
रचना पढ़ते हुए सच्चाई से रूबरू होता प्रबुद्ध पाठक लघुकथा से एक जरूरी किस्म की अर्थवत्ता की मांग करता है और अगर लघुकथाकार स्वयं एक ख्यात समीक्षक हो तो पाठक की यह आस स्वतः ही पूर्ण हो जाती है।ऐसा लेखक जिसने साहित्य की लगभग सभी विधाओं में अधिकारपूर्वक लिखा हो की रचनाएँ पढ़ते हुए रचना पक्ष के साथ साथ उनका विचार पक्ष भी स्पष्ट होता चला जाता है। वरिष्ठ लघुकथाकार,डॉ. पुरुषोत्तम दुबे ऐसे ही वरिष्ठ समीक्षक हैं और उनकी लघुकथाओं के फलक भी उनकी समृद्ध दृष्टि की तरह ही व्यापक हैं।अपनी लघुकथाओं में वे घटना से अधिक, विचार की प्रधानता को महत्व देते हैं।अपने पहले ,स्वतंत्र लघुकथा संग्रह ‘छोटे-छोटे सायबान’में वृहत् संसार की हकीकत के लंबे अफसानों को छोटे छोटे टुकड़ों में अभिव्यक्त करने का काम उन्होंने बखूबी किया है। इन लघुकथाओं को पढ़ते हुए पर्याप्त वैविध्य के दर्शन तो होते ही हैं,पाठक इनके गहन ,गम्भीर सामाजिक सरोकारों से भी अत्यंत प्रभावित होता है।
रावण को हराने के बाद प्रभु श्रीराम ने भ्राता लक्ष्मण से कहा था-
अपि स्वर्णमयी लङ्का न मे लक्ष्मण रोचते।
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।
अर्थात लंका भले ही सोने की हो पर मेरी इसमे कोई रुचि नही है क्योंकि जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी श्रेष्ठ हैं। इसी अवधारणा को बल देती हैं दुबेजी की लघुकथाएँ – मस्तकदान,प्रार्थना और अनमोल गीत जिनमे अपने देश की मिट्टी और आबोहवा से जुड़ी कथाभिव्यक्ति है।’अनमोल गीत’में लेखक ने राष्ट्रगान के महत्व को सशक्त ढंग से पाठकों के सम्मुख रखा है। राष्ट्रगीत/राष्ट्रगान गाते या सुनते हुए वास्तव में एक अलग ही तरह की गौरवपूर्ण अनूभूति होती है।
संग्रह की पहली रचना ‘वे दो ‘के द्वारा लेखक यह बताने में सफल हुए हैं कि आतंकवादी किसी के नही होते ,खून कर देना उनके लिए एक खेल है और कोई छोटा सा टारगेट पूरा करने के लिए वे नीचता के चरम पर जा सकते हैं।
पालतू पशु वही करता है जो वह देखता है। जिसके साथ वह रहता है उसके जैसी ही हरकतें उस समय करता है। ‘घ्राण शक्ति/इस संग्रह की श्रेष्ठ लघुकथा कही जा सकती है-
’कुत्ता जब दादाजी के साथ घूमता तो मंदिर के पास रुकता’
‘कुत्ता जब साथ घूमता दादीजी के साथ तो पुलिया पर इकट्ठी होकर बैठी औरतों के पास रुकता।’
‘कुत्ता जब साथ घूमता बाबा के साथ तो सड़क से गुजर रही युवतियों के चप्पलों के निशान सूँघता।’
पशु के माध्यम से घर के सदस्यों की भली-बुरी वॄत्ति दर्शाता, एक करारा व्यंग्य है यह सशक्त लघुकथा।
अक्सर कहा जाता है कि अब पारिवारिक विषयों की रचनाएँ लघुकथा को बोझिल बना रहीं हैं पर लेखक के पास दृष्टि समृद्धता हो ,प्रस्तुतीकरण आकर्षक हो तो अभी भी इस विषय पर लघुकथा में सम्भावनाएं हैं और एक नया दृष्टिकोण पाठक को भावविह्लल कर सकता है. ‘अनुभवों के उपहार’एक ऐसी ही लघुकथा है जिसमे बुद्धिमान सास अपनी बहुओं को निराले और स्थायी सुख के कुछ उपहार देती है ।
कल्पनाशीलता से भरी डॉक्टर दुबे की रचनाएँ अद्भुत शिल्प का उदाहरण है जिसमें हमारी चिंतन प्रक्रिया को विस्तार मिलता है ‘चेहरा’ और ‘सातत्य ‘ ऐसी ही रचनाएँ हैं जिनमे पाठक, परत-दर -परत मंत्रमुग्ध सा डूबता चला जाता है।’चेहरा’में मानसिक द्वंन्द्वों,दबावों से उबरकर आने का आत्मविश्वास है तो ‘सातत्य’ में वाकई दुबेजी ने(जैसा कि उन्होंने आत्मकथ्य में लिखा है) सांकेतिकता का बृहत तर्जुमा पूरी लघुकथा में कर दिया है।यह रचना भाषायी सौंदर्य का भी अनुपम उदाहरण है-
‘झुका आसमान ऊँचा हुआ,सुबह का सूरज उगाने को।’
‘नर नरेश नारायण’सत्ता पाकर मानव के दम्भी और मदांध हो जाने की रोचकता को समेटे है।’चातुर्य ‘ महाविद्यालय के मदमस्त,दम्भी छात्रों को वाक्चातुर्य के द्वारा कैसे बस में किया जाए, कैसे अनुशासित किया जाए ताकि कक्षाएं बेरोकटोक चल सकें ,इसका तरीका बताती है।’तिजारत’में व्यंग्य अंडरकरंट की तरह मौजूद है और एक कड़वी सच्चाई ‘आदमियों के बीच आदमी का व्यापार ‘ से रूबरू करवाता है।
‘राष्ट्रमाता का खत’भी संग्रह की एक श्रेष्ठ लघुकथा है जिसमे एक अनपढ़ किंतु समझदार माँ केवल अपने ही नही, राष्ट्र सेवा में लगे सरहद के समस्त सैनिकों को अपना बेटा समझकर खत में सभी के लिए आशीर्वाद लिखवाती है।
डॉक्टर दुबे के पास अपने जीवन की अनुभवों की धीमी आँच में सिंके अपने हिस्से के किस्से हैं ,उन्होंने जीवन के सत्य को अलग-अलग कोणों से देखा है,तभी वे ‘बेड टी’ जैसे सामान्य विषय पर भी एक भावपूर्ण लघुकथा रच लेते हैं।
कोरोना महामारी काल की भयावहता में से एक ,बेरोजगारी के कारण अपने गृहनगर की ओर लौटने की वास्तविक और अत्यंत मार्मिक तस्वीर है ‘घर लौटा रामखिलावन’। थक कर गाँव मे आए हुए व्यक्ति की कैसे मालिश की जाती है,छह सौ किलोमीटर की पदयात्रा कैसी होती है,कैसे धूल और पसीना चेहरे की चमक खत्म कर देता है और त्रस्त पुत्र को देख कैसे माँ की आकुलता-व्याकुलता बढ़ती है इस सबका अत्यंत सजीव चित्रण इस रचना में है। ‘माँ की हथेलियों की आंखें और इसी बहाने अपने पति की याद!’ लेखक की कल्पनाशीलता लाजवाब है।कठिन समय की त्रासदी और वर्तमान से मुठभेड़ करती एक सशक्त रचना।
पुस्तक का आवरण डॉक्टर बलराम अग्रवाल की सुंदर कल्पना का परिचायक है और जन लघुकथा साहित्य का मात्र चालीस रुपये में इसे उपलब्ध कराना भी एक आकर्षक और स्तुत्य प्रयास है।
बेहतरीन शब्द संपदा प्रस्तुत करने वाले डॉक्टर पुरुषोत्तम दुबे ने इस संग्रह के द्वारा मानवीय प्रवृत्तियों,मानसिक द्वंद्वों ,अनपेक्षित अभिव्यक्तियों जैसे भावों को सटीक रूपकों के माध्यम से कलात्मक विस्तार दिया है।आत्मकथ्य में उन्होंने क्या खूब लिखा है -खुद के किये हुए संकल्प का दृढ़ता से पीछा करना ताकि संकल्प का शरीर, सपनों की इबारत बनकर न रह जाए।
गुणात्मक लेखन ,सांकेतिकता,प्रतीकात्मकता और यथार्थ का पूर्ण फैलाव कर, सर्जना के संसार मे ‘छोटे-छोटे सायबान’के द्वारा सफलता का एक विशाल भवन खड़ा करने के लिए डॉक्टर पुरुषोत्तम दुबे को बधाई।
कृति:छोटे-छोटे सायबान -लघुकथा संग्रहःडॉक्टर पुरुषोत्तम दुबे प्रथम संस्करण 2021 <मूल्य ₹40/- पृष्ठ-40, प्रकाशक:जन लघुकथा साहित्य एम 70 नवीन शाहदरा दिल्ली
पुस्तक प्राप्ति सम्पर्क:9329581414
–0- संतोष सुपेकर, 31,सुदामा नगर,उज्जैन
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