धोबी, पॉलीथिन की थैली में, कोयला लेकर अपने घर के भीतर घुसा, धोबी की बच्ची ने, कोयले को सिंघाड़ा समझा। बच्ची कूदने लगी-ताली बजा-बजाकर कि बाबू सिंघाड़ा लाए-बाबू सिंघाड़ा लाए-खुश बच्ची की, खुश-खुश उड़ती ताली, ताल की आवाज से, धोबी का घर भर गया।
धोबी पहली बार, पॉलीथिन की थैली में लाया था दो किलो कोयला, वह हमेशा पाँच- दस किलो कोयला, बोरी में भरकर लाता था। पर आज उसके पास, पाँच किलो कोयला खरीदने लायक पैसे नहीं थे तो वह ले आया दो किलो कोयला-पॉलीथिन की पारदर्शिता से कोयले, सिंघाड़े की तरह झाँक रहे थे। जिन्हें सिंघाड़ा समझ,धोबी की बेटी ताली बजा खुश हो, कूद रही थी।
धोबी की, खुश होकर कूदती, बच्ची की तालियों की खुश-आवाज सुन, पहली बार कोयले के भीतर सिंघाड़ा होने की इच्छा जागी। कोयले ने पहली बार, अपने सिंघाड़ा होने की इच्छा से,अपनी राख होने की इच्छा को दबाया।