2- समय
बचपन से ही पापाजी अपने बच्चों को कहानी सुनाया करते थे। बच्चे चाव से सुनते थे। बाद में गर्व से सुनने लगे थे। एक कहानीकार के रूप में पापाजी की सफलता में बच्चों का भी हाथ था—ऐसा पापाजी धन्यवाद-स्वरूप महसूस करते थे।
अब बच्चे बड़े होकर नौकरी-पेशा हो गये हैं। बड़े घर से रिश्ता जोड़ लिया है। जिन्दगी की बहुरंगी चकाचौंध में डुबकी लगाने की लालसा पूरी कर रहे हैं। किन्हीं अनजान ऊँचाइयों को छूने की ललक में हमेशा परेशान रहते हैं।
पापाजी अब भी कहानी लिखते हैं। बच्चों को सुनाते हैं। उद्वेग से पूछते हैं—कैसी है।
ठीक है।
सिर्फ ठीक।
अच्छी है।—कहकर बच्चे पापाजी की तरफ देखते हैं। पापाजी का उदासीन चेहरा देखकर बच्चे तुनक जाते हैं और असहिष्णुता से पूछते हैं:अब जान लोगे क्या।
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अगस्त 2026
देशसमय Posted: August 1, 2015
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