यंजना में भयावह साम्प्रदायिक यथार्थ की पुनर्व्याख्या करती हैं।
वे एक प्रयोगधर्मी रचनाकार हैं अतएव शिल्प और प्रारूप की बहुलता उनके रचना संसा को विशिष्ट बनाती हैं। ऐसे प्रयोग उनकी कहानियों में भी हैं और लघुकथाओं में भी। ‘आई दुनिया’, ‘कोलाज’, ‘नब्ज’, ‘उतार’, ‘खेल’, ‘दाहिना हाथ’ आदि अपनी शिल्पगत नव्यता के कारण ध्यान खींचती हैं। सुकेश साहनी के शिल्प का सबसे महत्त्वपूर्ण अंग उनकी वर्णन शैली है। उनकी लघुकथाओं के मनोविश्लेषण, विचार या भावानुभूति अपनी सीमा से बाहर नहीं होते वर्णनात्मकता इन तीनों के अधीन रहती है। लाक्षणिक भाषा, अनुभूति की सघनता, सांकेतिकत अलंकारिकता आदि शिल्प को ऊँचाई देते हैं। मुख्यता उनकी लघुकथाओं का केन्द्रीय त चरित्र रचना है क्योंकि अधिकांश बातें वे चरित्र के माध्यम से ही कहते हैं अतः सर्वाधिक भी चरित्र गठन की ओर रहता है। शिल्प की शेष विशेषताएँ इसी के अनुरूप चलती हैं। रजाई’, ‘मेढ़कों के बीच’, ‘गोश्त की गंध’, ‘कस्तूरी मृग’, ‘मास्टर’, ‘प्रतिमाएँ’ ‘ईश्वर’ आहे लघुकथाओं की रचना एकदम क्लासिकल है। सुकेश जी की अनेक रचनाएँ विश्वस्तरीय मान स्थापित करती हैं। ‘मैग्मा और अन्य कहानियाँ (कहानी संग्रह), ‘डरे हुए ‘लोग’, ‘ठंडी रजाई लघुकथा संग्रह आदि के साथ अनेक संग्रहों का सम्पादन उनके विधागत समर्पण की मिसाल है ‘मैग्मा’ कहानी सहित अनेक लघुकथाओं का जर्मन भाषा में अनुवाद, ‘आइसबर्ग’ अंग्रेजी’ अनुदित लघुकथा संग्रह सहित देश की मलयालम, गुजराती, बंगाली एवं पंजाबी भाषाओं लघुकथाएँ अनुदित हैं। सुकेश जी की लघुकथाओं के वैविध्य और वैशिष्ट्य को छोटे से आली में समेटना सम्भव नहीं, उनका रचनाकार्य शोध का विषय है। अस्तु देश और देश की सीमा लाँघ चुकी उनकी रचनाशीलता निरन्तर समृद्ध होती रहे यही शुभकामना ।
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