“क्या हुआ? चिल्ला क्यूँ रहा है?”
“थारे घणी पीड़ हो री दिखे?”
“अरे! उम्र तो देख ले सामने वाले की।”
“के बात करे से। पिछतर सूँ ऊपर आले ने प्रधानमंत्री मोदी जी पार्टी सूं बारे काड दियो है तो अब मेट्रो भीतर भी सीट रो आरक्षण क्यूँ?”
“तो समाज में मां-बाप की इज्ज़त बंद कर दें क्या?”
“देख भाई, बहस तो करे मती, थारे भी घरे थारा मां-बाप होवेला, थारे तकलीफ़ है तो तू उठ जा, बैठण दे बूढ़ा ने।”
फिर दोनों अचानक चुप हो गए और अपने-अपने मोबाइल में झाँकने लगे।
बुजुर्ग दिखने वाले सज्जन शांत भाव से खड़े रहे।
मेट्रो अपनी गति से आगे बढ़ रही थी।
मुकेश पोपली, ‘स्वरांगन’, ए-38-डी, करणी नगर, पवनपुरी, बीकानेर-334003
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