जून 2026

देशपेट     Posted: May 1, 2022

अमोधा मजदूरी करता है। पिछले एक सप्ताह से घर पर बैठा है काम नहीं लगा। वह मिश्राईन जिज्जी को जानता है। वे बहुत दयालु हैं। उनके नाती का परसों जन्मदिन था। खूब अच्छे-अच्छे पकवान बने थे। मिश्राईन थोड़ा तो खाना बनाती नहीं है। उसी में से बच गया था काफी खाना। अमोधा उनके घर के सामने से निकल रहा था सो आवाज दी थी, ‘अमोधा।’

‘जी जिज्जी।’

‘कुछ खाना रखा है। परसों नाती का जन्मदिन था। उसी का बचा हुआ। ले जाओगे। बच्चे खा लेंगे। अच्छा खाना है।’ लगभग बेकार हो चुके खाने को अच्छा खाना बताते हुए मिश्राईन ने कहा था।

‘जिज्जी अभी काम देखने जा रहे हैं लौटकर आकर ले लेंगे।’ दोनों हाथ जोड़कर बोला था अमोधा।

‘अभी ले, तो ले ले, नहीं तो मैं कुत्ते को फैंक दूंगी।’ न जाने क्यों गुस्सा आ गया था मिश्राईन को।

अमोधा एक पल को रुका। सिर से अंगोछा बाँधे था। उतारा और दोनों हाथ फैलाकर बोला, ‘तो ले आओ जिज्जी।’

मिश्राईन दो दिन पहले अपने नाती के जन्मदिन का बचा हुआ खाना एक पॉलीथिन में भरकर ले आई थी। अमोधा ने पॉलीथिन अपने अँगोछे में बड़ी अच्छी तरह से रख ली थी।

मैं देख रहा था। मेरे तन बदन में आग लग गई। मिश्राईन पर तो गुस्सा आया ही कि इस बुसे (खराब हुए) हुए खाने को एक गरीब को दे रही है और ये…….ये अमोधा इसमें जरा भी स्वाभिमान नहीं है जिस खाने को कुत्ते को दिया जाना है उसे ही ले लिया। सम्मान मर गया है क्या।

जब मिश्राईन अंदर चली गई तो मैंने अमोधा से पूछा, ‘क्यों रे, जो खाना कुत्ते को दिया जाना था उसे तुझे दे दिया और तूने उसे ले भी लिया। साले, तू कुत्ते से भी गया गुजरा है………..मान-अपमान नाम की चीज होती है कि नहीं……..स्वाभिमान मर गया है तुम्हारा, सालो।’

उसने मुझे देखा। कतई गुस्सा नहीं हुआ। बहुत विनम्रता से बोला, ‘साहब मान, सम्मान, स्वाभिमान सब जानते हैं हम…..पिछले सात दिन से काम नहीं लगा। घर में अन्न का एक दाना भी नहीं है। दो दिन से चारों बच्चे भूखे हैं। ये…ये खाना ले जाएंगे तो वे पेट भरकर खा लेंगे।’ फिर अपना पेट खोलकर दिखाते हुए बोला था, ‘पेट…पेट, समझते हैं आप….।’ मैं बड़ी देर तक देखता रहा था उसे फिर उसे अपनी दोनों बाहों में भर लिया था।  हम दोनों न जाने क्यों बड़ी देर तक बिलखते रहे थे।

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