रोचिका अरुण शर्मा
वह अपनी बेटी मायरा के टैलेंट शो में चयन की खबर सोशल मीडिया, दफ्तर के मित्रों और रिश्तेदारों को देकर बदले में बधाइयाँ बटोर रहा था ।
मायरा की नानी ने उत्सुकता जताई- “तो फिर मायराऑडिशन के लिए कब जा रही है मुम्बई?”
“जी बस अगले हफ्ते की फ्लाइट बुक की है।”
पलक झपकते ही हफ्ता भी बीत गया और टी.वी. पर दिखाए जाने वाले टैलेंट शो में अपनी नातिन को देखकर नानी भी अड़ोसी-पड़ोसियों के बीच उसकी तारीफ़ में कसीदे पढ़ रही थीं । शो समाप्त होते ही मायरा ने मुम्बई घूमने की जिद की। कैब में मुम्बई के मुख्य दर्शनीय स्थल देखकर जब मायरा लौट रही थी, अचानक ही उसके कदम ठिठक गए । वह वहाँ जमा हुई भीड़ की तरफ चल पड़ी और उसी भीड़ का हिस्सा बन तमाशा देखने लगी।
“चलो-चलो हमें देर हो रही है, शाम की फ्लाइट है।”
पर पापा मैं यह शो देखना चाहती हूँ, यह लड़की रस्सी पर क्यों चल रही है ?
“बेटे यह इसका रोजगार है”
इसने हाथ में स्टिक क्यों पकड़ी है?
“अपना संतुलन बनाने के लिए।”
यदि इसके पैर के। अँगूठे और उँगली के बीच पकड़ी हुई प्लेट छूट जाए तो?
“नहीं गिरेगी, इसको ग्रिप बनाना आता है।”
“जब यह चलती है तो देखो न रस्सी कितनी तेज स्विंग करती है, यदि यह स्वयं गिर जाए तो?”
अपनी हम उम्र आठ वर्षीय लड़की को रस्सी पर चलते देख बाल मन में उपजे सवाल एक ही साँस में मायरा ने पूछ डाले थे ।
“ऐसा कुछ नहीं होगा, शी इज टैलेंटेड, उसने रस्सी पर चलना बचपन से सीखा है।”
“पर यह सड़क पर तमाशा क्यों करती है?”
“यह लड़की बहुत गरीब है मायरा इसे पैसे कमाने के लिए यह शो करना पड़ता है।”-पिता का दिल भर आया था ।
“पर इस शो को क्या कहते हैं पापा?”- मायरा के मन में अपने सवाल का उत्तर जानने की जिज्ञासा बढ़ गई थी।
ठीक से याद तो नहीं आ रहा पर आँखों में नमी थी और होठों पर सिर्फ तीन शब्द “शायद रोटी शो।”
तभी मायरा की नानी का फोन आया- “नानी विडिओ ऑन करो, मैं आपको रोटी शो दिखाउंऊँ” मायरा नानी को विडिओकॉल में रस्सी पर चढी लड़की दिखाने लगी थी।
“नानी यह लड़की टीवी वाले टैलेंट शो में रोटी शो क्यों नहीं दिखाती?”
जब पेट की भूख सताती है, तब यह टैलेंट आता है मायरा, इसके ऑडियंस भी सिर्फ सड़क पर ही मिलते हैं ।
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