‘‘……अच्छा! रमा की माँ अब चलती हूँ। बच्चों के आने का वक्त हो गया है।’’ राधा की माँ ने सोफे से उठते हुए कहा था।
‘‘बैठी रह ना बहन। मेरा मन लगा रहेगा। वैसे भी तुझे घर पर कौन-सा काम करना है।’’-रमा की माँ की वाणी से अपनापन झलक रहा था।
‘‘ काम तो नहीं करना… काम तो बहुएँ कर लेती हैं। वो तो दोनों बेटे काम से आकर मेरे पास बैठते हैं। वे दो बातें अपनी कह लेते हैं, चार मैं सुना देती हूँ। बस, मन शांत हो जाता है। रात में ठीक से नींद आ जाती है। सुबह तन-मन बिलकुल रूई के फाहे-सा हल्का होकर हवा में उड़ता-सा लगता है।’’
‘‘….. तुम्हारे बच्चों का क्या हाल है आजकल?’’ राधा की माँ ने चलते-चलते पूछ ही लिया था।
‘‘ मेरे बेटों के फोन आते रहते हैं। एक का फोन आया था- कह रहा था,घरवाली के जन्मदिन पर नई गाड़ी खरीदी है। इस बार बच्चों को महँगे वाले स्कूल में डाल रहे हैं। और दूसरा, उसकी तो पूछो ही मत बहन, उसके तो टूर ही खत्म नहीं होते। एक देश से दूसरे देश।….बस, उन देशों के बीच अपना घर ही नहीं आता…।’’ उसकी आवाज से माँ होने का दर्द खुद बोल रहा था।
‘‘रमा की माँ तुझे तो खुश होना चाहिए, तेरे बच्चों के पास सब कुछ हैं। और एक हमारे बच्चे हैं, सुबह काम पर जाते हैं शाम को लौटते हैं….।’’
‘‘हाँ, सब कुछ है मेरे पास… बस, एक चीज की कमी है…।’’
‘‘कमी! और तेरे पास.. क्यों मजाक करती हो रमा की माँ।’’
‘‘मजाक नहीं, सच कहती हूँ। ….रात भर जल से अलग हुई मछली की तरह तड़पती रहती हूँ।……तेरे जैसी नींद नहीं हैं, बहन, मेरे भाग्य में ।’’ ऐसा कहते हुए उसकी आँखें न जाने क्यों नम हो गईं।