अनुवाद: डॉ कविता भट्ट ‘शैलपुत्री’
मेरू लेख एक बड़ी पत्रिका माँ सम्मान सि प्रकाशित ह्वे। मिन मुग्ध ह्वे कि पत्रिका क वे लेख क पन्ना पर हाथ फेरी , जन क्वी माँ अपड़ा छुटा सि बाळा तैं प्यार दुलार करदि। द्वी मैंना पैलि कु चित्र मेरी आँख्यूँ क समणि घूम गे।
जन्नि इ मिन अपडू कम्प्यूटर खोलि क पासवर्ड टाइप कै, वेन अपडू कम्प्यूटर बंद कैरी अर इन बात सुरू कैरि देन जु क्वी जरूरी नी छै। मिन कम्प्यूटर बंद कैरी दे अर वेकि बात सुणण लगि ग्यों कि वेन अपडू कम्प्यूटर खोलिक कुछ लिखण सुरू कैरी दे अर बोलण बंद कैरी दे।
आधा घंटा बीति गे। मि तैं लगि , अब बत्थ ख़त्म ह्वे गेन। मिन फीर कम्प्यूटर ख्वेलि अर दूसरी पंक्ति लिखण सुरू इ करि छै कि वेन अपडु कम्प्यूटर बंद कैरि दे अर मि तैं इन घुन्न लगि गे, माना कि मि कम्प्यूटर पर अपड़ा बोय फ्रेंड कि दगडि से चैट कन्नु रै हों।
मिन ठंडू कै कि बोलि-“मि तैं एक पत्रिका क तैं एक लेख भेजण च।”
वेन टेरी आँखि न मि पर हैंसी उडाण क ढंग से देखि , माना मि क्वी काली छौं अर मि तैं क्य लिखण कु सगोर छैं च।
वेन पूछी-“टॉपिक क्य च?”
मिन बतै द्याई, त वेन बोली- ”ठीक च, मि लिखि देन्दौं, तु अपड़ा नौं से भेजि दि। इन्नि कुछ बि नि लिखे जाँदु। समझ हो तबि लिख्यूँ चैन्दू।”
मिन बोली – “जब तुमुन ही लिखण, त अपड़ा ई नौं से भेजि द्यावा ।” फिर मिन कम्प्यूटर बंद कैरी द्याई ।
रात म मिन लेख पूरू कैरिक पत्रिका म भेज्यालि छौ ।
पत्रिका अबि बि मेरी टेबल पर रखी च क्य करौं ! दिखौं वे तैं !! मन इ मन बोलि- क्वी फैदा नी !
पत्रिका अबि बि मेरी मेज पर रखीं च। जब वु ईं देखलु त? … सोचदु इ मेरु आत्मविश्वास हौरि बि बढी गे।
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