जिंदगी बीत गई थी। पति को गुज़रे भी ज़माना हो चला था। बच्चे नए सफ़र की उड़ान पर थे।
वह भी अब अपने मन का करना चाहती थी। थोड़े पैसे जमा थे उसके पास। साग भाजी का खर्चा तो गाँव के खेतों से ही पूरा पड़ जाता था, दाई माँ जो थी वह उन सब के घरों की। उससे मालिश करवाते ही औरतें भली चंगी हो जाती और उसे अच्छा खासा मेहनताना देती थीं।
अब तो उसका बस एक ही सपना था जो दिमाग पर हावी होने लगा था। इससे पहले कि उसकी साँसें थम जाएँ और दिल की दिल में रह जाए, इन खयालों में डूबी वह उठ बैठी। पलंग के नीचे पड़े बक्से को बाहर निकाल, पोटली में रखे पैसे देख पुरसुकून हो, मन ही मन सुबह निकलने का निश्चय कर लेट गई।
वृंदावन जाकर वहीं बस जाने का सपना अब उसे धीरे- धीरे नींद के आगोश में लेने ही लगा था कि अचानक दरवाज़े पर आहट हुई।
थप्प… थप्प…
“कौन?” वह चौंककर उठ बैठी
“ताई.. मैं नक्कु!”
“नक्कु…ओह…”-दरवाज़ा खुलते ही दर्द से कराहती वह वहीं लुढ़क गई।
नौ महीने की गर्भवती नक्कु जमील की घरवाली थी। जबसे वह शहर गया, वापिस नहीं आया था।
उसे पलंग पर लिटा वह पानी गर्म करके ले आई।
दर्द से जर्द पड़ता चेहरा देखकर वह घबरा गई। फिर भी उसे हौसला देती हुई बोली, “तू डर मत, सब ठीक हो जाएगा, बस हिम्मत रख।”
बच्चे के रुदन के साथ ही नक्कु चल बसी।
दुःखी मन से उसने बच्चे को साफ़ कपड़े में लपेटा और पड़ोसियों को आवाज़ दी। आवाज़ सुनते ही वे चले आए।
भोर की पहली किरण के साथ नक्कु के पार्थिव शरीर को मिट्टी के हवाले कर बच्चे को ले, वह अपने कमरे में लौट आई और उसने धीरे से बक्सा वापिस पलंग के नीचे सरका दिया।
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