मैंने नब्बे के दशक में लघुकथाएँ पढ़नी शुरु कीं। उन दिनों दैनिक ट्रिब्यून, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, अमर उजाला, अजीत समाचार के रविवारीय संस्करणों में लघुकथाएँ छपा करती थीं।… तब हर रविवार मैं सारे अखबार खरीद लाया करता था।
पढ़ाई समाप्त होने के बाद कुछ साल गुजरात में बिताए। वहाँ बड़ौदा रेलवे स्टेशन पर हंस, कथादेश सरीखी पत्रिकाओं से साक्षात्कार हुआ। उनमें भी लघुकथाएँ छपती थीं, जिन्हें मैं बड़े चाव से पढ़ने लगा था।… बाद में जब हरियाणा ही मेरी कर्मभूमि बना, पत्र-पत्रिकाओं से यह लगाव बराबर बना रहा। …इस लम्बे सफ़र में जिन लघुकथाओं ने मेरे मन-मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव छोड़ा, जो मुझे देर तक याद रहीं। देर तक क्या बल्कि आज भी याद हैं। उनमें से कुछ इस प्रकार से हैं। बावली बूच, पंख (श्री रामकुमार आत्रेय), कथा नहीं, उसकी दुविधा (श्री पृथ्वीराज अरोड़ा), ईश्वर, बेटी का खत (श्री सुकेश साहनी),रिश्ता (श्री अशोक भाटिया), गुड़िया (श्री सुभाष नीरव), माँ (श्री सूर्यकांत नागर), जगत्-पिता (बलराम अग्रवाल), मौन (श्री अमृतलाल मदान), जगमगाहट (श्री रुप देव गुण), नयी औरत, बोझ (श्रीमती उर्मिकृष्ण) परायी, फ़र्क (श्री विकेश निझावन), साहब (प्रद्युम्न भल्ला) आदि-आदि।
इसके पश्चात मेरे जीवन में श्री रामकुमार आत्रेय जी का पदार्पण हुआ। उन्होंने मुझे अपनी लघुकथाओं की पुस्तक पढ़ने को दी-‘इक्कीस जूते’। तब मैं उनके लेखन से बेहद प्रभावित हुआ। कुछ समय पश्चात एक दिन वह मुझे एक कागज देकर बोले, ‘‘अच्छा … ले … अब अपनी लघुकथा पढ़! उनके मुख से ‘‘मेरी लघुकथा” सुनकर मैं अन्दर तक काँप गया था। यह मेरे अन्दर का चोर था अथवा मेरे अन्दर की नकारात्मकता थी कि मैं बेहद डर गया था। मैं यह सोचकर डर गया था कि उनकी तीसरी आँख ने मेरी जरुर कोई न कोई गलत बात पकड़ ली है। डरते-डरते मैने वह लघुकथा पढ़ी। उस लघुकथा का शीर्षक था – ‘एक करोड़ तिहत्तर लाख’ । उस लघुकथा में जो इंजीनियर मित्र है वह ख़ाक़सार मैं ही हूँ।
उस दिन मुझे एहसास हुआ था कि जब हम बातों के उथले समुद्र में ही गोते लगाते रहते हैं तब वह उनमें गहरे डूबकर कथा के मोती ढूँढ़ लाते हैं।
मुझे रामकुमार आत्रेय जी की जो लघुकथाएँ बेहद पसन्द हैं उनके शीर्षक इस प्रकार से हैं- बावली बूच, पंख, इक्कीस जूते, बूढ़ी लड़की, हथियार, जल्लाद, और कौवा रो पड़ा, टूटी चूड़ियां, बिन शीशों का चश्मा, एकलव्य की विडंबना, पिता जी सीरियस हैं आदि-आदि।
इस कॉलम के अन्तर्गत मैं आत्रेय जी की और कौवा रो पड़ा’ का जिक्र करना चाहूँगा।
मेरी पसन्द की उनकी लघुकथा है – और कौवा रो पड़ा। यह लघुकथा एक हरियाणवी लोककथा पर आधारित है। अपने शिल्प एवं कथ्य की वजह से यह कमाल की लघुकथा है। गाँव में एक बदमाश प्रवृत्ति का व्यक्ति है। वह दूसरे की औरत पर अपनी नज़र रखता है। अपनी दबंगई से वह दूसरे की औरत को अपनी पत्नी बना लेता है तथा पंचायत को रिश्वत (शराब पिलाकर) देकर अपने पक्ष में फैसला भी करवा लेता है। लघुकथा की समाप्ति पर वह बदमाश व्यक्ति जोर-जोर से रो पड़ता है। पंचायत के सदस्य हैरानी से पूछते हैं कि अब तो तुम्हारे पक्ष में फैसला आ गया है, अब क्यों रोते हो ..? तब वह व्यक्ति क्या जवाब देता है । हरियाणवी लोगों की एक पहचान होती है कि वे हास्य में बात करते हैं और सामने वाले के मुँह पर सच्ची और कड़वी बात भी बिना किसी लाग-लपेट के कह डालते हैं। लघुकथा में बदमाश व्यक्ति का अन्तिम कथन भी बिना लाग-लपेट के बोला गया एक कड़वा सत्य है। लघुकथा समाप्त होते ही पाठक सोचने पर मजबूर हो जाता है कि एक बदमाश व्यक्ति जिसने सब कुछ खरीदकर अपने पक्ष में कर लिया है …वह व्यक्ति आखिर इतना कड़वा सत्य कैसे कह सकता है? …जो रचना समाप्त होकर भी पाठक को देर तक सोचने पर मजबूर कर दे यही तो एक रचना की सफलता है!
मेरी पसन्द की दूसरी लघुकथा जो मैं यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ उसके लेखक हैं श्री उर्मिल कुमार थपलियाल। लघुकथा का शीर्षक है – ‘‘गेट मीटिंग ”
यह लघुकथा जब पहली बार पढ़ी थी तो अन्तर को एक तीर की तरह से कुछ बींध गया था।
मजदूरों की दशा को ब्यान करती है यह लघुकथा। मजदूर आठ-दस घण्टे फैक्टरी में हाड़-तोड़ मेहनत करने के पश्चात भी शिथिल, क्लांत और बासी-तिबासी ही नजर आता है। फैक्टरी की प्रोडक्शन में, उसकी तरक्की में मजदूर अपने खून-पसीने को एक कर देता है पर उसकी रोटी-कपड़ा और मकान जैसी बुनियादी जरूरतें फिर भी अधूरी रह जाती हैं।
इस लघुकथा में कम से कम शब्दों का खूबसूरती से इस्तेमाल किया गया है। जरूरत के मुताबिक प्रश्नोत्तर शैली में किये गये संवाद कथा को आगे बढ़ाते है तथा लघुकथा के तीखे तेवर को बरकरार रखते हैं। इस लघुकथा में एक मजदूर की मनोदशा के साथ-साथ यूनियन के नेता के क्रांतिकारी नज़रिये को प्रस्तुत करने में लेखक खूब सफल रहा है।
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और कौवा रो पड़ा
रामकुमार आत्रेय
हंस और हंसिनी यात्रा पर थे। बीच राह में रात हो गई। वे दोनों एक कौवे के यहाँ रुक गए। हंसिनी बहुत सुन्दर थी। कौवा उसे पाने के लिए ललचा उठा। वह स्वभाव से ही बदमाश था। उन दिनों उसकी पत्नी अपने मायके गई हुई थी। उसने मन ही मन एक षड्यंत्र रच डाला। सुबह होते ही हंस जब यात्रा पर आगे जाने के लिए तैयार हुआ तो उसने कौवे से निवेदन किया कि वह उसकी पत्नी को भीतर से बुला दे। कौवे ने कू्ररतापूर्वक उत्तर दिया कि हँसिनी तो उसकी पत्नी है। इसलिए यदि हंस को आगे यात्रा पर जाना है तो मजे़ से चला जाए। कौवे ने भीतर की कोठरी की साँकल लगाकर उस पर ताला ठोंक दिया था।
हंस बहुत दुखी हुआ। वह तुरंत गाँव की पंचायत के सदस्यों के यहाँ गया। उसने उनसे प्रार्थना की कि वे कौवे से उसकी पत्नी को दिलवा दें। उसे पूरा विश्वास था कि पंचायत उसके साथ पूरा न्याय करेगी। क्योंकि पंचों में परमेश्वर का वास होता है।
पंच एकत्र हुए। हंस ने अपना पक्ष रखा। उसने तर्क दिया कि हंसिनी उसकी पत्नी है। कौवा तो बदसूरत और काला है। जबकि हँसिनी खूब गोरी और सुंदर है। उसकी जोड़ी हंस के साथ बनती है। पंचायत चाहे तो हँसिनी को बुलाकर पूछ ले कि हँसिनी किसकी पत्नी है? कौवे की पोल अपने आप खुल जाएगी। इस संबंध में जब कौवे से पूछा गया तो उसने कहा कि हंसिनी उसकी पत्नी है और दो साल से वे दोनों पति-पत्नी के रुप में साथ रह रहे हैं। रही बात हँसिनी से पूछताछ की, तो पंचायत को मालूम ही है कि इज्जतदार घरों की औरतें अदालतें और पंचायतों के चक्कर नहीं काटा करतीं।
पंचायत सदस्यों ने थोड़ी देर विचार-विमर्श करके अपना फै़सला सुनाया कि हँसिनी हंस की नहीं; बल्कि कौवे की पत्नी है। सदस्यों का कहना था कि स्वयं उन्होंने दो वर्ष से कौवे और हँसिनी को एक साथ रहते देखा है। उसे धमकाया गया कि यदि वह वहाँ से चुपचाप नहीं गया, तो उसकी पिटाई करके उसे वहाँ से खदेड़ दिया जाएगा। हंस को वहाँ से चुपचाप चले जाने का आदेश सुना दिया गया।
कौवे और हँसिनी की जोड़ी न मिलने की बात पर पंचायत का कहना था कि इस दुनिया में सही जोड़ी तो किसी की भी नहीं मिलती। पति खूबसूरत होगा तो पत्नी बदसूरत और यदि पति बदसूरत हुआ तो पत्नी निश्चय ही खूबसूरत होगी।
हंस को मालूम ही नहीं था कि कौवा तो रात में ही पंचायत के प्रत्येक सदस्य के यहाँ एक-एक बोतल अंग्रेजी शराब की पहुँचा आया था।
हंस के वहाँ से चले जाने के बाद कौवा अचानक ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा।
उसको रोता देखकर पंचायत के सदस्य आश्चर्यचकित हो उठे। उनमें से एक ने कौवे से पूछा,‘‘अरे भाई, अब तो तुम्हारे हक़ में फ़ैसला हो चुका है। अब तुम क्यों रोने लगे?’’
‘‘श्रीमान जी, जब आप जैसे पंचायत के सदस्य मर जाएँगे, तो ऐसा फ़ैसला कौन करेगा!’’ कौवे ने रोते-रोते कहा।
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गेट मीटिंग
उर्मिल कुमार थपलियाल
हमेशा की तरह की गेटमीटिंग थी। बैठे हुए मजदूरों के चेहरे पर एक औपचारिकता थी। शिथिल, क्लांत और बासी-तिबासी। आज बाहर से यूनियन के एक जुझारू नेता आने वाले थे। वे आए। चेहरे पर ही क्रांति की चमक थी। मजदूरों ने तालियों से उनका स्वागत किया। मजदूरों की दशा देखकर वे पहले द्रवित और फिर क्रोध में हो गए। लम्बा-चौड़ा भाषण न देकर वे सीधे प्वाइंट पर आ गए।
उन्होंने चीखकर पूछा-क्या तुम्हारे घर में राशन है?
सभी मजदूर मायूसी में बोले – नहीं।
नेता- रहने को घर है?
सब- नहीं।
नेता- पहनने को कपड़ा है?
सब- नहीं
नेता- कुछ पैसा-वैसा है?
सब- नहीं
नेता- तुम्हारे पास माचिस है?
सब- हाँ, है।
नेता-तो जला क्यूँ नहीं डालते इस व्यवस्था को। अभी इसी वक्त।
सब-माचिस में तीलियाँ नहीं हैं।
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