अनुवाद; रश्मि विभा त्रिपाठी

लाल बत्ती केर नगीच अठहीं-दसहीं बरस क्यार लरिका गोहरावति रहै।
“गुब्बारा लइ लेओ। गुब्बारा लइ लेओ। रंग-बिरंग गुब्बारा लइ लेओ।”
गुब्बारा अपुसा बतकही करति रहैं।
हरियर रंग क गुब्बारा ललक्के गुब्बारा ते पूछिसि, “अच्छा भाखहु। तुम्हरी अखीर साधि का हवै?”
ललक्का गुब्बारा तनी सकुचाइसि। बहोरि भाखिसि,
“मैं चहति अहौं कतौ कवनिउ बचवा केर जनम दिनु माँ सजावा जावहुँ”। ”
“अउर नील गुब्बारा। तुम्हरी साधि?”
“मैं चहति अहौं कवनिउ भव्य अटारम क्यार हींसा बनउँ।”
“अउर धँवर गुब्बारा। तुम्हरी अखीर साधि का हवै।”
“मोरि अभिलाख हवै कि स्वतंतरता दिवस प मोहिका उघरे असमान माँ छाँड़ि दीन्ह जावइ।”
“अउर तुम्हरी का साधि हवै?” ललक्का, नील अउर धँवर गुब्बारा याकइ संघै हरियर गुब्बारा ते पूछिन्ह,
“मोरि साधि हवै कि ई लरिका मोहिका ब्याँचइ क बजाय मोरे सन ख्यालै” हरियर गुब्बारा उत्तर दीन्हिसि प वहिकी गोहारि गाभै नीबर लागि रही रहै।