जून 2026

संचयनलघुकथाएँ     Posted: September 1, 2020

1-बेस्ट फ्रेंड

वो अपनी धुन में वाशरूम जा रहा था कि गर्ल्स वाशरूम की तरफ नज़र उठ ही गई, लगा कोई गेट की आड़ में खड़ा है। तभी सफेद रंग भी दिख गया, तो वो वाशरूम चला गया। लौटते हुए न चाहते हुए भी नज़र फिर उधर गई तो सफेद कपड़ा दिख ही रहा था। ‘कोई इतनी देर से ऐसे  क्यों खड़ा है’ जानते हुए भी कि किसी ने देख लिया तो बहुत डाँट पड़ेगी, फिर भी चला गया।

“अरे ! तुम इतनी देर से यहाँ क्यों खड़ी हो?”

“अच्छा हुआ तू आ गया। सुन ! जा अपने सेक्शन की साक्षी को भेज दें ज़रा।”

” क्यों ?”

“अरे, जा ना, किसी ने देख लिया तो दोनों डाँट खाएँगे।” वो फुसफुसाते हुए बोली।

“नहीं, पहले बताओ…और दोनों हाथ पीछे क्यों किए हुए हो?”

“अरे, कुछ नहीं। तुम नहीं समझोगे। साक्षी को भेज दो जाकर।”

“अरे, बेस्ट फ्रेंड मैं और समझेगी साक्षी। ग्यारहवीं में पढ़ता हूँ, बड़ा हो गया हूँ” कहते हुए उसने झटके से हाथ पकड़कर उसकी पीठ को अपनी तरफ घुमा लिया।

“तू रुक, यहीं रुक” कहकर लगभग दौड़ते हुए वो गया और चार-पाँच मिनट में वापस आया । उसके हाथों में लाया हुआ सामान रखते हुए बोला – अब जल्दी से क्लास में जा। उसने हिचकिचाहट से नज़रें झुका ली।

“झल्ली है तू.. मुझसे नहीं कह सकती थी?” कहकर वो क्लास जाने के लिए मुड़ा तो आवाज आई – मेडिकल इंचार्ज मैम से क्या माँगा?”

“वही, जो मैं लाया हूं।”

“और, मैम ने क्या कहा?” उसने डरते -डरते पूछा।

“मैम थोड़ी देर रुकी, फिर पूछी – किसके लिए? जब मैंने बताया तो सिर पर हाथ फेरते हुए बोली – आई एम प्राउड ऑफ यू ।”

“तुम ना..सच में झल्ले हो..” वो मुस्कुराते हुए बोली।

“और तू मुझसे भी बड़ी…” वो लापरवाही से कहते हुए चला गया।

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2-द्वंद्व

तन – मन की असह्य पीड़ा को समेटे किसी तरह स्कूटी चलाकर घर पहुँची। साड़ी के पल्लू को चादर की तरह लपेट रखा था क्योंकि ब्लाउज के चीथड़े हो चुके थे। कॉलोनी की स्ट्रीट लाइटें बंद थीं, शायद बिजली नहीं थी। मन को थोड़ी राहत मिली कि इस हालत में पड़ोसियों ने नहीं देखा। बच्चे हॉल में टीवी देख रहे थे। चेहरे की हालत देख पूछा – मम्मा..?

“कुछ नहीं, छोटा- सा एक्सीडेंट हो गया था। ठीक हूँ । तुम लोग ऑनलाइन खाना  मँगवा लो ,सबके लिए।”

घड़ी देखी 7:30 हुए थे, इनके आने में एक घंटे का समय है। कमरे में पहुँची तो वेदना चरम पर थी।अपने नुचे हुए शरीर को और नोच रही थी कि उस गंदी छुअन को हटा सके। बाथरूम जाकर शावर के टैप पर हाथ रखा कि रुक गई।

नहीं…नहा नहीं सकती.. सबूत मिट जाएँगे। लेकिन क्या करना सबूत का…!! लोग क्या कहेंगे, इनका ऑफिस, बच्चों का स्कूल…बेटी तो दसवीं में…हे भगवान! सब चिढ़ाएँगे कि इसकी माँ का गैंगरेप……

बिस्तर पर शरीर को निढाल छोड़ दिया तो महसूस हुआ, पोर – पोर रिस रहा है। दोनों पैरों में  लिजलिजापन….उबकाई आने लग गई उसे।

“देखो, चुप मत बैठो और डरो तो बिल्कुल नहीं। तुम्हारा डर अपराधियों के हिम्मत को बढ़ाएगा। कौन क्या कहेगा..सब भूल जाओ” इन परिस्थितियों से गुजरती कुछ पीड़िताओं को कही खुद के ये वाक्य उसके कानों में गूँजने लगे। गैर सरकारी संगठन के लिए काम करते हुए बहुत -सी औरतों को इस परिस्थिति से निकाला है,और शायद उसी के प्रतिशोध के रूप में उसके साथ भी ये….

सोशल मीडिया और अखबार लेखनी के उसके कितनी प्रशंसिका हैं जो कहती हैं – आप हमारी ताकत और उम्मीद की किरण हैं…..आज वो किरण खुद थरथरा रही है।

और बनो क्रांतिकारी…उठाओ क्रांति की मशाल…रहोगी तो औरत ही- सब यही कहेंगे। सिर को दोनों हाथों से घुटनों के बीच रख लिया…आह..!! ये दर्द, जगह – जगह नाखूनों और दाँतों से खरोंचने का… नहीं  सँभाल पाई खुद को। भर-भराकर रो पड़ी, उसी अवस्था में कि कहीं बच्चे ना सुन लें।

आँसुओं ने द्वंद्व को धो दिया। घड़ी में आठ बजकर पचीस मिनट हुए थे।

पीड़ित शरीर पर ताकतवर मन लेकर वो उठी, स्कूटी की चाबी उठाई और निकल गई नजदीकी पुलिस स्टेशन; इससे पहले कि कोई आकर उसके द्वंद्व को और बढ़ा दें।

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2-आफ्टर शेव

चतुर्थवर्गीय कर्मी की नौकरी करते हुए रमाकांत बाबू परिवार की जिम्मेदारियों को निभाते – निभाते साठ की उम्र में सत्तर के दिखने लगे थे। उपलब्धि ये कि बेटी का विवाह अच्छे परिवार में हो चुका था और बेटा सरकारी नौकरी में अधिकारी का पद प्राप्त कर चुका था मलाल ये कि अनुशासनप्रिय होने के कारण पिता पुत्र में संवादहीनता आ गई थी, जो कभी-कभी दोनों को भावहीनता भी लगती। पिता ने यथासंभव पुत्र की पढ़ाई में योगदान दिया था, तो पुत्र ने भी ट्यूशन पढ़ा कर उनकी मदद की थी।

आज बेटे का पहला वेतन आया था। माँ, बहन,बहनोई, भानजी सबके लिए कुछ ना कुछ आया था। पुत्र ने पिता के पाँव छुए पर खामोशी बरकरार रही ।

दूसरे दिन सुबह की सैर के बाद रोज की तरह रमाकांत बाबू ने शेविंग किट निकाला, तो आफ्टर शेव की शीशी देख पहले चौंके फिर भीनी सी मुस्कराहट चेहरे को जवान बनाने लगी। यकायक मन बीस  साल पीछे चला गया था।छह वर्षीय पुत्र की उत्सुकता शांत करने हेतु उसे अपने साइकिल पर बिठाकर कार्यालय दिखाने ले गए थे। बड़े बाबू की मदहोश कर देने वाली खुशबू का राज जब उन्होंने डरते-डरते पूछा, तो उत्तर मिला-क्या करोगे जानकर ? लेने की हैसियत नहीं है तुम्हारी।

खिड़की के पीछे खड़ा पुत्र टुकुर-टुकुर उसे देख रहा था।

आज भी मुस्कुराता हुआ पुत्र , पिता की खुशबूदार मुस्कुराहट को  टुकुर-टुकुर देख रहा था।

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4-ईश्वर की माफी

कैंसर के अंतिम चरण में पहुंच चुके साठ वर्षीय मरीज़ को देखकर उसके हृदय में घमासान मचा हुआ था। मन कहता कि माफ़ कर दो, फिर अचानक ही शरीर पर ढेर सारे कीड़े रेंगने लगते, और कीड़ों को नोंच-नोंचकर हटाते हुए उसे उबकाई आती। फिर भी न कीड़े कम होते, न उबकाई, न ही आँखों के सामने से वो मंजर जाता, जहाँ वो चीखना चाहती है जोर से, खूब जोर से। पर एक मजबूत हाथ उसे ये करने नहीं देते। कभी चाकलेट का लालच, कभी बदनामी का भय दिखाकर वो हाथ हमेशा उस दस साल की मासूम के मुँह पर होता।

माँ कहती – डरती  क्यों हो? ‘काका’ हैं वो तेरे।

आज तीस साल की उम्र में अगर पति भी अचानक से छू दे, तो डर जाती है, जिसने बचपन और तरुणाई दोनों छीन लिये। आज भी सब उसे ‘काका’ लगते हैं, न चाहते हुए भी। फिर भी ‘माफ’ करना चाहती है।

इस अवस्था में जब चिकित्सकों ने घर ले जाने की सलाह दी, तो दोनों अप्रवासी बेटे नौकर और परिचारिका के भरोसे छोड़ फ्लाइट पकड़ी।

जब भी वो उनके कमरे में अकेली होती, दोनों हाथ जुड़े और अश्रुप्रवाह देखती।

माफ करना चाहती थी,पर……..

हाँ वो ये समझ चुकी थी कि वो माफ करे न करे, ईश्वर ने उन्हें माफ नहीं किया।

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5-अनमोल

दस वर्ष पूर्व एक ही पद और कार्यालय से सेवानिवृत्त दोनों मित्र सुबह- शाम की सैर में पार्क में बैठ दुनिया – जहान की बातें करते। राजनीति, फिल्म, साहित्य हर विषय पर चर्चा होती।

शर्माजी के दोनों बेटों में एक विदेश में बस चुका था और दूसरा साथ रहकर भी अलग था। दोतल्ले मकान में नीचे शर्माजी पत्नी के साथ,ऊपर बेटा सपरिवार। मिश्राजी का एकमात्र पुत्र दस वर्ष पूर्व शिकागो में बस गया, दो – तीन साल में एक बार ‘भारत-दर्शन’ को आते।

शर्माजी प्राय: अपने दोनों बेटों की अनदेखी की चर्चा करते,पर मिश्रा जी हमेशा इस मुद्दे पर मौन ही रहते। आज मन नहीं माना तो पूछ ही लिया- तुम्हें अपने बेटे से कोई शिकायत नहीं?

मिश्रा जी मुस्कुराते हुए बोले- मुझे कॉलेज में एक लड़की से इश्क हुआ, उसे प्रेम  पत्र लिखता , फाड़ता। उसे देखने के बहाने  ढूँढा करता। जिस दिन पता चला, वह भी मुझे चाहती है, पागल जैसा हो गया। वैसा एहसास,वो पागलपन फिर किसी के लिए महसूस नहीं किया, शायद पहली बार था, इसीलिए। मुझसे ज्यादा रसूख वाले के लिए उसने मुझे छोड़ा…….’

‘क्या यार तुम भी, क्या पूछा क्या बता रहे हो?’

‘मेरे दिल से कभी उसके लिए बद्दुआ नहीं निकली। क्योंकि उसने जो ‘एहसास’ दिए वो अनमोल है। जब बेटे को पहली बार गोद में लिया था,वो ‘एहसास’ आज भी अनमोल है। उसे गोद में लेते ही मैं जिम्मेदार पिता के साथ जिम्मेदार बेटा भी बन गया था। इतनी खुशियाँ और एहसास जो मेरे बेटे ने जीवन में आकर दिया है, वो अनमोल है।’

-0-भारती कुमारी,गुरुग्राम,सम्पर्क सूत्र – 8447118646

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