1-कोहरा
कॉलेज के लॉन में वह हीरो बना इतराता हुआ-सा, कुछ कन्याओं के मध्य गप-शप में मस्त, ठहाके लगा रहा था कि अचानक गेट पर गाँव से बापू को आया देख वह कसैला हो उठा। उसके जड़ कदम आगे बढ़ते इससे पूर्व ही बापू ने पास आकर हँसते हुए बड़े उल्लास सहित उसे एक पोटली थमाकर कहा – इब तू भी बेटा को बाप बण गियो है, तेरा दोस-भायला खातर लडुआं ल्याओ हूँ । घर में पूरा अक्कीस बरस बाद इब थाली बजी है। पण भऊ की तबैत जरा ठीक नाय, सो तू दो दिन खातर गाँव कू चल….।
हतप्रभ हुई वे लड़किसँकुछ समझ सकें, इससे पहले ही वह तुरंत संभल, संयल होकर उनकी ओर मुड़ा और अतिरिक्त मुस्कान चिपकाकर शहदीले स्वरों में बोला – मॉय भाभी हैज बीन ब्लैस्ड विद ए सन, प्लीज! डू कम टू माय रूम एट सिक्स, इन द इवनिंग ओ…के। फिर चीते-सा पलट, बाप को साथ ले वह चल पड़ा, और पूरे दिन बाप पर बिगड़े साँड-सा उबलता-बिफरता रहा कि अगर वह बिना किसी चिट्ठी-फोन के अचानक सीधा कॉलेज आ भी गया, तो उसे उन लड़कियों के सामने यह बताने की क्या जरूरत थी, यह तो वह मौके पर सँभल गया, वर्ना आज उसकी इज्जत मिट्टी हो जाती! सारा कैरियर गुड़-गोबर हो जाता! उसे क्या पता लड़कियाँ छोड़कर तो मैडम मिस माथुर, जैन तक उसको कितना….।
शाम को अकेले ही गाँव लौटते समय, उस उदास-निरीह बाप को, बिल्कुल समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर उसने यहां आकर ऐसा क्या गलत कर दिया या कह दिया, जो बेटा इत्ता भभक उठा और उसकी इज्जत धूल में मिल जाती? आखिर क्यों? किस कारण?
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2- तार
तार पढ़ते ही वह सन्न रह गई, उसके मस्तिष्क में अनायास तीन वर्ष पुरानी एक बहुत धुँधली शाम उभर भाई ,,,
… तनु दी! एक बात कहूँ? नाराज …… शो …..
– अरे नहीं, यदि हुई भी तो पिटाई थोड़ी ज्यादा कर दूँगी …..
– मैं तुम्हें सिर्फ ‘तनु’ ही कहना ……….।
– बेवकूफ क्या कहा? क्या ‘दीदी’ शब्द बहुत लम्बा-चौड़ा है? अंकल से कहकर काले पानी की उच्च कैद ,….. दिलववा—
– बस … उम्रकैद में तुम्हें भी साथ रखना चाहूँगा ………।
– नालायक। मैं क्यों रहने लगी भला? अच्छा चल बकवास बन्दकर | पहले राखी बँधवा ले, शाम होने वाली है… अभी तुझे भागने की लगेगी,
– पर राखी बँधवाने का मन ही नहीं हो रहा है ……
– इसलिए कि साड़ी या शर्ट पीस देना पड़ेगा? महा कंजूस।! मक्खीचूस।।!
– अच्छा …. एक शर्त पर, पहले एक बात बताओ, …… तुमने आपने लिए कोई सपन तो सजाया ही होगा, मै उस सपने के राजकुमार से ……..।
– शटअप! ….. मैं, ऐसे सपने नहीं देखती ! डैडी जिसे भी पसंद करेंगे उसी के साथ हैं ……., उसकी लाज भीगी आँखों में निश्छलता तैर आई थी।
– क्या वह …… मतलब ……. मतलब ……. मेरे जैसा ही कोई लड़का नहीं हो सकता?
– गधे, पता है में तेरी बड़ी बहन हूं? ऐसी जमकर पिटाई करूँगी कि …… बस्स ……..।
-फादर के फ्रेन्ड की लड़की, चाहे छोटी हो या बड़ी, सगी बहन के रिश्ते में नहीं आती।
– आज तुमने भंग तो नहीं पी रखी है नील? डैडी को आवाज दूँ?
– “तुम …….. शायद … मुझे कभी नहीं समझ सकोगी दी ! इस पिटाई से तो खैर मैं अरे मरने वाला नहीं, ….. पर ,….हाँ,
“* जिंदगी में कभी यूँ हो मरा, तो उसकी जिम्मेदार तुम, सिर्फ तुम रहोगी। “
…. नहीं! …….. नहीं !! तनु पागल सी चीख पड़ी, उसने पति के हाथ से छीनकर, तार के दुकड़े-टुकड़े कर दिये, जिसमें नील के मित्र ने लिखा था – “कम सून नील एक्सपायर्ड।”
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3-सुहाग व्रत
सावित्री ने जब सुहाग-पूजा के लिए रोज की सूती साड़ी ही पहनी, तो सत्येन झल्ला पड़ा।
‘‘वहाँ सबके सामने यह साड़ी अच्छी लगेगी। वह लाल चुनरी वाली पहन जाओ न!’’
‘‘हूँ?….खूब बकसे भरे हैं न साड़ियों से?….ले-देकर वही तो एक साड़ी है, उसे भी बिगाड़ दूँ!
तुम्हें तो लाज-सरम नहीं…पर मुझे तो घर की इज्जत…’’
‘‘एक ही साड़ी? वह मूँगिया चैक वाली ,नीली बनारसी ,शिफॉन की पिंकवाली,गोटे-किनारे की लहरिये वाली ?’’
‘‘और….सुना दो, सौ-दो-सौ,नाम? मैं कब मना कर रही हूँ? तुम तो बाबा हर दिन नई साड़ी लाते हो!हर रोज नया गहना गढ़वाते हो! करम फूटी तो मैं ही हूँ….जो तुम्हारे पल्ले पड़ गई हूँ! तुम तो औरत का इत्ता ,ख्याल रखते हो कि बस्स….!!’’
‘‘सारी बात सिर्फ बदलने की थी…….उसमें कितनी बकबक…..?’’
‘‘पागली कुत्ती हूँ न? तभी तो इतनी बकबक करती हूँ!पर तुम तो कवि नहीं, मानो एक अफसर हो अफसर! दस-पन्द्रह हजार रुपया महीना कमाते हो,और आँख मूँद …..सीधे मेरी हथेली पर धर देते हो? हूँह!….अगर दो दिन भी घर चलाना पड़े….तो सारा कविपणा ठिकाणे आ जाए। पर भाग तो मेरे ही फूटणे थे जो तुम्हारे पल्ले….’’ और उसका सुबकना चालू हो गया।
‘‘अच्छा बाबा, माने लेता हूँ कि तुम्हारे पास एक भी साड़ी नहीं हैं….यहाँ तक कि जो पहन रखी है….वह भी नहीं! अब जाओ….नीचे औरतें कब से आवाजें दे रहीं हेै! पर जरा यह बता जाओ कि खाना कहाँ पर रखा है?’’ और सावित्री पति की बात को अनसुनी कर आँसू पोंछती, उसी साड़ी में, चिर सुहाग कर वर देने वाले ईसर-गणगौर व्रत-पूजन को चल दी।
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4-अप्रत्याशित
सिर दुखने का बहाना कर वह आँखें मूँद लेट गई ताकि अपने बारे में मम्मी-पापा का वार्तालाप सुन सके, उसकी सहेली शादी का कार्ड देने सुबह स्वयं आई थी और उसे पूरी संभावना थी कि मम्मी आज पापा से जरूर कहेंगी।
‘‘सुनते हो? गली वाले शर्मा की बेटी, गैरजाते में ब्याह रचा रही है! राम-राम!!….कित्ता खराब जमाना आ गया है, छोरी ने माँ-बाप की इज्जत ही मिट्टी में मिला दी!….और भेजो कोलिज पढ़ने? और इत्तराओ….सिर चढ़ाओ लड़कियों को!! उसकी जगह मेरी तनु होती,……तो चीर के रख देती…..!!…..’’
और तब-शायद पापा, बीच में ही सगर्व घोषणा करेंगे।
‘‘खबरदार! जो ऐसे कामों मेरी तनु को घसीटा! उसकी क्या होड़ करेगा-कोई? उसे तेा बाहर आना-जाना तक पसंद नहीं!…बस उसकी किताबें और उसका कमरा भला! मजाल….कभी किसी छोकरें की ओर नजर भी उठा के देखा हो??….अरे…उसने….’’
तनु को अपनी कल्पना में उपजे संवाद की अधिक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी, उसने सुना पापा बड़े विषाद भरे स्वरों में कह रहे थे..‘‘तनु की सहेली बड़ी लक्की निकली! बिना दान-दहेज, खोज बीन के, सर्विस लगा इत्ता अच्छा लड़का घर बैठे हाथ लग गया शर्मा जी को?’’
और एक लम्बी निःश्वास छोड़ मम्मी ने उत्तर दिया, ‘‘सबकी तकदीर एक सी थोड़े ही होती है! तनु का भाग्य, वह कहीं आती जाती भी तो नहीं!’’
तनु से आगे नहीं सुना गया, लगा…एक तीखी-कटार उसके हृदय को चीरती….जा रही है….और वह अभी चीख पड़ेगी बिना मतलब बस यूँ ही….।
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5-इमरजेंसी
रेडियो पर उसकी कहानी ‘’प्रतिबन्ध’ सुनते ही, सौतेली माँ लाल अंगार हो उठी,
‘‘तो तू इन कहानियों में मेरी बुराइयाँ लिखती है? घर की बातों को उघाड़-उघाड़ ,दुनिया के सामने मुझे नीचा दिखा, बदनाम करना चाहती हैं? इत्ती आजादी देने का….
‘‘पर माँ, यह कहानी तो राष्ट्र की इमरजेंसी पर…..’’
‘‘हाँ-हाँ, जैसे इत्ता भी नहीं जानती हूँ?….कैसे-कैसे तानें कसे हैं मुझ पर….कहानी में!….उस हाजी दादा के घर से संबंध नहीं रखूँ, तो तू ला देगी मौके-बेमौके कहीं से रुपये? उस रसिया के बाप की चमचागिरी नहीं करूँ, तो तू निपटा लेगी गाँव-गिरस्ती के झगड़े? संजय को चाबी वाली कार क्या दिला दी…जैसे कोई आफत आ गई, बच्चे से इतनी ईर्ष्या ? पर अब कान खोलकर सुन ले, यदि मेरे विरुद्ध, कभी कुछ भी लिखा तो आग ला दूँगी कमरे में! कागज-किताबें सब राख कर दूँगी, बहुत आजादी पाकर बिगड़ गई है तू,….इस घर में रहना है तो सीधी तरह चुपचाप…’’
माँ का हिटलरी रूप देखकर, पापा बाहर आए, उसने राहत की साँस ली, पापा से ही तो प्रेरणा मिली थी लेखन की, अब पापा खुद ही शांत कर देंगे इस भवानी माँ को कि लेखन का अर्थ….पर पापा उलटे उसी पर गरजे…तुझे माँ का विरोध नहीं करना चाहिए, आज सत्ताईस वर्ष हो गए मुझे, इस घर को धकाते-धकाते, पर पिछले सात-आठ वर्ष से, इसके आने के बाद थोड़ा चैन मिला है! जिस कुशलता से इसने यहाँ का शासन -प्रबंध सँभाल रखा है, कमाल है, अब बता? जहाँ इसकी प्रशस्ति गानी चाहिए, वहाँ तू उलटे आलोचना….
वह विस्मित रह गई, क्या हो गया है पापा को?….या माँ को डिक्टेटरशिप ने मजबूर कर दिया है?….कुछ भी हो, वह लिखेगी और खूब खुलकर लिखेगी, कोई क्या कर लेगा?…..पर अगले ही पल ध्यान आया, लिखेगी कैसे।?….आखिर अभी उसे रहना तो इसी घर में है, सिर्फ रहना ही क्यों, खाना भी है, पढ़ना भी,…तब…? तभी संजय दौड़ता हुआ आया, ‘‘जीजी, कल पंदरा अगस्त है, स्कूल में बोलना है, आजादी के बारे में कुछ रटवा दो न!’’
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6-कैरियर
‘‘सर! आपकी पुस्तके!’’
‘‘बैठो, पेपर्स कैसे हुए?’’
‘‘जी-बहुत अच्छे!’’
‘‘और नीता तुम्हारे?’’
‘‘जी, सर यूँ….ही, तीसरा तो बिल्कुल बिगड़ गया।’’
‘‘खैर छोड़ो!’’
‘‘नीता तुम्हें तो हर चीज का पता है, जरा चाय बना लाओ। और अंशु, सामने वाला बण्डल खोलकर, जरा नम्बरों की टोटलिंग करवा दो….आज ही भेजना है, फिर बाद में….।’’
टोटलिंग करते-करते अंशु ने अचानक सिर उठाया, तो देखा सर की नज़रें उस पर चिपकी हुई है।
‘‘अंशु! तुम साड़ी मत पहना करो, तुम सलवार सूट में ज्यादा जँचती हो।’’
‘‘जी सर?’’ वह अंदर ही अंदर काँप उठी।’’
‘‘अरे तुम घबरा क्यों रही हो?’’ सर ने एक थपकी दी, बिलकुल करीब आकर।
‘‘नहीं तो….याद ही नहीं रहा कि मम्मी अस्पताल गई है, खाना बनाना है घर पर।’’
‘‘तो चाय पीकर चली जाना!’’ सर व्यंग्य से मुस्कराए।
‘‘नहीं सर! फिर कभी’’ और वह तेजी से बाहर आ गई।
किचन में चाय बनाती नीता से कहा, ‘‘मुझे एक जरूरी काम याद आ गया है, अभी चलना होगा थोड़ा जल्दी कर लो….।’’
‘‘पर, मुझे तो कोई जल्दी नहीं है, फिर कापियाँ नहीं जँचवाई तो सर नाराज हो जाएँगे, अंशु रुक जाओ तो अच्छा है।’’
‘‘तुम्हें जाना है तो जाओ, इसे भी क्यों घसीट रही हो?’’ अचानक सर की पर्दे को चीरती आई इस तूफानी डाँट पर अंशु चौंक पड़ी और बेबस सी अकेली ही लौट पड़ी।
आज जब रिजल्ट आया उसका सारा कैरियर बिगड़ चुका था और नीता का बन गया था।
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