अँगुलियों में आसानी से गिने जा सकने वाले साथियों में व्यस्त रहने वाली कामकाजी आधुनिका ने अपने नौजवान पड़ोसी को शायद कभी भी अधिक महत्त्व नहीं दिया। एक अनचाहा मेहमान, सफल कूटनीतिज्ञ और महत्वाकांक्षी युवक की छवि समेटे हुए सहकर्मी के रूप में ही उसे देखा और समझा गया। अक्सर बची हुई रसोई को करीने से परोस दिया जाता उसके सामने। वह रसोई ,जो कभी भी उसके नाम से नहीं बनती थी, मगर अक्सर ही बच जाती थी उसी के नाम के लिए और तृप्ति की लकीरें साफ़- साफ़ देखी जा सकती थीं, चाव से खाने वाले पड़ोसी के चेहरे पर।
बातों का अंतहीन सिलसिला,ख़्वाबों की लम्बी उड़ान और रोज़मर्रा की ज़िंदगी के सैकड़ों दाँवपेंच! सुनने वाली सुनना चाहे न चाहे , वह बस सुनाता ही चला जाता…….।
विचार-शृंखला सहसा थम जाती ।
आज की बात कुछ ख़ास है।
आज फिर से बनी है रसोई, कई पकवान अपनी महक से आसपास के वातावरण को सुवासित कर रहे हैं। खीर,पूरी, बड़ा, सब्ज़ी,दाल, रायता,चावल, चटनी और सूखे मेवों के साथ-साथ सलाद भी। बस परोसना और जीमना ही तो शेष रह गया।
आज सबसे पहले सजेगी थाली पड़ोसी की। सबसे पहले वह जीमेगा फिर आएगी बारी गृहस्वामिनी की।
बहुत -बहुत याद आ रहा है आज पड़ोसी।
ऐसा प्रतीत हो रहा है – जैसे रसोई का कोना -कोना जुड़ी हुई हथेलियों के साथ निवेदन कर रहा हो कि आ भी जाओ और ग्रहण करो अपना हिस्सा, कम करो बोझ मेरे मन का।
आँखो में छाए नमी के बादल आख़िर बरस ही पड़ते हैं उसकी याद में।
आख़िर बारहवीं है आज असमय जाने वाले पड़ोसी की।
दो दिन का बुख़ार और जीवन लीला ख़त्म।
ऐसे भी कोई जाता है क्या?
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