‘लघुकथा कम शब्दों में बड़ी बात कहती है…।’क्षण विशेष की रचना है….।’लघुकथा में कथा तत्व के साथ शिल्प, कथानक, शीर्षक तथा कसावट आदि प्रमुख तत्व है…लघुकथा विसंगतियों पर प्रहार करे….
सबसे पहले मुझे अपने बारे में स्पष्ट तौर से कह देने में कोई संकोच नहीं है कि, मैं न तो कोई साहित्यकार हूँ। और न ही कोई बड़ी लघुकथाकार, कि जो मैं कहूँ वही बात सही हो। पर….मैं लघुकथा को अन्तर्मन की गहराइयों से पसंद करने वाली, एक अदना सी पाठिका जरूर हूँ, जिसे लघुकथा पढ़ना,…गुनना,..ओढ़ना – बिछाना और कभी-कभी लिखना भी अच्छा लगता है।
अब जबकि लघुकथा से मेरा इतना लगाव- जुड़ाव है, तो इसे पढ़कर जो महसूस करती हूँ।….मेरे जीवन में जो बदलाव आते हैं, उनको बताना भी मेरा परम कर्तव्य है।
जिस प्रकार एक लेखक का कर्म लिखना है। तो उस लिखे हुए को पढ़कर पाठक के मन में आने वाले भावों को लिखना भी उसका पाठकीय धर्म है।
लेखक के कई वर्षों के अनुभव का सार,…अनगिनत जागती रातों और अंतर्मन के द्वंद्व से लिखी रचना पर पढ़कर प्रतिक्रिया देना भी इसी धर्म का निर्वहन है।
जिस प्रकार अपने आस पास घटित में विसंगतियों को देखकर लेखक लघुकथा लिखने विवश हो जाता है।उसी तरह लघुकथा,…पाठक को उन अवधारणाओं, रूढ़ियों और विसंगतियों की ओर संकेत करती है, जिन्हें अपने दैनिक जीवन में देखते तो रोज है पर देख कर भी नजरअंदाज करते रहते हैं।लघुकथा केवल संकेत नहीं करती बल्कि, अंतर्मन तक जाकर सुई की नोक सी चुभ जाती हैं तथा हमारे मन को उस दिशा में सकारात्मक निर्णय के लिए उद्वेलित भी कर जाती हैं।
सुकेश साहनी जी की लघुकथा ‘गोश्त की गंध’ तथा रामेश्वर काम्बोज हिमांशु जी लघुकथा ‘नवजन्मा’ पर अपनी पाठकीय प्रतिक्रिया प्रस्तुत कर रही हूँ.
लघुकथा- गोश्त की गंध–लेखक- सुकेश साहनी जी
दरवाजा उसके बारह वर्षीय साले ने खोला और सहसा उसे अपने सामने देखकर वह ऐसे सिकुड़ गया जैसे उसके शरीर से एकमात्र ने कर भी खींच लिया गया हो।दरवाजे की ओट लेकर उसने अपने जीजा के भीतर आने के लिए रास्ता छोड़ दिया। वह अपने साले के इस उम्र में भी पिचके गालों और अस्थि – पंजर- से शरीर को हैरानी से देखता रह गया।
भीतर जाते हुए उसकी नजर बदरंग दरवाजों और जगह-जगह से झड़ते प्लास्टर पर पड़ी और वह सोच में पड़ गया। अगले कमरे में पुराने जर्जर सोफे पर बैठे हुए उसे विचित्र अनुभूति हुई। उसे लगा बगल के कमरे के बीचो-बीच उसके सास-ससुर और पत्नी उसके अचानक आने से आतंकित होकर काँपते हुए कुछ फुसफुसा रहे हैं।
रसोई से स्टोर के जलने की आवाज आ रही थी। एकाएक ताजे गोश्त और खून की मिली-जुली गंध उसके नथुनों में भर गई। वह उसे अपने मन का बहम समझता रहा पर जब खाना परोसा तो वह सन्न रह गया। सब्जी की प्लेटों में खून के बीच आदमी के गोश्त के बिल्कुल ताजा टुकड़े तैर रहे थे। बस, उसी उसी क्षण उसकी समझ में सब कुछ आ गया। ससुर महोदय पूरी आस्तीन की कमीज पहन कर बैठे हुए थे, ताकि वह उसके हाथ से उतारे गए गोश्त रहे भाग को न देख सके। अपनी तरफ से उन्होंने शुरू से ही काफी होशियारी बरती थी। उन्होंने अपने गालों के भीतरी भाग से गोश्त उतरवाया था, पर ऐसा करने से गालों में पड़ गए गड्ढों को नहीं छिपा सके थे। सास भी बड़ी चालाकी से एक फटा- सा दुपट्टा ओढ़े बैठी थी, ताकि कहाँ-कहाँ गोश्त उतारा गया है, समझ न सके। साला दीवार के सहारे सिर झुकाए उदास खड़ा था, और अपनी ऊँची- ऊँची नेकर से झाँकती गोश्त रहित जांघों को छिपाने का असफल प्रयास कर रहा था। उसकी पत्नी सब्जी की प्लेट में चमचा चलाते हुए कुछ सोच रही थी।
“राकेश जी, लीजिए ….लीजिए न!” अपने ससुर महोदय की आवाज उसके कानों में पड़ी।
“मैं आदमी का गोश्त नहीं खाता!!” प्लेट को परे ढकेलते हुए उसने कहा। अपनी चोरी पकड़े जाने से उनके चेहरे सफेद पड़ गए थे।
” क्या हुआ आपको?…सब्जी तो शाही पनीर की है!” पत्नी ने विस्फारित नेत्रों से उसकी ओर देखते हुए कहा।
“बेटा नाराज मत होओ…. हम तुम्हारी खातिर में ज्यादा कुछ कर नहीं…” सास ने कहना चाहा ।
“देखिए, मैं बिल्कुल नाराज़ नहीं हूँ।” उसने मुस्कुराकर कहा -“मुझे दिल से अपना बेटा समझिए और अपना मांस परोसना बंद कीजिए। जो खुद खाते हैं, वही खिलाइए। मैं खुशी-खुशी खा लूँगा।”
वे सब असमंजस की स्थिति में उसके सामने खड़े थे। तभी उसकी नजर अपने साले पर पड़ी। वह बड़ी मीठी नजरों से सीधे उसकी ओर देख रहा था।सास-ससुर इस कदर अचंभित थे, जैसे यकायक किसी शेर ने उन्हें अपनी गिरफ्त से आजाद कर दिया हो। पत्नी की आँखों से आँसू बह रहे थे। यह सब देखकर उसने सोचा…. काश, यह गोश्त की गंध उसे बहुत पहले ही महसूस हो गई होती!
– प्रस्तुत रचना लघुकथाकार आदरणीय “सुकेश साहनी जी” की कालजयी रचनाओं में से एक है। सुकेश साहनी लघुकथा के क्षेत्र में एक जाना पहचाना नाम है। 19 वीं सदी में लघुकथा के उत्थान और वर्तमान परिष्कृत रूप तक पहुँचाने में जिन लघुकथाकारों का योगदान अतुलनीय है, उनमें साहनी जी भी पांक्तेय हैं।इन्होंने लघुकथा के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य किया है। सुकेश जी की लिखी हुई लघुकथाएँ, नवोदित लघुकथाकारों का मार्गदर्शन ही नहीं करती बल्कि समझने की पूरी पाठशाला होती हैं।
अब बात लघुकथा की-:
साहनी जी की यह लघुकथा निसंदेह एक कालजयी रचनाओं में से एक है, जो अपने आप में अनूठी है।यह फैन्टेसी लघुकथा का उत्कृष्ट उदाहरण है।लघुकथा में प्रयुक्त बिम्ब, शिल्प, भाषा शैली, कथ्य आदि लेखक की कल्पनाशीलता की पराकाष्ठा है।
लघुकथा सहज ही पाठक को आकर्षित करती है।मुझे पूरा यकीन है जिसने भी इस लघुकथा पहली बार पढी होगी, उसने दुबारा जरूर पढी होगी और उसके जेहन में सदा अंकित रहेगी।जिस तरह मेरे जेहन में अंकित है।
जब मैंने पहली बार यह रचना पड़ी तो आश्चर्य से ठगी सी रह गई। मन एक अलग ही दुनिया में पहुँच गया।किसी लघुकथाकार ने कहा कि ‘चार अच्छी लघुकथाएँ पढ़कर आप चैन से सो सकते हैं, तो एक अच्छी लघुकथा आपकी नींद उड़ा सकती है’ यह वक्तव्य मुझे इस लघुकथा पर सार्थक होते प्रतीत हुआ।यही वो एक लघुकथा है जो पाठक की नींद उड़ा सकती है।
इस रचना को पढ़ने के बाद मन उद्देलित सा हो गया। लेखक ने लघुकथा के माध्यम से आम निम्न मध्यमवर्गीय परिवारों की दुखती रग को छुआ ही नहीं, बल्कि उसको सहला कर मरहम का भी काम किया है।
हमारे समाज में कई सामाजिक रूढ़ियाँ व्याप्त हैं। आज भी दामाद को भगवान का दर्जा देना और उसकी आवभगत में स्वयं को बेचने तक भी तैयार रहना भी एक है। एक पिता अपनी बेटी के कन्यादान के बाद भी उसकी जिम्मेदारियों से मुक्त नहीं होता है, अपितु सारा जीवन ही उसे ससुराल वालों के नखरे उठाने मजबूत रहता है।क्योंकि वह अपनी बेटी को अपनी वजह से कुछ भी परेशानी नहीं देना चाहते हैं।आज भी कई बेटियाँ इन्हीं रूढियों के कारण कभी जला दी जाती है तो कभी, घर से बाहर निकाल दी जाती हैं,या आजीवन ही मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना सहती रहती है।
इस लघुकथा के माध्यम से लेखक ने इंगित किया है कि भले ही घर की हालत ठीक न हो फिर भी, घर आए दामाद की आवभगत में सारा परिवार तत्पर होता है। और उसके सामने महंगे और लजीज खाने के व्यंजन परोसने से भी परहेज नहीं करता, जबकि उसकी स्वयं की हालत दाल रोटी खाने के लायक ही होती है।
लघुकथा को पढ़ते समय शुरूआती एक-एक पंक्ति पढ़ते ही मन न जाने कैसा भारी सा होता चला गया, और तनाव बढ़ता गया। परंतु अंत तक आते- आते लेखक द्वारा दिया सार्थक सकारात्मक अंत को पढ़कर मन एकदम हल्का हो गया, और एक पाठकीय सुकून की अनुभूति हुई।
इस लघुकथा में ‘गोश्त’ बिंब है, मायके वालों की माली हालत हालत का,जिसके द्वारा लेखक ने बड़ी खूबसूरती से, कुछ न कहकर भी पाठक को सब कह दिया है।लघुकथा की निम्न पंक्तियाँ मन को गहरे तक कचोटती हैं
(सब्जी की प्लेटों में खून के बीच आदमी के गोश्त के बिल्कुल ताजा टुकड़े तैर रहे थे।
उन्होंने अपने गालों के भीतर भाग से गोश्त उतरवाया था, पर ऐसा करने से गालों में पड़ गए गड्ढों को नहीं छिपा पाए थे।
सास भी बड़ी चालाकी से एक छोटा सा दुपट्टा ओढ़े बैठी थी, ताकि कहाँ-कहाँ से गोश्त उतारा गया है, समझ न सके।
साला दीवार के सहारे सिर झुकाए उदास खड़ा था, और अपनी ऊँची ऊँची लेकर से झाँकती गोश्त रहित जाँघों को छिपाने का असफल प्रयास कर रहा था।)
हर पिता अपने दामाद में बेटे की छवि ही चाहता है।कथा के मुख्य पात्र दामाद के द्वारा पत्नी के परिवार को अपना मानना, सुकून भरा लगता है।दामाद के कहे शब्द रेगिस्तान में अचानक बारिश की ठंडी फुहार से लगते हैं।
“मुझे अपना बेटा ही समझिए और अपना माँस परोसना बन्द कीजिए।जो खुद खाते हैं, वही खिलाइए।मैं खुशी खुशी खा लूँगा।” अंतस तक भिगो देता है।
मुख्य पात्र दामाद का सकारात्मक रवैया, उन दामादों के मुँह पर तमाचा है, जो ससुराल में अपनी आवभगत को अपना अधिकार मानते हैं तथा पत्नी परिवार की आर्थिक स्थिति को नजरअंदाज करके अपनी मनमानी करते हैं।
लघुकथा का अंत सकारात्मक और संदेशप्रद है। लघुकथा “गोश्त की गंध” इन सामाजिक रूढियों के अंधकार में एक प्रकाश पुँज के समान है।जो बदलाव की ओर इंगित करती है।और अब इन रूढियों को समाज से तिरोहित हो जाना चाहिए, का पुरजोर समर्थन करती है।और निसंदेह समर्थन ही नहीं करती बल्कि बदलाव की दिशा में कार्य भी किया हैं।
लघुकथा का शीर्षक उपयुक्त और सार्थक है।शीर्षक पढते ही कौतुहल जगाने के साथ, लघुकथा पढने को विवश करता है।
मेरी दृष्टि में “गोश्त की गंध” का सकारात्मक,संदेशप्रद और लघुकथा के मानकों पर खरी उतरती रचना है।जो अपने अनोखे कथ्य, शिल्प और बिम्ब के कारण भीड़ से अलग दिखाई देती है। और मन मस्तिष्क में अमिट छाप छोड़ती है.
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नवजन्मा हिमांशु जी की निश्चय ही कालजयी रचनाओं में से एक है, जो लघुकथा के फलक पर प्रतिनिधि लघुकथाओं के बीच ध्रुव तारे की तरह प्रकाशमान है। ये अपने रचना काल से लेकर अभी तक सतत प्रासांगिक महसूस होती है। हालाँकि नवजन्मा जैसी लघुकथाओं ने कहीं न कहीं समाज की सोच को काफी हद तक बदलने में महती भूमिका निभाई है। फिर भी अभी पूर्ण सफलता नहीं मिली है। हाँ शहरों में स्थिति में काफी सुधार हुआ है, और यहाँ पर काफी हद तक बेटा- बेटी में अंतर करना कम हुआ है। अब यहाँ लोग बेटी को भी उतना ही प्यार और महत्त्व देते हैं, जितना बेटों को; पर गाँवों और पिछड़े इलाकों में अभी भी स्थिति चिंतनीय है। यहाँ पर लोग अभी भी बेटे के जन्म लेने पर उत्सव तथा बेटी के जन्म को मातम की तरह मनाते हैं।
लघुकथा नवजन्मा एक आम परिवार की आम कथा होकर भी खास बन पड़ी है। जहाँ परिवार में बच्चे के आने का बड़ी बेसब्री से इंतजार किया जा रहा है और बेटी होने की खबर सभी को निराश के साथ दुखी भी कर जाती है। लेखक ने बखूबी से बेटी होने के बाद उत्पन्न होने वाली परिस्थितियों का सजीव चित्रण किया है। साथ ही लेखक ने बड़ी कुशलता से एक पिता की उच्च सोच के साथ किए गए कर्म से उसे आम पिताओं से अलगकर सशक्त पक्ष को पाठक के सामने रखकर अपनी सकारात्मक सोच को खुशबू की तरह बिखेर दिया है। साथ ही लघुकथा के माध्यम से कथाकार ने कथित आधुनिक और प्रगतिशील सोच का मुखौटा लगाए समाज के दोगले चेहरे को बड़ी शालीनता के साथ बेनकाब किया है। आज जहाँ हम एक ओर चाँद और मंगल पर जाने की बातें करते हैं, तो वहीं दूसरी और अभी भी बेटा और बेटी में फर्क करते हैं। जैसे ही पता चलता है कि पैदा होने वाला बच्चा लड़की है, तो घर में खुशी की जगह मातम छा जाता है। और घर के बड़ी बुजुर्ग ही जो अपने वंश के कुलदीपक के नाम पर बेटे को प्राथमिकता और बेटियों को पराया धन कहकर उनको महत्त्वहीन समझती है। बेटी होने की खबर को मातम की तरह सुनाती है। कहीं न कहीं कहा जाता है कि ‘औरत ही औरत की दुश्मन होती है’ इस कथा में ‘दादी’ और ‘फूलमती बहन’ के कथनों इस बात का समर्थन करतीं प्रतीत हो रही है।
कथा नायक जिलेसिंह के काम से थके -हारे घर आने पर घर में पसरे सन्नाटे को देखकर नायक के साथ पाठक का मन कौतूहल से भर जाता है। और दादी की अफसोस जनक बातें, कथा नायक को आक्रोशित करती हैं, कथा नायक के साथ- साथ पढ़ने वाला पाठक भी कहीं न कहीं स्वयं को इससे जुड़ा हुआ महसूस करने लगता है। और वह भी पाठक न होकर कथा का हिस्सा बनकर साथ हो लेता है।आगे बहिन फूलमती की व्यंग्यात्मक उलाहने ने नायक को और अधिक आक्रोशित करने के लिए आग में घी का काम करता है। जो पाठक भी नायक की तरह बड़ी शिद्दत से महसूस करता है| और ‘उसके माथे पर लकीर खींच गई’। पर लकीर संकेत है चिंता का।
यहाँ लेखक की कम में ज्यादा कहने की कुशलता स्पष्ट दिखती है। जिसमें माँ कुछ नहीं बोलती अर्थात उसकी चुप्पी बोलने से भी अधिक प्रभावी है| दादी और बहन फूलमती ने तो अपने मन की भड़ास कहकर निकाल दी, पर माँ का चुप रहना कुछ न कहना ममता की झलक दिखाता है। जो अपने बेटे को किसी भी परिस्थिति में परेशान नहीं देखना चाहती। हाँ बेटी होने की शिकायत तो उसे भी है, क्योंकि अपने बेटे को भविष्य में उन्हीं विपदाओं से घिरते नहीं देखना चाहती, जो एक आम पिता अपनी बेटी के लिए वर ढूंढने और उसके ससुराल वालों के मान सम्मान में सारी उम्र अपने स्वाभिमान तक को ताक पर रख देता है। अपने परिजनों की नकारात्मक बातें सुनकर नायक का चिंता ग्रस्त होने के साथ आक्रोशित होना लाजमी है।आखिर व्यक्ति अपनों के नजरिए से ही तो बहुत कुछ सोचता महसूस करता है। गुस्से और तेज कदमों से मनदीप के कमरे में जाना पाठक के दिल की धड़कनों को दुगना कर देता है। मन न जाने कैसे हिंडोले पर सवार हो जाता है। पता नहीं आगे क्या होगा? क्या नायक बच्ची को हिकारत से देखेगा? या पत्नी को क्रोध भरी नजरों से देखेगा? अभी नायक के साथ- साथ चलता पाठक अभी यह सोचता रहता है|और जहाँ पत्नी पहले से ही बाहर चल रही बातों को सुनते हुए अपराध बोध से ऐसे ग्रस्त हो ऐसे बैठी है, मानो उसने बेटी पैदा करके अपराध ही नहीं बल्कि घोर पाप किया हो, जिसकी उसे कतई माफी नहीं मिल सकती| इसलिए वह पति से नजरें मिलाने तक की हिम्मत नहीं जुटा पाती। यहाँ पर एक पत्नी ही नहीं एक माँ की भी हार नजर आती है, जो कहीं न कहीं पाठक के दिल को चुभ जाती है। यहाँ पति-पत्नी के मध्य कोई वार्तालाप नहीं होता, पर आँसुओ से डबडबाई आंखें बहुत कुछ कहती हैं, जो वहाँ उपस्थित पाठक कीआँखों को भी नम कर देता है।आँखें चुराकर अपना मुँह अपराधबोध से दूसरी ओर घुमा लेना, यहाँ लेखक की लेखन कौशल की परिपक्वता साफ परिलक्षित होती है कि जहाँ कहने शब्द खत्म हो जाए वहाँ आंसू वह बात कह देते हैं जो कहना मुश्किल हो जाता है।
चलती परिस्थितियों के बीच नायक का लंबे डग भरकर घर से जाना पाठक के मन को कहीं अधिक उद्वेलित कर जाता है। पाठक शंका- कुशंका के भंवर में डूबता उतराता, विचार शून्य सा होकर वहीं ठहर जाता है।
जिलेसिंह के घर से बाहर जाने और वापस आने का अंतराल, किसी गहरी खाई से भी लंबा प्रतीत होता है जिसमें पाठक छटपटाकर सा रह जाता है। ऐसी लंबी सुरंग में फसा होता महसूस करता है, जहाँ सांस लेना मुश्किल हो रहा है। अभी पाठक कुछ सोचने समझने की स्थिति में भी नहीं आ पाता कि जिलेसिंह अपने साथ ढोलकिए संतु को लेकर घर में दाखिल होता है| जिसे देखकर पाठक मन असमंजस से भर उठता है।|और जिले सिंह का भारी आवाज में ढोल बजाने को कहना, आखिर पाठक के मन पर छाए कुहासे को पल भर में दूर कर देता है।और वह रेगिस्तान की गर्मी में प्यास से व्याकुल मन को अचानक शीतल जल का झरना मिल जाने जैसा महसूस करता है| साथ ही
जिले सिंह के प्रति एक शाबाशी का भाव मन में भर जाता है।और जब वह अपनी तुर्रेदार पगड़ी जो शादी- विवाह अथवा बैसाखी जैसे उत्सव पर पहनता था, पहनना इस ओर संकेत देता है कि उसके घर में बेटी पैदा होना उसके लिए किसी उत्सव से कम नहीं है।इससे पाठक के मन में उसके प्रति शाबाशी के साथ आदर और प्रेम भी उमड़ पड़ता है।उसका खुश होकर सभी के सामने नाचना उन्हें भी सोचने पर मजबूर करता है|कि अब वक्त बदलाव का है।
अपनी नवजात बेटी की सौ रुपए से नजर उतारकर उसकी अधखुली आँखों को हल्के से छूना मानो कह रहा है, बेटी तुम चिंता मत करो,मैं तुम्हारा पिता तुम्हारे आने से बहुत खुश हूँ, तुम कुलदीपक न सही कोई बात नहीं, तुम मेरी बैशाखी हो, कुलदीपक तो केवल एक घर को खुशी देता है, पर बैशाखी तो पूरे देश को खुशियों से भर देता है। ये देखकर अपराध बोध से ग्रसित पत्नी के साथ एक माँ भी जी उठती है, और वह खुशी के उमडे़आँसुओ को रोकती नहीं,बल्कि निर्बाध बह जाने देती।
और अंत में संतु ढोलकिया को अपनी उम्मीद से कहीं अधिक नेग पाना संतुष्टि के साथ जोश से भर जाता है।और वह बड़े उत्साह और उन्माद से ढोल बजाना शुरू कर देता है| मातम के माहौल को खुशी में बदलने ढोल भी झूम कर बज उठता है। ढोल के बजने की ध्वनि को शब्दों ( तिड़ तिड़ तिड़ तिड़म धुम्म…..)में पिरो कर मानो लेखक ने उसे जीवंत ही कर दिया| पढ़कर पाठक खुशी से सराबोर उसकीआंखों में आँसू कब निकल आए समझ नहीं पाता है।
सच में कथा का नकारात्मक से शुरुआत होकर पाठक मन के हिंडोले को कभी ऊपर तो कभी नहीं चलाते हुए सकारात्मक अंत पर लाकर छोड़ना अत्यंत प्रभावकारी एवं प्रशंसनीय है।
लघुकथा में लेखक ने किसी सीधे उपदेश नहीं दिया है बल्कि विपरीत परिस्थितियों में भी पिता के सकारात्मक निर्णय को पाठक को भी खुले दिल से स्वीकार करने मजबूर किया है। पर लघुकथा के अंत में स्त्रीयों का बेटी को लेकर दृष्टिकोण पर लेखक का मौन कुछ खलता सा है।
शिल्प की भी दृष्टि से लघुकथा रोचक बन पड़ी है। यहाँ क्षेत्रीय भाषा के शब्दों के प्रयोग ( जिल्ले! तेरा तो इभी से सिर बंध ग्यो रे|)से लघुकथा यथार्थ के धरातल पर मजबूती से खड़ी करती है। चुस्त कथानक, भाषा शैली, शिल्प और कथ्य सभी लघुकथा में अपने उच्चतम स्तर पर हैं।
लघुकथा का शीर्षक नवजन्मा भी पहली नजर में पढने पर कौतुहल जगाने वाला और कथा के साथ पूर्ण न्याय करता प्रतीत होता है।यहाँ नवजन्मा का अर्थ एक नवजात बच्चे को कहा है। पर अगर इसके गहराई से देखा जाए तो एक पिता को भी कहा है। क्योंकि जिस पल एक बच्चे का जन्म होता है, उसी समय एक पिता भी जन्म लेता है। अर्थात एक पुरुष पिता बन जाता है| जो हर परिस्थिति में अपने बच्चे के साथ मजबूती से खड़ा है।
जिलेसिंह जैसे पिता का साथ पाकर ही आज बेटियाँ खुले आसमान में उडकर अपने सपनों को पूरा ही नहीं कर रहीं हैं बल्कि देश का नाम भी रौशन कर रहीं हैं।
सुन्दर, सशक्त, सकारात्मक, और समाज में व्याप्त कुरूतियों को बदलने के लिए प्रेरित करती लघुकथा के लिए हिमांशु जी का साधुवाद।
नवजन्मा / रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
जिलेसिंह शहर से वापस आया तो आँगन में पैर रखते ही उसे अजीब-सा सन्नाटा पसरा हुआ लगा।
दादी ने ऐनक नाक पर ठीक से रखते हुई उदासी-भरी आवाज़ में कहा-‘जिल्ले! तेरा तो इभी से सिर बँध ग्या रे। छोरी हुई है!’
जिलेसिंह के माथे पर एक लकीर खिंच गई.
‘भाई लड़का होता तो ज़्यादा नेग मिलता। मेरा भी नेग मारा गया’-बहन फूलमती ने मुँह बनाया-‘पहला जापा था। सोचा था-खूब मिलेगा।’
जिले सिंह का चेहरा तन गया। माथे पर दूसरी लकीर भी उभर आई.
माँ कुछ नहीं बोली। उसकी चुप्पी और अधिक बोल रही थी। जैसे कह रही हो-जूतियाँ घिस जाएँगी ढंग का लड़का ढूँढ़ने में। पता नहीं किस निकम्मे के पैरों में पगड़ी रखनी पड़ जाए.
तमतमाया जिलेसिंह मनदीप के कमरे में घुसा। बाहर की आवाज़ें वहाँ पहले ही पहुँच चुकी थीं। नवजात कन्या की आँखें मुँदी हुई थीं। पति को सामने देखकर मनदीप ने डबडबाई आँखें पोंछते हुए आना अपना मुँह अपराध भाव से दूसरी ओर घुमा लिया।
जिलेसिंह तीर की तरह लौटा और लम्बे-लम्बे डग भरता हुआ चौपाल वाली गली की ओर मुड़ गया।
‘सुबह का गया अभी शहर से आया था। तुम दोनों को क्या ज़रूरत थी इस तरह बोलने?’ माँ भुनभनाई. घर में और भी गहरी चुप्पी छा गई.
कुछ ही देर में जिलेसिंह लौट आया। उसके पीछे-पीछे सन्तु ढोलिया गले में ढोल लटकाए आँगन के बीचों-बीच आ खड़ा हुआ।
‘बजाओ!’ जिलेसिंह की भारी भरकम आवाज़ गूँजी.
तिड़क-तिड़-तिड़-तिड़ धुम्म, तिड़क धुम्म्म! ढोल बजा।
मुहल्ले वाले एक साथ चौंक पड़े। जिलेसिंह ने अल्मारी से अपनी तुर्रेदार पगड़ी निकाली; जिसे वह-वह शादी-ब्याह या बैसाखी जैसे मौके पर ही बाँधता था। ढोल की गिड़गिड़ी पर उसने पूरे जोश से नाचते हुए आँगन के तीन-चार चक्कर काटे। जेब से सौ का नोट निकाला और मनदीप के कमरे में जाकर नवजात के ऊपर वार-फेर की और उसकी अधमुँदी आँखों को हलके-से छुआ। पति के चेहरे पर नज़र पड़ते ही मनदीप की आँखों के सामने जैसे उजाले का सैलाब उमड़ पड़ा हो। उसने छलकते आँसुओं को इस बार नहीं पोंछा।
बाहर आकर जिलेसिंह ने वह नोट सन्तु ढोलिया को थमा दिया।
सन्तु और ज़ोर से ढोल बजाने लगा-तिड़-तिड़-तिड़ तिड़क-धुम्म, तिड़क धुम्म्म! तिड़क धुम्म्म! तिड़क धुम्म्म!
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