गढ़वाली अनुवाद : डॉ. कविता भट्ट
सासुजी मीं मूँ रौणौ आँणि छै । औं तैं नहौण धुलौण घुमौण, कपड़ा लत्ता, खाणों सब्बि काम मि पर ही पंण छा ।थोड़ा कठिन लगी । याँका कारण मिन नौकरियांण ढूँढण शुरु कर दे । पर मिली ई नी। तबि पता चली गळी का सफ़ाई कर्मचारी की पन्द्रह – सोलह बर्सै नौनी च। वीं की दगड़ बात करी त वु वीं तैं काम पर भेंजणौ तैं तैयार ह्वे गी । मिन वे तैं समझै द्याइ कि वु कै तैं बताऊ ना कि वेकी बेटी इख काम करदि च। सासुजी तैं त बिलकुल ई पता नी चल्यूँ चैन्दू ।
राधा सासुजी का सब्बि काम पूरा मन सि करदी । वूँ का ई कमरा म सेन्दि छै। सासुजी ख़ुश छै अर मि निश्चिंत ।
कई मैना बिति गेनि। एक दिन मि घौर म नि छौ । वे दिन राधा कु भाई घौर पर ऐ गे। क्वी रिश्तेदार अयाँ छा अर वेकी माँ न वे तैं घौर बुलै छौ । वींका भाई बिटि सासुजी तैं पता चलि गे कि राधा कैं जातैं च । मि सासुजी क समणी जाण से डन्नु छौ कि वूंका गुस्सा तैं कनक्वे झेली सक्लु । वु ठैरी जात- पात, छुआ-छूत म विश्वास कन्न अर नित्य नियम कन्न वाळि जनानी ।
वूँन मि तै बुलाई। मि डरदु डरदु वूं मूं गयौं। वूँन बोलि ,”ब्वारी , तु जाणदी छै कि राधा कैं जातै कि छै ।”
” जी सासुजी” मिन छुट्टू सि जवाब द्याई।
“क्वी बात नी च ब्वारी, जब अपड़ा सेवा नी करि सक्वन त परायों की क्य जात, जु सेवा करू वि च जाति थाती ।
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