द्वितीय पुरस्कार
कोचिंग के लिए निकलने ही वाला था कि मम्मी ने टोक दिया – “पहले दादी को किसी डॉक्टर को दिखा लाओ! सुबह से तकलीफ में हैं!”
मैं मन ही मन बुरी तरह से झल्ला उठा –
मेडिकल के प्री-एक्जाम की कोचिंग है यह – कोई मज़ाक नहीं है! पापा इतनी महँगी फीस कैसे भर रहे हैं, यह सोचकर कभी-कभी बहुत ग्लानि होती है – इसलिए अब एक मिनट भी फालतू खर्च करना मुझे बर्दाश्त नहीं है! हर हाल में यह एक्जाम क्रेक करना है मुझे!
मैंने स्कूटर का रूख एक प्राइवेट हॉस्पिटल की तरफ मोड दिया। सरकारी अस्पताल की कतार में खड़े रह कर सारा दिन बर्बाद नहीं करना है मुझे!
और यह मम्मी ने सिर्फ हज़ार रुपये क्या सोचकर पकड़ा दिये मुझे? किस ज़माने में जी रहे हैं ये लोग! अरे तीन सौ रुपये तो डॉक्टर की फीस ही होगी – फिर आजकल बिना ब्लड-यूरिन टेस्ट करवाए कोई डॉक्टर इलाज कहाँ शुरू करता है – तो पाँच-छह सौ उसमे लग जाएँगे – फिर दवाइयाँ!! अगर पैसे कम पड़ गए तो क्या करूँगा?
तभी पीछे सीट पर बैठी दादी ने एक अलग ही रट लगानी शुरू कर दी – “डॉक्टर के नहीं जाना मुझे – नाभि खिसकने का दर्द है यह – उस चूड़ी वाली बुढ़िया के पास ले चल!”
दादी की इस दक़ियानूसी सोच से मेरा पारा चढ़ने लगा – मैंने उन्हें लाख समझाने की कोशिश की; लेकिन सब बेकार! उनकी ज़िद के आगे झुकना ही पड़ा!
बाज़ार की उस तंग सी गली में वह चूड़ियों की एक छोटी सी दुकान थी।
उस बुढ़िया ने वहीं भीतर फर्श पर बिछी एक दरी पर दादी को लिटा कर उपचार शुरू कर दिया – मैं अपना मुँह फेर कर खड़ा हो गया – नहीं देखना था मुझे यह सब!!
दस मिनट बाद मुस्कुराती हुई दादी ने मेरे कंधे को थपथपाकर चलने का इशारा किया! मैंने थोड़ी बेरुखी से पूछा – “कितने पैसे देने हैं इस चूड़ीवाली को!”
दादी अभी कुछ कहती कि उस बुढ़िया ने अपने झुर्रीदार चेहरे पर उभर आई हँसी को काबू में करते हुए कहा – “अरे बेटा, यह तो विद्या है – इसके पैसे नहीं लेने चाहिए – पाप लगता है!
जाओ तुम पढ़-लिखकर खूब बड़े आदमी बनो!”
– महेश शर्मा,77, गुलाब बाग,जवाहर नगर, सवाई माधोपुर (राजस्थान) – 322 001