1-प्रायश्चित
महेन्द्र सिंह ‘उत्साही’
महेन्द्र सिंह ‘उत्साही’ की लघुकथा ‘प्रायश्चित’ में रचनाकार ने अपनी स्वाभाविक संवेदनशीलता व सूक्ष्म ग्राहिका शक्ति से मानव जीवन के एक सहज मनोहारी रूप का, एक दिव्यभावापन्न छवि–छटा का कौशलपूर्ण अंकन करना चाहा है। प्रौढ़ पिता बराबर असहज हो जाता है पर बालक बराबर सहज ही बना रहता है उसमें यदि कुछ छल–छद्म, आक्रोश–रोष, आवेश–आवेग आता है तो पर्वती नदी की बाढ़ के पानी की तरह तुरन्त बह जाता है और बालक पुन: अपने सहज स्वभाव में संकलित हो, सहज स्नेह की प्रेमिल मूर्ति बन जाता है। शिशुत्व में संतत्व समाहित है या फिर मातृत्व! इसीलिए बालक देवदूत होता है और उसकी सृष्टि,स्वर्ग–सृष्टि। प्रस्तुत रचना में प्रौढ़ पिता क्रोधांध हो अपने बालक–पुत्र को खूब पीटता हे पर वही बालक कुछ ही क्षणों बाद अपने समस्त निश्छल प्रेम–प्रवाह के साथ, अपनी समस्त स्नेह–सुधा के लिए पिता के पास पहुँचता है और उन्हें विस्मय–विमुग्ध, भावविभोर कर उनकी अन्तर्सत्ता में एक गहरी क्रान्ति का, एक दिव्य रूपातंरण का माध्यम, मसीहा बन जाता है। पिता बालक पुत्र के सहज स्नेह की अविरल अखंड सुधा–धार में स्नान कर कृतकृत्य हो जाता है–स्नेहाप्लावित, स्नेहाक्रान्त, स्नेहाभिभूत हो बच्चे को गले लगा लेता है और उस पर अपना स्नेह–वर्षण करने लगता है। शिशु की निश्छल स्नेह धार ने पिता को स्नेह–सक्रिय बना दिया है। बालक पुत्र के इस स्नेहाप्लावन को तथा प्रौढ़ पिता पर पड़े उसके अमृत प्रभाव को रचनाकार ने बड़ी कुशलता से आँका है। मानव जीवन के इस सहज शाश्वत सत्य को पुन एक बार परिचित–प्रतिष्ठित कराने के लिए रचनाकार हमारी बधाई का हकदार तो हो ही जाता है, अनन्त मानव जीवन से संबंधित ऐसे शाश्वत विषय लघुकथा की सम्पूर्ण सृजनात्मक क्षमता को भी सिद्ध कर देते हैं। रचना प्रथम कोटि की है।
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2-एहसास
माधव नागदा
माधव नागदा की लघुकथा ‘एहसास’ भी शिशु के सहज स्वच्छ निश्छल स्नेह से संबंध रखती है। शिशु सदैव उदार मन का होता है–प्रेम, सहानुभूति, सद्भाव से भरा। इसका एक और उदाहरण प्रस्तुत है इस रचना में। महेन्द्र सिंह ‘उत्साही’ और नागदा की लघुकथाओं में बहुत कुछ साम्य लक्षित है। दोनों रचनाएँ शिशुत्व का गौरव–गायन करती हैं। एक में क्रोधी पिता पराजित होता है अपने बाल–पुत्र की खूबसूरत खुशबूदार इंसानियत से, उसके देवसुलभ प्रेम–सहानुभूति के विस्तार से। दोनों रचनाएँ इंसानियत की खुशबू से सरोबार हैं, दोनों बच्चों के स्वच्छ निश्छल प्रेम की विजयगाथा, प्रेम की सर्वजयिता को उद्भासित करती हुई। ऐसी लघुकथाएँ निश्चित रूप से इस विधा का गौरव वर्णन करती हैं और पाठकों में यह आश्वस्ति जगाती हैं कि लघुकथा विधा में श्रेष्ठ रचना संभव है यानी इस विधा में भी शाश्वत विषयवस्तु का निर्वाह बड़े कलात्मक कौशल व सृजनात्मक शिल्प के साथ किया जा सकता है बशर्ते कि रचनाकार की अन्तर्सत्ता उस विषय वस्तु की मूल संवेदना–धारा में काफी देर तक डूबी हो, उसकी सूक्ष्म अन्तदृर्ष्टि काफी विकसित हो तथा भाषा की संस्कार–चेतना उसके प्राणों में रमण करती हो। प्रथम कोटि।
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3-श्रम
महावीर जैन
महावीर जैन की लघुकथा ‘श्रम’ में एक नई ज़मीन एक नए ढंग से तोड़ी गई है जिसमें बहुत कुछ चमत्कार जैसा उत्पन्न हो गया है। सामान्य चिंतन से परे जाकर कुछ चमत्कारिक चिंतन प्रस्तुत किया गया हैं इस नव्य चिन्तन ने श्रम की मर्यादा तो स्थापित कर ही दी है, जीवन में कर्मठता को, जिजीविषा को नव गरिमा प्रदान की है। इस नव चिंतन ने बुज़दिली और कायरपन, ‘फेटलिन्स’ और भाग्यवाद, निष्क्रियता और अकर्मण्यता के मुँह पर करारा तमाचा मारा है, उस पर जबर्दस्त, आक्रमण, ज़ोरदार प्रहार, ज़बर्दस्त ‘बम्बार्डमेण्ट’ किया है। वस्तुत: यह रचना जिजीविषा का दुन्दभी–नाद है, जीवन का गायन है, जिजीविषा की ऋचा है, जी्वनेच्छा की गति है, कर्मण्यता का उपनिषद्। रचनाकार ने अपनी सू़क्ष्म अभिनव दृष्टि व अपने पारंगत कौशल से दोनों पात्रों को अमर बना दिया है–रद्दी अखबार बेचने वाले को और उसे खरीदने वाले को। अखबार खरीदने वाला नवयुग का बैतालिक बन जाता है,। अपनी अनुभव सिद्ध प्रौढ़ लेखनी के बल पर रचनाकार ने दोनों पात्रों को कम ही समय में, कुछ ही शब्दों के साथ पूरी जीवंतता व स्फूर्ति प्रदान कर उन्हें अविस्मरणीय बना दिया है। उनकी प्रभावकारी अमिट छाप पाठक के मनमानस पर पड़ जाती है और उनकी आंतरिक स्फूर्ति के विद्युत्कण से पाठक भी अभिभूत हो जाता है–जो विषयवस्तु है, जो दृष्टि विचार, उसे जिस ढंग से प्रस्तुत किया गया है वह रचना के सहज सौन्दर्य को हृदयंयम कराते हुए अपनी विधा का गौरवोद्घोष भी करता है। रचना प्रथम कोटि की मानी जाएगी।
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4-खोया हुआ आदमी
रमेश बतरा
रमेश बतरा की लघुकथा ‘खोया हुआ आदती’ एक बहुत ही सूक्ष्म धरातल पर संप्रतिष्ठित होकर लघुकथा के रूप में एक निहायत श्रेष्ठ रचना प्रस्तुत करती है। ऐसे सूक्ष्म भाव को लघुकथा के कलेवर में अँटा देना, उसकी प्रकृति में फिट कर देना रचनाकार की एक चमत्कारिक सिद्धि है। सामान्यत: लघुकथाओं में ऐसे प्रयोग देखने को नहीं मिलते। अत: बतरा की लघुकथा के विषय को देख कर विस्मयविमूढ़ हो जाना पड़ता है। औपनिषदिक दृष्टि या सत्य को उन्होंने आज की लघुकथा के कलेवर में ढालने का सफल प्रयास किया है। विश्वब्रह्माण्ड में जो कुछ भी घटित हो रहा है उससे हम सूक्ष्म रूप से प्रभावित होते रहते हैं–जो कुछ भी हो रहा है उससे हम किसी न किसी रूप में जुड़े रहत हैं। अन्तदृर्ष्टि के विकसित होने पर ऐसा महसूस होने लगता है कि हम ही विश्वब विश्वब्रह्माण्ड में प्रसार पा रहे हैं या फिर विश्वब्रह्माण्ड सिमटकर हमीं में समाहित हो गया है तो लघुविराट का यह महा मिलन, अणुमन व भूमांगन का यह परस्पर विलयन औपनिषदिक ऋषियों की चिरवांछित खोज ही नहीं है, उनकी जीवन–व्यापी साधना की सिद्धि भी है।
आंतरिक उद्भासन के क्षणों में हम ऐसा महसूस करने लगते हैं–कि बा सृष्टि से हमारा गहरा जुड़ाव है, अभिन्न नाता है। इस सृष्टि में किसी का दु:ख–दैन्य मेरा दु:ख–दैन्य बन जाता है, किसी का हर्ष–उल्लास मेरा हर्ष–उल्लास और इसी तरह किसी का मरण, मेरा मरण। हर जनम में मैं ही जनमता रहा हूँ और हर मरण में मैं ही मरता हूँ–यहाँ मेरे सिवाय किसी दूसरे का अस्तित्व ही कहाँ है? ‘अहंब्रह्मस्मि’, ‘सोहमस्मि’ आदि आर्ष अनुभूतियों की सारसत्ता इस रचना में समाहित हो गई है। वस्तुत: यह रचना सामान्य पाठक की समझ के परे की चीज हो जाती है और यदि पाठक गहरे में जाकर इसकी सच्चाई को समझ ले, इसकी दृष्टि को आत्मसात कर ले, इसकी रोशनी से रोशन हो जाए, इसकी आलोकदीप्ति से दीप्ति भास्वर हो जाए तब तो उसे जीवन में एक प्रकाश मिल गया, एक दिव्य दृष्टि प्राप्त हो गई। समीक्ष्य लघुकथाओं में यह रचना सर्वाधिक सूक्ष्म व गहन–गूढ़ है। आर्ष अनुभूतियों को वाणी देती हुई यह रचना औपनिषदिक आख्यान की कोटि में आ जाती है जिसका चिरन्तन महत्त्व है, जिसकी शाश्वत वस्तु व ऐसी रचना के लिए बतरा जी को मेरी हार्दिक बधाई। मेरे ख्याल से यह सर्वश्रेष्ठ रचना है।
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5-ड्राइंग रूम
डॉ0 सतीशराज पुष्करणा
सतीशराज पुष्करणा की लघुकथा ‘ ड्राइंग रूम’ बड़े ही सूक्ष्म भाव से सम्बन्धित है–अपनी विषय वस्तु का निर्वाह उन्होंने पैनी शिल्प–प्रविधि से बखूबी किया है। उनकी प्रौढ़ शिल्पकला ने कुछ ही क्षणों में कुछ ही शब्दों के माध्यम से एक ऐसी स्थिति का जीवंत अंकन कर दिया है जो स्थिति अपनी प्रभावशीलता में दूरगामिनी है।
यह रचना ममता के आगमन,ममत्व के आप्लावन से संबंधित है–इसका सम्बन्ध वात्सल्य के प्रस्फुटन, वात्सल्य के प्रसरण–विस्तरण से है। प्रेम–प्रीति, माया–ममता, स्नेह–सहानुभूति, ममत्व–वात्सल्य मनुष्य के जीवन में या जिसे हम जड़ जगत कहते हैं उसमें भी एक रस वैभव, एक चमक–ज्योति, एक सिहरन– कंपन एक कौंध–कांति, एक चेतना–संचेतना, एक हिलोर–हलचल, एक स्पंदन–स्फूर्ति, एक वेग–आवेग, एक भाव–अनुभाव पैदा कर देता है। वात्सल्य के प्रवाह से निर्जीव भी स्पंदित–स्फूर्त हो उठते हैं! फिर वात्सल्य प्रवाह के अवरुद्ध होने या वात्सल्य के सूखने या लोप होते ही निर्जीव तो पुन: निर्जीवता प्राप्त कर ही लेता है, सजीव भी निर्जीवता की स्थिति महसूस करने लगता है। तो यह है वात्सल्य रस की महिमा, प्रेम प्रीति–प्यार ममत्व–अपनत्व का चमत्कार, उसका करतब–कौशल, उसकी लब्धि–सिद्धि। इस सनातन सत्य को, इस सत्य सनातन सूक्ष्म भाव को पुष्करणा जी ने अपनी शैल्पिक क्षमता के माध्यम से जीवन्त–प्राणवन्त बनाकर पाठकों के मन–मस्तिष्क में संप्रतिष्ठ कर दिया है। पर शीर्षक से मुझे मतभेद है–एक तो अंगरेजी शीर्षक मुझे यों ही पसन्द नहीं–कभी वैसी बात हो तो, स्थिति हो तो दिया भी जा सकता है पर यहाँ तो वैसी स्थिति भी नहीं है। ड्राइंग रूम शीर्षक से ड्राइंग रूम ही महत्त्वपूर्ण हो उठता है जबकि प्रमुख है वात्सल्य भाव,वात्सल्य भाव का चमत्कारिक प्रभाव। ऐसी दिव्य भावापन्न रचना का शीर्षक ‘ड्राइंगरूम’ कम से कम मुझे तो बहुत खटकता है, अधूरा अपूर्ण लगता है। ‘ममता की महिमा’ या ‘वात्सल्य के वैभव’ जैसा कुछ शीर्षक हो सकता था, रचनाकार स्वयं इस पर विचार करेंगे। रचना प्रथम कोटि की है।
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जून 2026
दस्तावेज़कतिपय लघुकथाओं पर प्रो. रवीन्द्रनाथ ओझा के विचार Posted: October 1, 2021
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