गढ़वाली अनुवाद
डॉ कविता भट्ट ‘शैलपुत्री’
मुबैलै घण्टी बजि। हिंद्या रीडर महोदैन वे तै कंदूड़ पर लगै अर बोलि,”हलो!” उख बटी ऊँकै विभागा दगड़िए आवाज ऐ, “एक खुसखबरी च।”
“क्य?”
“यू.जी.सी. का हिसाब सि ‘नैट’ अब कम्पलसरी नि रै गि।”
”सचि य त अच्छी खबर च। नैट सचि माँ एक जाळ ही छौ। बिना नैट सि मुक्त ह्वयाँ क्वी प्रवक्ता बणणा वास्ता अप्लाई तक नि करि सकदू छौ।”
“अब लोग पी-एच. डी. तर्फां जादा भगला।”
“हाँ, इख्माँ क्य सक च।”
“त फेर तुम खुणि मार्केटिंग सुरु करि द्यौ?”
“क्य पॉसिबिलिटी च?”
“कम सि कम साठ-सत्तर हजार। तीस ‘सिनॉप्सिस’ मंजूर हूण पर, बाकि थीसिस लिखे जाणा क बाद।”
“अबि जग्वाळ जरा। रेट हौर बढ़णन।”
सोध-छात्रु तैं एक हौर जाळ बुणेणु छौ।
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