(अनुवाद : उदय प्रकाश)
वह व्यक्ति जल्दी ही बिस्तर पर चला जाता है। लेकिन उसे नींद नहीं आती है। वह बिस्तर पर करवटें बदलता रहता है। ऐसा ही होता है। वह चादर को निचोड़ता है।
वह एक सिगार जला लेता है। वह थोड़ा-बहुत पढ़ता है। वह बिजली बुझा देता है। लेकिन नींद नहीं आ पाती है। देखते-देखते तीन बजने लगते हैं। वह उठ बैठता है।
वह पड़ोस में ही रहने वाले अपने एक दोस्त को जगाता है और उसे विश्वास में लेकर बतलाता है कि वह सो नहीं पा रहा है। वह उसकी सलाह माँगता है।
उसका दोस्त उसे थोड़ी दूर तक टहलने की सलाह देता है, तब तक, जब तक वह थक न जाए।
इसके बाद एक हल्की चाय का कप पीकर बिजली बुझाकर लेट जाने का सुझाव देता है। वह इस सलाह पर पूरा अमल करता है।
लेकिन उसे नींद तब भी नहीं आ पाती। वह फिर से उठ बैठता है।
इस बार एक डॉक्टर के पास जाता है। जैसा कि होता है-अपनी दवाई के बारे में डॉक्टर से लंबी-चौड़ी बातें करता है, लेकिन वह व्यक्ति उसके इलाज से भी सो नहीं पाता है। अब सुबह के छह बज चुके हैं।
वह पिस्तौल में गोली भरता है और अपने को उड़ा देता है। वह व्यक्ति तो मर गया है लेकिन वह अभी तक सो नहीं पाया है। अनिद्रा रोग सचमुच एक अमर रोग है।
( देश-विदेश की कथाएँ : सम्पादक-अशोक भाटिया से साभार )