‘‘छोड दीजिए, पत्नी पर हाथ नहीं उठाना चाहिए।’’ बीच-बचाव करते हुए सुधाजी बोली थीं।
‘‘अरे! ये ऐसे नहीं सुधरने वाली। कहते हैं न-‘रहिमन कड़वे मुखन को चहियत यही सजाय8’’ ललन जी दलील देने लगे थे।
‘‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता;’’ ये भी तो कहते हैं। हिलक-हिलककर रो रही वसुधाजी के आँसू पोंछते हुए सुधाजी क्षोभ से भर गई थीं।
‘‘आप लोग भी चार अ़़क्षर पढ़ क्या लेती हैं, अपने को काबिल समझने लगती हैं।’’
‘‘औरत भला काबिल कैसे होगी चार अक्षर पढ़कर! काबिल तो आप पुरुष लोग होते हैं न? चाहे चार अक्षर पढ़े हों तो भी चाहे अक्षर आप लोगों के लिए भैंस बराबर ही क्यों न हों। ’’ललनजी बिलबिला उठे थे।
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अक्तुबर 2026
देशचार अक्षर Posted: September 1, 2015
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