जून 2026

चर्चा मेंपुरस्कृत लघुकथाएँ, ‘लघुकथा: बहस के चौराहे पर’ का लोकार्पण     Posted: October 1, 2021

कथादेश अखिल भारतीय लघुकथा प्रतियोगिता-13 में पुरस्कृत लघुकथाएँ

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‘लघुकथा: बहस के चौराहे पर’ का लोकार्पण

वर्ष 1983 में डॉ० सतीशराज पुष्करणा द्वारा संपादित व प्रकाशित पुस्तक ‘लघुकथा: बहस के चौराहे पर’ के दूसरे संस्करण का लोकार्पण दिनांक 11 सितंबर 2021 को पटना के इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंजीनियर्स के तत्त्वावधान में लेख्य मंजूषा द्वारा आयोजित एक गोष्ठी में संपन्न हुआ। इस गोष्ठी की अध्यक्षता पटियाला (पंजाब) से पधारे लघुकथा कलश के यशस्वी संपादक योगराज प्रभाकर ने की। अपने अभिभाषण में योगराज प्रभाकर जी ने बताया कि ‘लघुकथा: बहस के चौराहे पर’ एक ऐतिहासिक महत्त्व का ग्रंथ है। लघुकथा के तकनीकी पक्ष से संबंधित प्रत्येक बिंदु को जिस प्रकार विस्तार से परिभाषित एवं व्याख्यायित किया गया है, वह अद्वितीय है। इसमें प्रकाशित आलेख आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने उस समय थे। अत: इस पुस्तक से गुज़रने का अनुभव इतिहास के झरोखों में झाँकने से कम न होगा। उनकी हार्दिक इच्छा थी कि इस लगभग अप्राप्य और अति-महत्त्वपूर्ण कृति का पुन: प्रकाशन होना ही चाहिए, ताकि नई पीढ़ी उस कालखंड के विद्वानों के कार्यों और विचारों से अवगत हो सके। क्योंकि इस पुस्तक के प्रकाशन के फलस्वरूप ही लघुकथा बहस के चौराहे से उठकर चर्चा की चौपाल तक पहुँची थी। इस पुस्तक का लोकार्पण जनवरी 2020 के विश्व पुस्तक मेले में करने की योजना थी। लेकिन कोरोना महामारी और देशव्यापी लॉकडाउन के चलते ऐसा संभव न सका। इस पुस्तक का टंकण कार्य वर्ष 2020 में ही संपन्न हो गया था, किंतु कुछ अपरिहार्य कारणों से इसके प्रकाशन में विलंब हुआ। उन्होंने अति भावुक शब्दों में बताया कि पुष्करणा जी और रवि प्रभाकर, इस पुस्तक के प्रकाशन को लेकर अति उत्साहित थे। किंतु दुर्भाग्य से इस पुस्तक का प्रकाशन उनके जीवनकाल में संभव न हो सका।

लेकिन वे इस बात पर बेहद चिंतित थे कि इस पुस्तक में लघुकथा विधा के वरिष्ठजनों ने जिन समस्याओं और चिंताओं की बात लगभग चार दशक पहले की थी, वे कमोबेश आज भी ज्यों-की-त्यों ही हैं। उदाहरण के लिए- लिखने की जल्दबाज़ी तब भी थी, अब भी है। अधकचरी रचनाओं की बाढ़ तब भी थी, अब भी है। लघुकथा को आसान विधा समझने की प्रवृत्ति तब भी थी, अब भी है। लघुकथा को सफलता का शॉर्टकट समझने की प्रवृत्ति तब थी, अब भी है। मठाधीशी और गुटबंदी तब भी थी, अब भी है। तो आख़िर बदला क्या? प्रश्न यह भी उठता है कि आख़िर हम ने इतिहास से क्या सीखा? वैसे कुछ सीखा भी है या नहीं? ये सब अति-महत्त्वपूर्ण एवं विचारणीय विषय हैं।

‘लघुकथा: बहस के चौराहे पर’ के विमोचन के अवसर पर चित्र में सुप्रसिद्ध शायर मो० नसीम अख्तर जी, उदीयमान लघुकथाकार राजेन्द्र पुरोहित जी, लेख्य मंजूषा की अध्यक्षा विभा रानी श्रीवास्तव, ‘लघुकथा कलश’ के संपादक योगराज प्रभाकर, सुप्रसिद्ध आलोचक/समीक्षक डॉ० अनीता राकेश जी तथा दूरदर्शन बिहार के पूर्व उप निदेशक श्री शंभू प्रसाद सिंह जी।

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