यूँ तो साहित्य लेखन की लघुकथा विधा के वर्तमान परिदृश्य में रचनाकारों की गिनती कम नहीं है, लेकिन इस बड़ी गिनती में सजग और गंभीर प्रयास कितने होते हैं? इस बात पर मंथन अवश्य किया जा सकता है। बहरहाल इन गंभीर प्रयासों में यदि एक नाम ‘संतोष सुपेकर’ का लिया जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। इस बात के समर्थन में; बीते वर्ष (2020) में उनकी गंभीर लेखनी से निकलकर आया लघुकथा संग्रह सातवें पन्ने की खबर सहज ही एक सशक्त प्रमाण माना जा सकता है।
डिमाई आकार के हार्डबाउंड संस्करण में छपे इस संग्रह को उज्जैन के अक्षरविन्यास प्रकाशन द्वारा प्रकाशित किया गया है। सामाजिक विद्रूपताओं का कोलाहल दर्शाता संग्रह का आवरण चित्र और शीर्षक सहज ही आकर्षित करते हैं। पुस्तक के आवरणकार विख्यात चित्रकार ‘संदीप राशिनकर’ ने कहीं एक वार्ता में कहा भी है कि लघुकथा संग्रह का शीर्षक सुनकर ही मुझे बहुत-सी आहटों, विद्रूपताओं के स्वर सुनाई देने लगे थे।
संग्रह में शामिल कुल 112 लघुकथाएँ, भिन्न-भिन्न सामाजिक विषमताओं को समेटती नजर आती हैं। यह लघुकथाओं की विशेषता कही जा सकती है कि अधिकांश रचनाएँ सीधे पाठक के मन-मस्तिष्क पर छाप छोड़ती हैं। बहरहाल इस संग्रह में सम्मिलित रचनाओं के स्तर का आकलन इस बात से लगाया जा सकता है कि इसे पढ़ने के बाद कई सुधीजनों ने इसकी प्रशंसा की है। जाने-माने लघुकथा मर्मज्ञ योगराज प्रभाकर (लघुकथा कलश फेम) ने तो इस संग्रह के संदर्भ में कहीं कहा भी है कि सुपेकर की लघुकथाएँ संवेदना के स्तर पर बेजोड़ और शिल्प की दृष्टि से अति उत्तम होती हैं।
बात यदि संग्रह की शीर्षक रचना से शुरू की जाए, तो लघुकथा सातवें पन्ने की ख़बर मीडिया तन्त्र के उस पक्ष की ओर अंगुली उठाती है; जहां केवल ‘टी आर पी’ बेस पर सनसनीखेज और संवादात्मक समाचारों को प्राथमिकता दी जाती है। सांप्रदायिक सौहार्द की प्रतीक कोई घटना यदि सामने आती भी है तो उसे कहीं हाशिए पर धकेल, समाचार-पत्र में अंतिम पृष्ठों पर स्थान दिया जाता है। शीर्षक के मद्देनज़र यहां यह बात ग़ौरतलब है कि अधिकांश दैनिक पत्र आठ पृष्ठ के ही होते हैं और सातवें पृष्ठ को अंतिम पृष्ठ ही माना जाता है। संग्रह में एक लघुकथा है गिनिपिग्स जो मेडिकल कंसेप्ट में संभवत: अपनी तरह की प्रथम लघुकथा है। रचना में एक ग्रामीण, अस्पताल में किसी दवा के परीक्षण के लिए एक जानवर की तरह प्रयोग होने के लिए शहर जा रहा है। रचना का नवीनपन और विषय सहज ही लंबे समय तक याद रहने वाला है। सर्द जवाब जैसी लघुकथा भी इस संग्रह में शामिल है जिसे बीते वर्ष (2019) में ‘कथादेश आखिल भारतीय लघुकथा’ आयोजन में पुरस्कृत किया गया है। सर्द सर्दी के ठिठुरते मौसम में एक बालक द्वारा राष्ट्रीय झंडे की, की गई चोरी का कारण अपना शरीर ढाँपना है। यह सत्य सामने आते ही पाठक भी कुछ क्षण के लिए स्तब्ध रह जाता है।
सशक्त उदाहरण जैसी लघुकथा में लेखक कितनी सरलता से प्रात: कालीन सैर के बीच चंद संवादों के ज़रिए, घरों के बाहर अतीत में लगने वाले बोर्ड ‘अतिथि देवो भव:’ से वर्तमान में लगने वाले बोर्ड ‘आप कैमरे की नज़र में हैं’ तक का सफर तय कर जाता हैं। लेखक एकाएक जैसी लघुकथा भी रचता हैं, जिसमें एक छोटे से घटनाक्रम में (सड़कों पर जुलूस और बारात के धूम धड़ाके से अनायास ही होने वाली नफ़रत की मानसिकता) वह मनुष्य की भावनाओं को रोपित कर देता हैं। बेटे के नृत्य को देखकर सड़क पर बारातियों के नृत्य से लगे जाम से नफरत करने वाले पिता की मानसिकता बदल जाती है और वह अपने चार वर्षीय बेटे के साथ नृत्य करने लग जाता हैं। (भावनाओं के इस दर्शन को देख सहज ही कथाकार सुभाष नीरव की लघुकथा बरसात याद आ जाती है, जिसमें एक बूढ़ा दो युगल प्रेमियों को बरसात के नाचते-झूमते देखकर अनायास ही उस खेल में शामिल हो जाता है)।एक लघुकथा है वह विल, यह भी बिल्कुल नवीन विषय पर आधारित है बल्कि इसका ट्रीटमेंट शिल्प की दृष्टि से अद्धभुत हुआ है। इस रचना में एक वृद्ध पिता द्वारा की गई वसीयत, जिसमें वह अपने बच्चों को सख्त ताक़ीद करता है कि उसकी बीमारी की हालत में, उसे वेंटिलेटर पर न रखा जाए, के मूल में वस्तुतः कहीं न कहीं डॉक्टर्स द्वारा वेंटिलेटर को एक हथियार बनाने लेने की मानसिकता पर चोट करने की भावना नजर आ रही है।
एक और रचना दायरा विखंडन में स्त्री के फिल्मी गीतों को तेज आवाज में सुनने के शौक पर अचम्भित अवस्था में उठाए गए प्रश्न पर स्त्री के पति द्वारा साहसिक विरोध करते दिखाना इस रचना की सफलता कही जा सकती है। मज़बूत स्वर इस संग्रह की एक और मज़बूत लघुकथा है. यह उस व्यक्ति की संघर्ष गाथा है जिसे हम लोग अन्नदाता भी कहते हैं, जिसे न तो वेतन मिलता है और न ही कभी कोई छुट्टी मिलती है। मगर वह फिर भी अपने कर्त्तव्य पर अडींग रहता है। ऐसी लघुकथाओं की हमारे समाज को बहुत आवश्यकता है। कुछ और लघुकथाओं को देखें तो जहां एक ओर लघुकथा वह स्वर भारतीय स्त्री के मातृत्त्व-स्वरूप का चित्रण करने में सफल रहती है, वहीं लघुकथा भ्रूणहत्या समाज की कट्टरपंथी सोच पर प्रभावी ढंग से कटाक्ष करती नजर आती है।
जीवन मूल्यों के प्रति लेखक का नजरिया न केवल गहरी दृष्टि रखता है बल्कि सामाजिक सन्दर्भ में उनका सूक्ष्म अवलोकन सहज ही अचंभित भी करता है। वो क्या है जैसी लघुकथा में वह एक बच्चे के मुख से एक तीक्ष्ण प्रश्न सामने रख देता है, कि यदि ईंटें सिर्फ़ मकान बनाने के काम आती हैं तो मजदूरों द्वारा खाने बनाने के लिए बनाया गया ‘चूल्हा’ और सिर के नीचे ‘ईट का तकिया’ बनाए सोया मजदूर, यह सब क्या है? आह जनित सच जैसी रचना में चार वर्ष की आयु से कचरा ढोने वाले युवक का 26 वर्ष की आयु में अपना अनुभव 22 वर्ष का बताना, गर्व से अपना अनुभव बताने वाले समाज के सद्दजनों को स्तब्ध कर देता है। एक और जगह, व्यवस्था के छेद जैसी लघुकथा में लेखक चंद शब्दों में समाज की व्यवस्थागत विसंगति को सबकी नज़र में लाने का प्रयास करता हैं। अनोखा सत्य, पंक्चुअलिटी, निशानी, ऊहापोह, उस शाम की सुबह, दूसरा पहलू, क्षरण जैसी रचनाएँ भी सहज ही अपनी बात सटीकता से कहती नजर आती है।
सुपेकर के लेखन में, दंश कथा, अनुभूति, वात्सल्य एप, दीवार बनने की ख़्वाहिश, उस शाम की सुबह, मुखर होती सिरहन, ड्रॉ बैक और पुछल्ला जैसी लघुकथाओं में परिवार के प्रति दुश्चिंताएँ, सामंजस्य और प्रेम जैसे भावों को मुखरता से शामिल करने का प्रयास हुआ है। लघुकथा दंश कथा में एक गरीब बच्चे से पेट भरने के सवाल पर मिलता जवाब, “माँ बापू की मार से ही पेट भर जाता है।“ पाठक को दंश देने के लिए काफी है। ऐसी ही एक लघुकथा सौ डिग्री का जवाब गरीबी का एक ऐसा रंग दिखाती है, जिसमें एक बच्चा बताता है कि कैसे उसका परिवार खाने की थाली को खाने के साथ ‘तवे’ की तरह भी प्रयोग करते हैं। और इससे भी कुछ आगे बढ़कर लघुकथा खानदानी अपने पीछे एक प्रश्न बहुत शिद्दत से छोड़ती है, कि क्या किसी गरीब के ‘माथे का पसीना’ और बीड़ी अभिशाप के रूप में उसके साथ खानदानी रूप से बदा है। रचना ड्रॉ बैक में बढ़ती उम्र को छिपाने के लिए काले किए गए बाल के बावजूद एक समारोह में रचना के मुख्य पात्र के अंदर का मन अपनी वरिष्ठता के प्रति एक युवा स्त्री की अवेहलना से व्यथित होना सहज ही व्यक्ति की निज वास्तविकता को दर्शा जाता है।
कोरोना काल में एक लेडी डॉक्टर के अपनी ढाई साल की बच्ची से दूर रहने का दर्द भी लघुकथा एक और डिस्टेंस में सटीकता से उभर कर आया है। विषअंकुरण जैसी रचना में एक व्यक्ति द्वारा बच्चे में स्वार्थ भावना के विष-अंकुरण किस तरह पैदा करता है, इसका सुंदर चित्रण है। जिन फलों को वह ‘कैल्शियम कार्बाइड’ जैसे विष से पकाकर दूसरों को बेचना चाहता है, उन फलों को उसका पुत्र खाए; यही वह नहीं चाहता। स्वार्थ भावना का एक सुंदर उदाहरण है यह रचना। लघुकथा सभ्यताओं सुनो इस संग्रह की अंतिम रचना है जो इस समय की सबसे बड़ी समस्या के संदर्भ के साथ अपनी बात कहना चाहती है। लघुकथा, बीमारी के लिए बनाई गई वैक्सीन की तरह रिवॉल्वर,बंदूक आदि से बचाव के लिए कवच रूपी वैक्सीन बनाने के विचार पर मंथन करती नजर आती है।
लघुकथा साहित्य में लघुकथा का शीर्षक इसका सर्वाधिक महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। इस संदर्भ में यदि इस संग्रह को देखा जाए तो सर्द जवाब, सातवें पन्ने की ख़बर, गिनिपिग्स जैसे शीर्षक वस्तुतः लेखक की गहनता एवं गंभीरता, दोनों को ही दर्शाते हैं। लेकिन बहुत से शीर्षक न केवल सतही तौर पर तय किए लगते हैं, बल्कि एक औपचारिकता सी निभाते नज़र आते हैं। संग्रह में प्रस्तुति के स्तर पर शीर्षकों को अव्यवस्थित ढंग (अनावश्यक कोमा आदि) से देने की कमी भी बहुत शिद्दत से महसूस होती है। लघुकथाओं के साथ उनके प्रकाशन संदर्भ का ज़िक्र एक अच्छा प्रयोग है। बहरहाल संकलन की गाय नहीं, गंभीर होती हँसी, दहल, के पी, दो और एक चार जैसी कुछ लघुकथाएँ चाहकर भी अपनी सार्थकता सिद्ध नहीं कर पाई हैं। फिर भी कुछ लघुकथाओं को यदि नजरअंदाज कर दिया जाए तो हर रचना न केवल पाठक को दिमागी तौर पर सोचने के लिए विवश करती है, बल्कि एक लंबे समय तक उसकी स्मृति में अपना स्थान बनाती नजर आती है। और यही इस संग्रह की सार्थकता भी है। और साहित्य- जगत् में विधा को निरंतर सक्रिय रखने के लिए ऐसी कृतियों की जरूरत हमेशा बनी रहेगी!
-0-सातवें पन्ने की खबर- संतोष सुपेकर, पृष्ठ – 126 मूल्य – ₹ 250/-, प्रथम संस्करण, 2020
प्रकाशन – अक्षरविन्यास, उज्जैन।