1-अम्मा फिर नहीं लौटी राजकुमार निजात
जब भी कोई बस आती बूढ़ी अम्मा सिर पर अपनी गठरी लादे उस में चढ़ने के लिए दौड़ पड़ती लेकिन कुछ संस्कारहीन लोग उसे पीछे धकेलते हुए बस में चढ़ जाते । बूढ़ी अम्मा बस में चढ़ न पाने का मलाल पाले पैर पटक कर रह जाती ।
तभी एक बस आई और वह उसमें चढ़ने में कामयाब हो गई । कंडक्टर से जब टिकट काटने के लिए उसने अपने गांव का नाम बताया तो वह बोला , ” अम्मा ! तुम गलत बस में बैठ गई हो , उतरो जल्दी । “
बस वाले ने उसे वहीं उतार दिया ।
थकी मांदी अम्मा फिर किसी बस के आने की इंतजार में इधर-उधर आँखें फाड़कर देखने लगी । पिछले एक घंटे से भाग – दौड़ करते हुए थककर अब वह कुछ मायूस हो चली थी ।
तभी एक बस और आई । बस के रुकते ही सवारियों के चढ़ने – उतरने की धक्का-मुक्की शुरू हो गई । तभी उस बस के कंडक्टर ने पीछे से अम्मा के कंधे पर हाथ रखा । अम्मा पीछे की ओर घूमी ।
” कहाँ जाना है अम्मा ? ” उसे शायद ऊंचा सुनाई देता था । कंडक्टर ने इस बार ऊंची आवाज में पूछा तो वह बोली , “…… गाँव जाना है । ” उसने अपने गांव का नाम बताते हुए कहा ।
लेकिन भीड़ में वह चढ़े कैसे ? कंडक्टर कुछ सोचते हुए सवारियों से बोला , ” हम कुछ लेट चलेंगे । जिन्हें जल्दी है वह किसी अन्य बस में बैठ जाए । “
देखते ही देखते आधी बस खाली हो गई ।
अब कंडक्टर ने अम्मा की गठरी पकड़ कर उसे बस में बिठाते हुए पूछा , ” पानी लाकर दूँ अम्मा ? “
” हाँ ! ला दे बेटा …..प्यास लग गई है । “
प्रो. केदारनाथ सिंह यह सब देख रहे थे । उन्होंने कंडक्टर से पूछा , ” अम्मा को शायद जानते हो तुम ? “
” हाँ….. अच्छी तरह । मेरी माँ इसी तरह किसी बस में अकेली बैठी थी । वह आज तक नहीं लौटी है । “
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3-प्रकाश होल
आसमान में एक टूटते सितारे को देख कर अन्य सितारों में खलबली मच गई । सभी सितारों ने इकट्ठे होकर मीटिंग की ।
” अभी एक युग पहले ही हमारा एक बड़ा सितारा खंडित होकर खगोल में ही किसी ब्लैक हॉल में विलीन हो गया था । आज वैसी ही घटना फिर घटी है । यह बड़ा चिंताजनक है । हमें मिलजुल कर इसका समाधान ढूंढना होगा ? “
” क्या समाधान हो सकता है ? ” एक सितारे ने पूछा ।
” कमजोर हो रहे सितारों का हम खासतौर पर पोषण करें । उन्हें अपनी थोड़ी-थोड़ी ऊर्जा बांट दें । “
” यह संभव नहीं है । हर सितारे की अपनी ऊर्जा का एक विशेष चक्र होता है । हम उन्हें अपने अतिरिक्त ऊर्जा नहीं पहुँचा सकते । ” सितारों की विशेषज्ञ समिति ने स्पष्ट करते हुए बताया ।
” तब क्या किया जाए ? ” सितारों ने एक ही स्वर में पूछा ।
” हमें ब्लैक होल से अपनी निश्चित दूरी बनाए रखनी होगी ताकि वह हमें आसानी से निगल न सके । कमजोर हो रहे सितारों से हम कहेंगे कि वे अपनी ऊर्जा का संवर्धन करते रहें । वहाँ की प्रकृति को किसी भी अवस्था में खंडित न होने दें । “
यह सुझाव बेहतर था । इसे सभी ने मान लिया ।
तभी किसी वरिष्ठतम सितारे ने कहा , ” क्यों न हम ब्लैक होल के समानांतर एक प्रकाश होल का निर्माण शुरू करें ? “
यह सुझाव उत्तम था । इसे सभी ने एक ही स्वर में स्वीकार कर लिया ।
ब्लैक होल तक जब यह बात पहुँची कि सितारों ने एक नए प्रकाश होल का निर्माण करने का निर्णय लिया है तो उसके पूरे अस्तित्व में खलबली मच गई ।
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4-वह सुबह -राजकुमार निजात
सूरज की किरणों ने सुबह के द्वार पर दस्तक दी लेकिन सुबह वहाँ नहीं थी । वह अभी तक उठी ही नहीं थी । उसका बदन कल की जबरदस्त मेहनत से टूट रहा था । कल आए भयंकर तूफान ने खेतों में उगी फसलों को तबाह कर दिया था ।
किरणों ने फिर दस्तक दी ।
इस बार सुबह ने दरवाजा खोला । वह बेहद उदास थी । कहने लगी , ” कल सुबह किसान जब अपने खेतों में आया तो अपनी पहली लहलहाती फसल देखकर वह खुशी से भर उठा था । अपनी इतनी अच्छी फसल देखकर उसने उस एक ही दिन में न जाने कितने सुनहरे सपने बुन लिए थे ? “
” …. इस बार अपने मकान के दोनों कमरों को पक्का करने का सपना ….. पशुओं के छप्पर को और बड़ा करने का सपना ….. बेटी को हुई पहली बेटी पर बेटी के लिए ” छूछक ” लेकर जाने का सपना ….. बीवी की आँख का ऑपरेशन कराने का सपना ….. खेत की बाड़ को मजबूत करने का सपना ….. ” कहते-कहते सुबह चुप हो गई ।
उसने अभी बहुत सारे सपनों का जिक्र करना था लेकिन वह बोली , ” दरअसल सच में यह सब सपने मेरे सपने थे । मैं रोज उसे हँसते मुस्कुराते हुए देखती थी । हँसते – गाते गुनगुनाते हुए देखती थी ।
कल के तूफान में उसके सारे सपने बिखर गए ।
वह कह रहा था , ” आज की सुबह मेरे लिए बहुत मनहूस सुबह थी । मैं इस सुबह को कभी माफ नहीं करूंगा ? “
कहते-कहते सुबह सचमुच सुबक उठी थी ।
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4-टोका – टोकी * राजकुमार निजात
अंजुरी स्कूल का होमवर्क करने के लिए पापा के पास जा बैठी । पापा बोले , ” मैं ऑफिस की एक जरूरी फाइल देख रहा हूं । उधर जाओ बेटे , चाचा के पास बैठ कर कर लो । “
अंजुरी कुछ नहीं बोली । अनमनी सी अपना बस्ता उठाकर चाचा जी के रूम में जाकर बैठ गई । वहां उनके एक मित्र आए हुए थे । चाचा जी उनसे बात कर रहे थे । वह बोले , ” मुझे डिस्टर्ब मत करो बेटा ! अपने भैया के पास जाओ । वह भी तुम्हारी तरह होमवर्क कर रहा है , चलो बेटा । “
अंजुरी निराश मन से उठी , अपना बस्ता समेटा और मयंक के पास आकर काम करने लगी । तभी मम्मी आई और अंजू से बोली , ” मयंक को अपना होमवर्क करने दो बेटा । इसके साथ नहीं वहां बरामदे में बैठ कर कर लो अपना होमवर्क । “
” यहां क्यों नहीं मम्मी ? मैं तो मयंक को कुछ भी नहीं कह रही ? मैं यहीं बैठकर करूंगी । “
” जिद नहीं करते बेटी , उठो और चलो वहां । “
अब अंजुरी नहीं , बल्कि उसे लगा ज़िद मम्मी कर रही थी । आखिर उसे वहां से उठकर जाना पड़ा ।
वह बरामदे में जा बैठी ।
अब उसका मन काम करने को नहीं कर रहा था । तभी चाची ने देखा तो बोली , ” यहां अकेली क्यों बैठी हो बेटे , दादी जी के पास बैठ कर काम कर लो । मां जी अंजू को बुलाना अपने पास । “
अंजूरी खीज उठी । बोली , ” मैं यहीं बैठकर करूंगी चाची मुझे पढ़ने दो । “
” आ जा बेबी मेरे पास आ जा । ” दादी ने उसे पुकारा । अंजुरी वहीं से बोली , ” दादी मुझे काम करने दो ना यहीं बैठकर । “
तभी दादा जी अंजूरी के पास आकर बैठ गए । उसे लगा वह डिस्टर्ब हो रही है । वह उठी , अपना बस्ता अलमारी में रखा और गली में जाकर बच्चों के साथ खेलने लगी ।
तभी मम्मी ने आवाज दी , ” अंजू बेटे ! गली में स्कूटी , बाइक बगैरा देख कर , ध्यान से खेलना । “
अंजुरी समझ नहीं पा रही थी कि वह कहां खेले , कहां पढ़े , क्या करें , क्या न करें ? वह आकर मम्मी से बोली , ” मम्मी ! आप बरामदे में बैठ कर खाना क्यों नहीं बना लेते ? “
मम्मी को लगा सचमुच ही बच्चों को बार बार टोकना नहीं चाहिए ।
वह अंजुरी के मनोभाव समझ चुकी थी ।
5- *अथक*
राजकुमार निजात
सासु माँ बैठे-बैठे बैठे बहू को पुचकार से और प्यार से आदेश देती रहती और सुबह से शाम तक घर का सारा काम हो जाता ।
” बहू ! नाश्ते में सब्जी कम घी की बनाना । साथ में मूँग , अरहर की मिक्स दाल भी बना लेना । प्रकाश दूसरे – तीसरे दिन मिक्स दाल चाव से खाता है । मेरे लिए तो टमाटर की चटनी बना लेना बस । बाकी और कुछ नहीं ….. बाकी और कुछ इच्छा हुई तो मैं ले लूंगी । “
दिनभर माजी की ग्रामोफोन की सुई चलती रहती और उपासना ठीक वैसे – वैसे काम करती चली जाती ।
” बहू ! बच्चों का समय हो गया है जाकर जल्दी ले आ । देखियो ! भीड़ से बच कर चलना । “
” बहू ! तूने नाश्ते के बाद चाय नहीं पीई है । बना कर पी ले बेटा । आधा कप मेरे लिए भी बना लेईयो ।”
” बहू । कपड़े धोने बैठो तो यह मेरे वाली चादर और तकिया भी धो देना । धोती मैंने बदल कर रख दी है । साथ में वह भी ले जाना । “
फिर शाम का नाश्ता , रात का खाना वगैराह -वगैराह सारे काम माँ जी इशारों – इशारों में करवा लेती ।
सुबह छह बजे से लेकर रात के नौ – दस बजे तक माँ के आदेशों का पहिया समय की सुई के हिसाब से निरंतर चलता रहता ।
आज उपासना महीने के नियमित कष्ट में थी । वह बार – बार जाकर चारपाई पर लेट जाती । माँ जी फिर भी कहती , ” पहले सब्जी ले आ बहू ! फिर आकर आराम कर लेईयो ।”
” पहले बच्चों के कपड़े प्रेस कर के रख दे , फिर आराम कर लेईयो । अखबारों की रद्दी बहुत हो गई है । दुकान वाले गोविंद भैया से कह आ , आकर ले जाएगा तौलकर । ध्यान से देखकर तुलवाईयो बेटा । फिर जी भरकर करना आराम । “
देर तक बहू जब रात के बर्तन माँज कर रख देती तो माँ जी कह देती , ” अरी बहू ! तू सो जा जल्दी । आज तूने दिन भर आराम नहीं किया है । कितनी बार कहा है आराम कर लिया करो । काम तो होता ही रहेगा । मैं हूँ ना कर लूँगी बहू ! काम तो मिल – जुलकर ही होता है । सुबह नाश्ते के लिए राजमा – चना भिगोकर रख दिया है न ? “
उपासना लेटे-लेटे सोच रही थी ” माँ ज़ी बातों – बातों में घर का सारा काम करवा लेती है । काश ! आज महावारी में तो माँ जी काम में हाथ बंटा देती ? “
तभी थकी – माँदी उपासना गहरी नींद में खर्राटे भरने लगी । उसकी आँखों में लगा काजल बहकर गालों पर लुढक आया था जो यह बता रहा था कि सोने से पहले वह रोई थी ।
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6-उपेक्षित राजकुमार निजात
समय पहाड़ के पास गया और बोला, ” तुम कभी नहीं बदलते । क्या तुम परिवर्तन नहीं चाहते मित्र ?”
पहाड़ बोला , ” क्या तुम मुझ में कोई परिवर्तन अनुभव नहीं कर रहे ? मैं बदलता हूँ मगर मनुष्य के लिए बदलता हूँ । क्या तुम मेरे भीतर मनुष्य की बनाई हुई ये लंबी चौड़ी गुफाएं नहीं देख रहे ? क्या तुम मेरी छाती पर बनी यह सर्पाकार पगडंडियाँ नहीं देख रहे ? “
पहाड़ का उत्तर सुनकर समय वहाँ से आगे बढ़ गया । एक वृक्ष के सामने आकर वह रुका और बोला , ” तुम नहीं बदले वृक्ष ! सदियों से तुम वृक्ष रूप में ही हो ? “
वृक्ष बोला , “हाँ मैं हूँ तो वृक्ष के रूप में ही मगर अब मैं निश्चित आकार और निर्धारित सीमाओं व रास्तों पर भी उगता हूँ । सड़क के दोनों ओर …बाग बगीचों में… विशाल भवनों के द्वार… पर खलिहानों की मेड़ों पर… आदमी की बनाई हुई पक्की नहरों के तट पर । क्या यह मेरा परिवर्तन नहीं ? ” वृक्ष का उत्तर सुनकर समय वहाँ से आगे बढ़ गया । वह एक नदी के तट पर आकर खड़ा हो गया । इधर-उधर देखा और नदी से पूछा, ” क्या तुम नहीं बदलना चाहती बहन ? “
नदी ने कहा, ” वहाँ आकर तो देखो तो सही ? मैं मनुष्य के बनाए हुए बड़े-बड़े बांधों के रूप में परिवर्तित हो गई हूँ । क्या तुम इसे मेरा परिवर्तन स्वीकार नहीं करते ? ” समय ने नदी का उत्तर सुना और वहाँ से आगे चल दिया ।
वह शहर में आदमी से आकर मिला । उसने आदमी से पूछा, ” पहाड़ बदले,नदी बदली,वृक्ष और पौधे भी बदले , तुम कहो मित्र क्या तुम भी बदले ? “
” नहीं मैं तो आदमी हूँ ,निस्सहाय हूँ । मैं स्वयं को कैसे बदल सकता हूँ ? मेरा वही रूप है जो आदि काल में था । मेरी वही क्रियाएं हैं । मैं जन्म लेता हूँ ,जीवन धारण करता हूँ और मृत्यु का ग्रास बन जाता हूँ । मैं तो वही हूँ जो पहले था । “
समय ने कहा , ” यह सत्य नहीं है मित्र ! पहाड़ ,नदी, वृक्ष सब में तुमने परिवर्तन कर दिए हैं । पहाड़ ने कभी पहाड़ को नष्ट नहीं किया । नदी ने कभी नदी को ग्रास नहीं बनाया । वृक्ष ने कभी वृक्ष की हत्या नहीं की मगर तुम अपने स्वार्थ के लिए आदमी को लूटते हो । क्या यह परिवर्तन नहीं ? तुम बाहर से न सही भीतर से तो बिल्कुल बदल गए हो मित्र ? “
आदमी को लगा ,समय कितना असहाय होकर उसके सामने गिड़गिड़ा रहा था मगर वह गर्वोन्मुक्त हो पहाड़, पेड़ , नदी की ओर उपेक्षा से देखता हुआ स्वयं को सर्वशक्तिमान समझता हुआ आगे बढ़ गया ।
( मेरे 1992 में प्रकाशित लघुकथा-संग्रह ” कटा हुआ सूरज ” से ली गई लघुकथा । यह लघुकथा सन् 2000 से “तमिलनाडु बोर्ड आफ मैट्रीकुलेशन एग्जाम” के हिंदी पाठ्यक्रम में लगी हुई है )
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7- कटा हुआ सूरज राजकुमार निजात
दोपहर के 11:00 बज गए थे । अभी तक उसे कोई भी दिहाड़ी पर ले जाने के लिए लेने नहीं पहुँचा था । पिछले तीन रोज से तो उसे 7:00 बजे ही काम मिल गया था । आज इंतजार करते-करते उसकी आँखें पथरा गई । इंतजार की थकान को भुलाने के लिए वह सोच रहा था — एक कप चाय हो जाए ! मगर यह सोच कर कि यदि वह किसी टी स्टाल पर जा खड़ा हुआ तो उसे नजरअंदाज करते हुए किसी दूसरे का नंबर न लग जाए ?
सुबह 7:00 बजे जब वह इस लेबर चौक के पास आकर खड़ा हुआ था तो उसे आत्मविश्वास था कि आज भी पिछले तीन दिनों की तरह जल्दी ही उसे कोई दिहाड़ी पर लेने के लिए पहुंच जाएगा ! मगर 11:00 बज चुके थे । सूरज आकाश के बीच तक आ पहुंचा था ।
अब उसका मन घबराने लगा । “इसका मतलब …आज की दिहाड़ी खत्म !” सोचते-सोचते वह तिलमिला उठा । उसने गर्दन ऊंची करके देखा सूरज आकाश के माथे पर चमक रहा था । देखते-देखते दोपहर के बारह बज गए । “आधा दिन खत्म यानी कि आज का रोजगार खत्म ? ” अब तो चाय पीने को भी उसका मन नहीं कर रहा था ।
सूरज की ओर देखते हुए उसकी घबराहट और बढ़ गई । उसने सोचा — काश सूरज आगे न बढ़ता नीचे सरक जाता ।” उसे सूरज से नफरत हो आई । उसे लगा जैसे कहीं से कोई चीज उठी है आसपास आसमान की ओर बढ़ी है और एक ही बार में सूरज दो टुकड़ों में होकर बिखर गया है ।
सिरजू ने सोचा — अब तो चाय पी ही लूँ । “
चाय की दुकान पर बैठे हुए उसने अनुभव किया — अभी अभी जो वार सूरज पर हुआ था उसका असर उसके भीतर अवश्य हुआ है कहीं ! उसे लगा जैसे सूरज के साथ वह भी दो टुकड़ों में बंट गया है । कटकर …. ।
( 1992 में प्रकाशित मेरे प्रथम लघुकथा संग्रह ” कटा हुआ सूरज ” से शीर्षक लघुकथा )