स्वाति अब सातवीं कक्षा में आ गई है। माहवारी आने के साथ उसके शरीर में अब बदलाव आने लगे हैं।
स्कूल से लौटने पर मम्मी का पहले की भाँति उससे प्रश्न पूछना अब भी जारी है…”क्या स्कूल के टॉयलेट में गई थी?”
“ कोई शिक्षक तुम्हारा हाथ तो नहीं पकड़ता?”
“अकेले में तो नहीं बुलाया…”
“कोई तुम्हारी तरफ घूरता तो नहीं…”
“किसी से तुम खाने की चीजें तो नहीं लेती हो…”
“वैन का ड्राइवर तुम्हें छूने का प्रयास तो नहीं करता…”
“ये मम्मी को क्या हुआ है अब? पहले तो कभी ऐसे प्रश्न नहीं पूछती थीं…” झुँझला उठी स्वाति…
कभी वो समय था, जब मम्मी रसोई में रोटियाँ बेलते हुए प्यारे, परवाह भरे, मजेदार, मेरे मनपसंद प्रश्न पूछती थीं…
“बेटा, लंच में आज मैंनें बर्गर रखा था, अच्छा लगा न, खाया भी या बाँट दिया? म्यूजिक पीरियड में क्या किया? कौन-कौन से गेम खेले? आज आर्ट्स एंड क्राफ्ट के पीरियड में क्या बनाया? होमवर्क पूरा न करने पर किसी ने डाँटा तो नहीं?
स्वाति आज तेरे प्यारे दोस्त निशान्त से झगड़ा तो नहीं हुआ?
“क्या मम्मी! आप भी न, कितना ख्याल रखती हो मेरा, कह कर स्कूल से लौटने के बाद कंधे से स्कूल बैग उतारते ही मैं झट से मम्मी के गले लग जाती थी। जब कभी मम्मी प्रश्न नहीं पूछती थीं, तो मैं खुद शुरू हो जाती थी, आज मैंने ये किया… वो किया… आज तो मम्मी निशांत को मैंने चपेट मार दी, बड़ा समझता था अपने-आप को…”
वह यूनिफार्म बदलने कमरे में जाने लगी, मम्मी की प्रश्नावली जारी थी, “कोई तुम्हारी अत्यधिक प्रशंसा तो नहीं करता…”
आखिरी प्रश्न पर स्वाति सचेत हो गई…उसकी साँसें अटक गईं,
” भाटी सर…”
कंधे से बैग पटककर, बिना यूनिफॉर्म बदले वह दौड़ी आई और फिर से मम्मी के गले लग गई।
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