लघुकथा को मैं ‘लघु’ नही मानता, क्योंकि लघुकथा का प्रभाव किसी लम्बी कहानी से कमतर नही
होता। यह लघुकथाकार का कला-लाघव है कि बड़ी-से-बड़ी बात को कम शब्दों में कहे, गागर में सागर भरे और पूरे ब्रह्मांड को एक परमाणु में समाहित कर ‘महाविस्फोट’ के लिए तैयार कर दे। ऐसी लघुकथाओं का प्रभाव अमिट रहता है और ये कालजयी रचनाएँ कहलाती हैं। कुछ लघुकथाएँ तो जैसे हृदय पर सीधे अंकित हो जाती हैं और जब-तब स्मरण हो आती हैं।
‘मेरी पसंद’ के लिए पहली लघुकथा है चितरंजन गोप की ‘परिवार के सदस्य’ और दूसरी मार्टिन जॉन की ‘डिजिटल स्लेव’।
लघुकथा ‘परिवार के सदस्य’ में एक अध्यापक बच्चों को उसके परिवार के सदस्यों के नाम लिखकर लाने को कहता है। जब वह बच्चों की कॉपी देखता है, तो वह पाता है कि समाज की सोच कागज के पन्ने पर छपकर आ गई है। एक तरफ एक ऐसा बच्चा है, जो अपने परिवार से अपनी बहनों को बेदखल कर देता है, वह उन्हें अपने परिवार का सदस्य मानने को तैयार नहीं है। उसके भीतर लड़कियों के प्रति समाज की ‘पराए धन’ की धारणा हावी रहती है। दूसरी तरफ प्रकृति है जिसका हृदय ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भावना से ओत-प्रोत है। वह अपने चाचा-चाचियों एवं उनके बच्चों को भी परिवार के सदस्य के रूप में रखती है। उसके हृदय की विशालता इस बात से जाहिर होती है कि उसके परिवार में वे लोग भी शामिल हैं, जिनका उससे कोई खून का रिश्ता नहीं है और जो लाभ की दृष्टि से अनुपयोगी हैं। मसलन बूढ़ी गाय, बूढ़ा कुत्ता, पूँछकटा तोता और कुबड़ा पलाश। ऐसे तुच्छ जीव-जंतुओं एवं पेड़-पौधों तक को अपने परिवार का सदस्य मानना बहुत बड़ी बात है। यह एक सार्वभौम सोच है तथा वैज्ञानिक तथ्य एवं सत्य भी। यह लघुकथा हमें आशान्वित करती है कि ऐसी सोच रखने वाले लोग भी समाज में हैं। भले ही कम हैं। हमें ऐसे बीज बोने होंगे, जिनसे प्रकृति जैसे लोग उत्पन्न होते रहें।
दूसरी लघुकथा ‘डिजिटल स्लेव’ में मार्टिन जॉन ने चित्रित किया है कि किस तरह से सुख-सुविधाओं से लैस आदमी समाज में होते हुए समाज से गुम होता जा रहा है। लघुकथा में दिखाया गया है कि किस तरह से एक पीढ़ी नई पीढ़ी में आकर अपनी जीवंतता खोता है। लघुकथा में बेटा सुविधाओं की चकाचौंध से माता-पिता की सक्रियता को नष्ट करता है। सबसे पहले वह उनको जर्नी टिकट ऑनलाइन पहुँचाता है। इसके बाद चाय, लंच, डिनर, किताबें, अखबार और बाज़ार, जिस तरह से डाइनिंग रूम तक पहुँचते हैं, वे तसल्ली के बजाय चुभन पैदा करते हैं। ये चुभन अबूझ और अदृश्य होती हैं। अंत आते-आते वे एक डिवाइस/गैजेट बन जाते हैं। दूसरी तरफ बेटा उसी आभासी दुनिया खोया रहता ,जो सुविधाओं के रूप में एक घुटन, उदासी, चुभन भरी ख़ामोशी परोस रहा था।
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परिवार के सदस्य / चितरंजन गोप ‘लुकाठी’
‘विकास’ सबसे पहले खड़ा हो गया। कॉपी देते हुए बोला– सर लिख लिया। “वाह !” कहते हुए मैंने कॉपी देखी। उसमें उसका और उसके माँ-बाप का नाम लिखा था। पूछा, “तीन ही नाम…? तुम्हारी दो बहनें भी हैं न?”
“हैं तो, पर वे हमारे परिवार की कैसे होंगी? शादी के बाद दूसरे परिवार में चली जाएँगी न।”
“ओह हाँ।” कहते हुए मैंने दूसरे बच्चे की कॉपी ली। एक-एक कर सबकी कॉपियाँ देखीं। क्लास टू के सभी बच्चों ने अपने-अपने परिवार के सदस्यों के नाम लगभग ठीक-ठाक लिख लिये थे।
सबसे अंत में प्रकृतित आई। उसकी कॉपी में कुल पच्चीस नाम थे। उसके चार चाचा, चार चाचियाँ और उनके बाल-बच्चों के अलावा भी कुछ और नाम थे। एक नाम के नीचे उँगली रखकर मैंने पूछा- यह किसका नाम है?
“जी, हमारी बूढ़ी गाय का।” उसने जवाब दिया।
“और यह?”
“हमारे घर में एक बूढ़ा कुत्ता भी है न, उसका।”
“हूँ… और यह?”
“सर, हमारे घर में एक पूँछकटा तोता है। कहीं से खुद आ गया है।”
“अच्छा, और यह कौन है?
“इ तो प्यारू है सर। हमारे आँगन में एक कुबड़ा पेड़ है न, पलाश का…? वही।”
मैं मौन था। मेरी दृष्टि प्रकृति पर टिकी थी और उँगली कॉपी पर।
-0-सेंट्रल पुल कॉलोनी (बेलचढ़ी), पोस्ट – निरसा, जिला – धनबाद, झारखण्ड/9931544366
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डिजिटल स्लेव / मार्टिन जॉन
मेट्रो सिटी में जॉब करने वाला बेटे ने मम्मी- पापा के जर्नी प्रोग्राम के मुताबिक ऑनलाइन ई-टिकट बुक कर उसे पापा के मोबाइल में फॉरवर्ड कर दिया ।
नियत समय पर मम्मी-पापा मेट्रो सिटी पहुँच गए ।उस मेट्रो सिटी के एक अपार्टमेंट की पाँचवी मंज़िल पर बेटे ने फ़्लैट ले रखा था ।फ्रेशहोने के बाद पापा को चाय की सख्त तलब महसूस हुई। उन्होंने मम्मी की और देखा । मम्मी समझ गई । फ़ौरन किचन में दाख़िल हो गई । चारों ओर नज़र घुमाकर जब उन्होंने देखा, तो पाया कि गैस सिलिंडर , ओवेन और दो चार बर्तनों के अलावा वहाँ कुछ नहीं है ।
“क्या खोज रही हो मम्मी ?”
“बेटा, पापा को इस वक़्त चाय पीने की आदत है न ! लेकिन यहाँ तो कुछ नहीं है ।”
बेटे ने तत्काल फ़ोन घुमाया। दस मिनट बाद डोरबेल बजी । तीन कप चाय हाज़िर !
“लंच का क्या करेंगे बेटा ? घर में तो राशन-पानी है ही नहीं , बनाऊँगी क्या ?”
“डोंट वरी मम्मी! अभी ऑर्डर कर देता हूँ ।”
घंटे भर के अंदर लंच का पैकेट लेकर डिलीवरी ब्वॉय दरवाजे पर खड़ा हो गया ।
अगली सुबह पापा ने बेटे से कहा , “बेटा यहाँ कोई आस-पास बुक स्टॉल है क्या ?”
“क्यों?”
“अखबार खरीद कर ले आता ……इसी बहाने थोड़ा मॉर्निंग वॉक भी हो जाता ।”
“इस अपार्टमेंट की छत बहुत बड़ी है पापा , वहीं जाकर वॉक कर लीजिएगा । …..और ये लीजिए आज का न्यूज़ पेपर ।”- बेटे ने अपने लेपटॉप में ई-पेपर निकाल कर पापा के सामने रख दिया ।
उसी समय मम्मी ने इच्छा जाहिर की , “बेटा, रेस्टोरेंट का खाना हमारी सेहत के लिए ठीक नहीं रहेगा । चल न हमारे साथ बाज़ार ! राशन, सब्जियाँ और कुछ बर्तन ले आते हैं। मैं रोज़ खाना बनबनाऊँगी ।”
“मार्केट जाने की क्या ज़रूरत है मम्मी । मार्केट को यहीं बुला लेते हैं ।”
उसने अपने स्मार्ट फ़ोन पर अँगुलियाँ फिराईं । कुछ देर बाद सब्जियों और राशन के पैकेट लेकर डिलीवरी ब्वॉय सलाम ठोंककर मुस्करा रहा था । एक दूसरा डिलीवरी ब्वॉय किचन एप्लाइंस दे गया ।
चार दिन हो गए। ऑनलाइन ज़िन्दगी ने उन्हें फ़्लैट के अन्दर ही बंद पड़े रहने को मजबूर कर दिया था। उन्हें बेहद उकताहट सी महसूस होने लगी थी। ख़रीदारी के बहाने थोड़ा घूमने- फिरने की इच्छा लिए उस शाम मम्मी ने कहा , “बेटा चल न मार्केट! …सोचती हूँ बड़े भइया के बच्चों के लिए कुछ ड्रेसेस लेती आऊँ ।“
बेटा फ़ौरन लेपटॉप लेकर मम्मी के पास बैठ गया और गार्मेन्ट का पूरा बाज़ार खोल दिया , “ लो मम्मी , देखो और पसंद कर लो । इमीडियट ऑर्डर कर देता हूँ । दो- तीन दिनों के अंदर डिलीवरी हो जाएगी ।”
उस रात फ़्लैट के एक कमरे में बेटा अपना मेलबॉक्स खँगालने में मसरूफ़ था। दूसरे कमरे में मम्मी और पापा बिस्तर पर पड़े-पड़े बगैर किसी संवाद के सफ़ेदी पुती छत के उस पार चाँद-सितारों भरे खुले आसमान की कल्पना में खोये हुए थे । अचानक उन्हें लगा उनकी ढलती उम्र के शरीर में नामालूम –सा कोई डिवाइस समाता जा रहा है । घबराकर वे दोनों एक दूसरे की बाहों में समा गए ।
-0-राम करन ,अपरा सिटी फेज – 4,ग्राम व् पोस्ट – मिश्रौलिया,जनपद – बस्ती, उत्तर प्रदेश_ -272124
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