बिजली की लाइन में कोई बड़ा फॉल्ट आ जाने के कारण तीन दिन के लिए उस कॉलोनी की बिजली गुल हो गई । शाम होने के साथ घर का इन्वर्टर भी जवाब दे गया । दिन ढ़लने लगा । अँधेरा होने पर उसके कमरे में मोमबत्ती जलानी पड़ेगी, मानों इस बात से किसी का कोई वास्ता ही न हो ।
शाम के सात बजने वाले थे । वह बैड पर लेटा हुआ था । उसने नोट किया कि धीरे-धीरे रोशनी लुप्त होती जा रही थी और अंधेरा होना शुरु हो गया था । जैसे-जैसे अंधेरा बढ़ने लगा, उसकी घबराहट भी बढ़ने लगी । वह समझ नहीं पा रहा था कि इस अंधकार को कैसे खत्म करे? निराशा बढ़ती ही जा रही थी, कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था ।
सुबह के साढ़े चार बजने को आए तो उसे अच्छा लगा कि अंधेरा स्वतः जा रहा था और धीरे-धीरे रोशनी बढ़ने की ओर अग्रसर थी । छह, सात बजते-बजते पूरी रोशनी आ गई । अब वह बहुत खुश था । रोशनी थी और वह था ।
लेकिन अगले दिन शाम की ढ़लान के साथ फिर अंधेरा शुरु । लेकिन अब वह समझ चुका था कि इस अंधेरे से डरने की ज़रूरत नहीं है । जैसे पूरा समय रोशनी नहीं रही, वैसे ही यह अंधेरा भी नहीं रहेगा । फिर रोशनी आ जाएगी ।
अगली सुबह फिर रोशनी आ गई । वह बहुत खुश था कि मानों उसे जीवन के किसी बहुत बड़े रहस्य का पता चल गया हो । तभी उसे ड्यूटी के लिए उसके घर पहुंची नर्स की तेज़ आवाज़ सुनाई दी- “तुरन्त डॉक्टर को फोन करो, प्लीज़ । उसे बोलो यहां घर में जो पेशेंट कोमा में चला गया था, वह हिलडुल रहा है । लगता है वह कोमा से बाहर आ गया है….”
– म.नं.142, पार्ट छह, सेक्टर पाँच, गुरुग्राम (हरियाणा)-122001