1-आज़ादी
शताब्दियों के इंतज़ार और असंख्य माँओं की गोद सूनी होने, अनगिनत सुहागिनों से इंद्रधनुष रूठने और न जाने कितने बिना ईद के रोज़ों के बाद, अंतत: ‘वह’ आ ही गई। भाद्रपद की कृष्ण पक्ष की अँधेरी रात में ‘उसके’ स्वागत में मानो शशि-रवि स्वयं ज़मीन पर उतर आए थे। शुभ्र वस्त्रधारी, जिनके चमचमाते जूतों पर शायद ही कभी मिट्टी का कण लगा था, वे ढोल-ताशों की आकाश छूती आवाज़ों के साथ ‘उसे’ पालकी में बिठाकर जुलूस की शक्ल में झूमते-नाचते ज्यों ही चौराहे तक पहुँचे तो अनायास ‘उसकी’ नज़र बाईं तरफ़ गई। गहन अंधकार में अनंतकाल से बाट जोह रही असंख्य सूखी आँखों के आशाओं के दीपकों में दीवाली ही हो गई। ‘उसने’ स्निग्ध दृष्टि से उन लोगों की ओर देखा और पालकी से उतरकर कीचड़- सने ध्वान्त मार्ग की तरफ़ जैसे ही क़दम बढ़ाया तो ढोल-ताशों की आवाज़ एकदम बंद हो गई। वातावरण में एक खौफ़नाक-सी नीरवता पसर गई।
“यह क्या? आप किधर जा रही हो?” एक शुभ्र वस्त्रधारी के माथे पर सिलवटें उभरी।
“किधर…? भई, जिन लोगों ने सदियों से तप किया, जिनके असीम तप में तपकर मैं यहाँ आई। अपने उन्हीं चाहनेवालों के बीच जा रही हूँ।” ‘वह’ हर्षमिश्रित पर दृढ़ स्वर में बोली।
‘उसके’ इरादे भाँपकर, करबद्ध बुज़ुर्ग सफ़ेदपोश आगे बढ़ा और अंधकार में खड़े लोगों को संबोधित करते हुए विनम्र स्वर बोला, “भाइयो और बहनों! आज का शुभ दिन आप लोगों की कुर्बानियों का ही फल है और इसपर आप लोगों का ही अधिकार है। परन्तु मेरा एक निवेदन है….।”
वह गला खँखारते पुन: बोला, “यह आज ही आईं हैं। आप लोग तो जानते ही हो कि आपकी तरफ़ अँधेरा बहुत घना है। आज रात हमें इनकी सेवा का अवसर प्रदान करें। दो पहर की ही तो बात है, सुबह जैसे ही रोशनी की पहली किरण फूटेगी हम स्वयं इन्हें आप लोगों को सौंप जाएँगे। तब तक आप इनके स्वागत की तैयारियाँ करें।”
उन लोगों ने सहमति में सिर हिलाया और आशा भरे नयनों से ‘उसकी’ ओर देखा। उनकी आँखों में मूक सहमति को पढ़कर वह अनमने पालकी की तरफ़ बढ़ने लगी। सफ़ेदपोश के माथे की सिलवटें सपाट हो गई और होंठों पर कुटिल मुस्कान फैल गई। उसने अपने शुभ्र वस्त्रधारी साथियों को संकेत किया…. ढोल-ताशे मदमस्त हाथियों की तरह चिंघाड़ने लगे। ‘उसके’ पुन: पालकी में बैठते ही शुभ्र वस्त्रधारी, उज्ज्वल पक्की सड़क के रास्ते रौशन इमारतों की तरफ़ बढ़ गए।
… और वह सभी लोग आज भी अँधेरा मिटने और रोशनी होने का इंतज़ार ही कर रहे हैं।
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2-डूबा तारा
“ओ मौंटी! अब आ भी जा बाहर, मुझे भी नहाना है।” बाबूजी बाथरूम की ओर देखते हुए चिल्लाकर बोले।
“देख लो अपने लाड़ले को! रिसेप्शन पर साथ जाने से साफ़ इनकार कर दिया”,सब्ज़ी काटती हुई पत्नी को कहा
“नहा लेने दो उसे, अभी साढ़े छह ही तो बजे हैं। रिसेप्शन का टाइम तो वैसे भी आठ बजे का है न।” पत्नी थोड़ी रूखे स्वर में बोली!
“मैं तो कहता हूँ कि तू ही चल मेरे साथ। कोई ज़्यादा टाइम तो लगेगा नहीं, बस शगुन पकड़ाकर वापस आ जाएँगे।”
“देखो। मैं नहीं जाने की वहाँ। किसी भी ब्याह-शादी में जाओ वहाँ बड़ी-बूढ़ी औरतें घेर कर बस यही पूछने बैठ जाती है कि बिट्टो की बातचीत चलाई कहीं कि नहीं? मुझे तो अब बहुत शर्मिंदगी होती है।”
“देखो, अपनों की बातों का बुरा नहीं मनाया करते… ” बाबूजी ने समझाते हुए कहा
“अरे! जिनसे हमारी बोलचाल तक नहीं है वो भी स्वाद लेने के लिए आ जाती है। बिट्टो को एम.ए. किए भी अब तीन साल हो गए हैं, कोई अच्छा-सा लड़का देखकर उसके भी हाथ पीले क्यों नहीं कर देती? ” पत्नी की आवाज़ में थोड़ी तल्खी थी।
“मैंने तो इसके ब्याह के लिए सारा इंतज़ाम भी करके रखा हुआ है। इसके संजोग ही ठंडे है तो क्या किया जा सकता है।” बाबूजी ठंडी आह भरते हुए बोले
“भाभी! मैंने तो बिट्टो को कई बार कहा है कि वो शादियों में आया जाया करे, पर वो किसी की सुने तब न। पिछले महीने ज़िद करके ले गई थी इसे मौसी के बेटे की शादी में। पर ये लड़की तो वहाँ बुत ही बनी बैठी रही। उसी शादी में बबली बन-ठन कर सबसे आगे घूम रही थी। बस! वहीं लड़के वालों को नज़र में चढ़ गई और देखो, हो गई न चट मँगनी और पट शादी? ” बुआ भी कुछ उखड़ी हुई सी बोली
“पिता जी! आपने तो सैंकड़ों शादियाँ करवा दी हैं, पर अपनी पोती की ही कुंडली क्यों नहीं पढ़ पा रहे आप?” पत्नी चारपाई पर बैठे ससुर को शिकायत भरे लहज़े में बोली
“तू फ़िक्र न कर बहू! जब समय आएगा तो सब कुछ अपने आप हो जाएगा और तुम्हें पता भी नहीं चलेगा। और रही बात बबली की शादी की तो आजकल तारा डूबा हुआ है, तारा डूबा होने के वक़्त भी भला शादी होती है कहीं? देख लेना ये शादी कभी कामयाब नहीं होगी।”
ससुर की बात सुनकर पत्नी के चेहरे की त्योरियाँ कुछ कम हुईं, फिर राहत भरे स्वर में बाबूजी से बोली- “सुनो जी! मौंटी को रहने दो। मैं ही चलती हूँ आपके साथ।”
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3-कुकनूस
समुद्र की उत्तुंग लहरों की स्वरलहरियों से गुंजायमान वातावरण में निश्चिंत भाव से चहकते ‘गुटर गूँ… गुटर गूँ…’ करते दाना चुग रहे कबूतरों की गर्दनें अनायास ही होटल ताज की ओर से आ रहे लोगों की दिशा में मुड़ गईं। आज फिर कुछ दरबान चमचमाती पॉलीथीन की थैलियाँ हाथ में लिए विदेशी पर्यटकों के साथ उनकी तरफ़ बढ़ रहे थे। ‘गुटर गूँ… गुटर गूँ…’ के धीमे स्वरों में अब संशय के भाव थे। ज्यों ही दरबानों ने थैलियों में से दाना निकालकर कबूतरों की ओर उछाला, वे सभी उड़कर साथ सटे पेड़ों और बिजली के खंभों की तारों पर बैठ गए। सेल्फ़ी लेने को बेताब महँगे सेलफ़ोन लिए विदेशी पर्याटकों के बाजू उनके मुँह की तरह लटक गए। ‘गुटर गूँ… गुटर गूँ…’ का स्वर अब बंद हो गया और वातावरण में नीरवता सी पसर गई। ‘पुच्च… पुच्च…पुच्च…’ करके दाना डालकर कबूतरों को आमंत्रित कर रहे दरबानों के चेहरों पर खीझ और निराशा स्पष्ट झलक रही थी।
तभी एकदम से कुछ हलचल हुई। कबूतरों के पंखों के फड़फड़ाने और उल्लास से भरे ‘गुटर गूँ’ के स्वरों से दरबान चौंक उठे। उन्हें समझते देर न लगी कि वह आज फिर आ गया है। उनकी नज़रें उधर मुड़ गई जिस तरफ़ कबूतर उड़ कर जा रहे थे। ढीली पतलून, पैबंदों से सजा ओवरसाइज़ कोट और सिर पर मैला-सा हैट। हाँ! वो ही था। धीरे-धीरे ‘अय…अय…अय…’ करते हुए पुराने-से कपड़े की थैली से दाना निकालकर कबूतरों की ओर बिखेर रहा था। गर्दनें मटका-मटका कर ‘गुटर गूँ… गुटर गूँ…’ करते दाना चुग रहे कबूतरों में से कुछ उसके कंधे और सिर पर जा बैठे, जैसे पूछ रहे हों कि इतने दिनों से कहाँ थे?
‘इस हरामी ने तो जीना हराम कर रखा है।’ कसैले स्वर में बड़ी-बड़ी मूँछों वाला दरबान अपने साथियों से मुखातिब होते हुए बोला।
‘शही कहते हो यार…। यही मौक़ा होता है इन फॉरेनर शे बख़्शीश लेने का…। पर ये शाला, शब गुड़गोबर कर देता है।’ छोटी-छोटी आँखों वाला गोरखा भी ग़ुस्से से भरा हुआ था।
‘अपने फॉरेनर गेस्ट कबूतरों संग सेल्फ़ी लेकर कितना ख़ुश हो जाते है… और हमें भी ख़ुश कर देते है… पर इस साले भिखमंगे की वजह से…। अभी पिछले हफ़्ते ही इसे वार्निंग दी थी कि जब हम इधर हों तो दिखाई न दिया करे…। लगता है आज इसे सबक़ सिखाना ही पड़ेगा।’ एक और दरबान का दाँतभिंचा स्वर उभरा और वे सभी तेज़ी से उसकी ओर चल पड़े।
‘ओए! तुझे मना किया था ना… इस तरफ़ मत आया कर।’ तेज़ क़दमों की आहट और ग़ुस्से भरी आवाज़ सुनकर वह सहम गया। कबूतर उड़कर पेड़ पर जा बैठे और ‘गुटर गूँ… गुटर गूँ…’ करने लगे। इस बार उनकी ‘गुटर गूँ’ में आक्रोश झलक रहा था।
‘जी… वो… मैं…।’
‘क्या बकरी जैशे मिमिया रहा है शाले।’ उसे सहमा देख गोरखा दरबान उसपर झपटा, जिससे उसका हैट दूर जा गिरा।
‘हमारे पेट पे लात मारता है, साले…।’ बड़ी-बड़ी मूँछों वाले दरबान ने उसके कोट का कॉलर पकड़कर एकदम से झटक दिया। जैसे ही कॉलर झटका तो कोट के अंदर से सैंकड़ों कबूतर फड़फड़ाते हुए निकले और आकाश की ओर उड़ गए। अशरीरी पतलून बेजान होकर ज़मीन पर जा गिरी। दरबान के हाथ में सिर्फ कोट ही रह गया और कपड़े की थैली से सारा दाना निकलकर ज़मीन पर बिखर चुका था।
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4-महँगी धूप
‘कम-से-कम अपने झुमके ही रख लेती’ सुनार की दुकान से बाहर निकलकर राकेश स्कूटर को किक मारते हुए शारदा से बोला
‘कोई बात नहीं जी। ऐसे वक़्त के लिए ही तो गहने बनवाए जाते हैं। वैसे भी कौन सी उम्र रही है गहने पहनने की, भगवान की दया से अब तो बच्चे बराबर के हो गए हैं। अपना घर बन जाए अब तो!‘ पर्स को कसकर पकड़ स्कूटर पर बैठती हुई शारदा ने कहा
अब तो हो ही जाएगा। पी.एफ., बेटियों की आर डी और अब ये गहने भी …! बेटियों की शादी कैसे करेंगे?‘ ठंडी साँस भरता राकेश धीरे-से बोला
‘आप चिंता मत करो जी! अभी उम्र ही क्या है बेटियों की! नीतू अगस्त में पंद्रहवें में लगेगी और मीतू दिसंबर में सत्रहवें में। उनकी शादी तक तो भगवान की कृपा से रोहन इंजीनियरिंग पूरी कर अच्छी नौकरी लग चुका होगा और आपकी रिटायरमेंट को तो अभी 11 साल बाक़ी हैं।’ शारदा अपना हाथ राकेश के कंधे पर रखते हुए आशा भरी आवाज़ में बोली
‘हाँ…। ख़ैर! अब तो घर में दम सा घुटने लगा है। तीन ही तो कमरे है और साथ में भाई साहिब की फैमिली। मैं तो किसी दफ्तर वाले को घर तक नहीं बुला सकता।’
‘सही कह रहे हो। दम तो वाक़ई घुटने लगा है। एक तो घर गली के आख़िरी कोने में है जहाँ न धूप न हवा। कभी छ पर चले ही जाओ तो जिठानी जी के माथे की त्यौरियां और उनके कमेंट्स…उफ़्फ़… बर्दाश्त के बाहर हो जाते हैं। मैं तो तरस गईं हूँ खुली धूप में बैठने को।’ राकेश ने मानो उसकी दुखती रग पर हाथ रख दिया हो।
‘आइए राकेश बाबू! आपका ही इंतज़ार था।’ निर्माणाधीन हाऊसिंग कॉलोनी के गेट पर मज़दूरों को काम समझाता हुआ मैनेजर राकेश को आता देख गर्मजोशी से उनकी ओर लपका। ‘स्कूटर उधर खड़ा कर दीजिए। बस कुछ ही दिनों की बात है पार्किंग भी तैयार हो जाएगी।’
‘ओए! ये सामान हटाओ यहाँ से’ मज़दूर को इशारा करते हुए मैनेजर बोला।
‘आइए ऑफ़िस में बैठकर फारमेलिटीज़ कंप्लीट कर लेते हैं… पेमेण्ट तो लाए हैं न…?’
‘हाँ हाँ पेमेंट तो लाया हूँ। एक नज़़र फ़्लैट तो दिखा दें; इसीलिए तो आज श्रीमती जी को साथ लाया हूँ।’
‘क्यों नहीं… क्यों नहीं! आइए उधर से चलते हैं। भाभी जी! ज़रा ध्यान से चढ़िएगा! बस कुछ ही दिनों में रेलिंग भी लग जाएगी।’ सीढ़ियाँ चढ़ते हुए मैनेजर बेफ़िक्री से बोला
‘फ़्लैट्स तो सारे बुक हो चुके हैं जी पर आपके जी.एम. साहिब के कहने पर यह फ़्लैट आपके लिए रिज़र्व रख दिया था। आप इत्मीनान से देखकर तसल्ली कर लें, मैं ठंडा मंगवाता हूँ।’ दो मंज़िल सीढ़ियाँ चढ़ कर आए राकेश और शारदा को हांफता देख मैनेजर बोला
‘राकेश! इधर देखें। ये किचन थोड़ा छोटा लग रहा है। ये बेडरूम… इसमें डबल बैड लगने के बाद जगह ही कहाँ बचेगी और ये आसपास की बिल्डिंग्ज़ तो लॉबी की सारी धूप और हवा रोक रही हैं।’ मैनेजर के जाते ही थकान भूल कर फ़्लैट का मुआयना करती हुई शारदा अधीरता से बोली
‘लीजिए ठंडा पीजिए!’ खाली फ़्लैट में मैनेजर की गूँजती आवाज़ से दोनों एकदम चौंक गए
‘भाई साहिब! टैरेस…।’ गिलास पकड़ते हुए शारदा ने पूछा
‘भाभी जी! टैरेस तो कॉमन है सभी फ़्लैट्स के लिए।’
‘सभी के लिए कॉमन! ये तो वही बात हो गई! राकेश धीरे-से शारदा के कान में फुसफुसाया
‘पार्क के पीछे वाली कॉलोनी भी हमारी ही कंपनी बना रही है। वहाँ कारपेट एरिया तो इससे अधिक है ही साथ ही एंटरी और टैरेस भी इंडीपैंडेंट है। आप वहाँ देख लीजिए।’ स्थिति भाँपते हुए मैनेजर ने तीर छोड़ा
‘उसका प्राइस?’ शारदा ने सकुचाते हुए पूछा
‘अजी प्राइस तो बहुत कम है जी। कंपनी तो आपकी सेवा के लिए ही है। बस इस फ़्लैट से सिर्फ़ आठ लाख ही अधिक देने होंगे।’ खीसें निपोरता मैनेजर बोला
‘मैनेजर सॉबऽऽ! गुप्ता जी आपको नीचे ऑफ़िस में बुला रहे हैं। ‘नीचे से कुछ सामान उठाकर आ रहे एक मज़दूर ने मैनेजर को कहा
‘मैं नीचे ऑफ़िस में ही हूँ, जो भी आपकी सलाह हो बता दीजिएगा।’ बाहर निकलते हुए मैनेजर बोला
‘आठ लाख! इतना तो हो ही नहीं पाएगा। तो अब क्या करें।’ राकेश की आवाज़ मानो बहुत गहरे कुएँ से आ रही थी
‘फ़्लैट बेशक छोटा है; पर अपने घर से छोटा तो नहीं है न। छत पर जाने से किसी के साथ कोई चख-चख भी नहीं। यहाँ तुम अपने किसी भी दफ्तर वाले को बड़े आराम से बुला सकते हो।’
‘पर तुम्हारी वो खुली धूप में बैठने की इच्छा…।’
‘अजी, मेरा तो आधा दिन स्कूल में ही निकल जाता है। उसके बाद सेंटर पर ट्यूशन। नीतू, मीतू भी मेरे साथ चार बजे के बाद ही घर आती हैं और तुम शाम को छह बजे के बाद। समय ही कहाँ मिलता है धूप में बैठने का।’
दोनों धीरे-धीरे सीढ़ियाँ उतर ऑफ़िस की तरफ़ बढ़ने लगे।
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5-पराजित योद्धा
‘तीन हज़ार…? पर पर्ची पर तो बकाया चार हज़ार लिखा है!’ टैंट हाऊस से आए सरदार जी ने कुर्सियाँ और शामियाना टैम्पू में रखने के बाद पैसे गिनते हुए वंदना से कहा
‘ओ बस ठीक है अंकल जी ! अब कुछ तो डिस्काउण्ट दोगे ही न आप। अच्छा और बताइए क्या पियोगे, चाय या ठण्डी लस्सी?’
‘पीणा पुआणा कुछ नी पुत्तर। पर देख! तेरे कहने से लाइटें एक दिन और लगी रहने दे रहा हूँ । ऊपर से अब तू हज़ार रुपये भी कम दे रही है। कम से कम दो सौ रुपये टैम्पू का किराया तो दे दे।’
‘ऐ लो अंकल जी दो सौ, आप भी क्या याद रखोगे । अब खुश !’
टैंट हाऊस वालों के जाते ही बाबू जी के पास बैठे मौसा जी ने मुस्कुरा कर वंदना से कहा- ‘यहाँ भी बचा लिए बिटिया।’
होंठों पर गर्वीली मुस्कान लिये वंदना आंगन में पड़े बड़े से बोरे को घसीटते हुए स्टोर की तरफ ले जाने लगी।
‘इस बोरे में क्या है?’ रसोई में दूध उबालती माँ और साथ खड़ी मौसी के चेहरे पर प्रश्नचिह्न उभरा।
रात केटरिंग वाले जो राशन वगैरह का सामान बचा गए थे न पैलेस में, दीदी वो सब बोरे में भरकर गाड़ी में रखवा लाई थी।’ बर्तन धो रही महरी ने बताया
‘डिंग-डांग’ डोरबेल की आवाज़ सुनते ही वंदना झट से स्टोर में से निकली और गेट पर रिक्शा-रेहड़ी वाले को देख उसे हाथ के इशारे से अंदर आने को कहा – ‘इस तरफ आ जाओ भैया !’
‘राधा ! तुम स्टोर में से मन्दिर वाले बिस्तर उठाकर लाओ, मैं तब तक बर्तन रखवाती हूँ।’ वंदना ने बाहर आकर महरी को कहा
‘ये बिस्तर वगैरह कब समेटे तूने?’ बाबू जी हैरान होकर वंदना से पूछा
‘सुबह उठते ही समेटकर मन्दिर के सैक्रेटरी साहिब को फोन कर दिया था कि बिस्तरे और बर्तन मँगवा लें। कम से कम आज का किराया तो नहीं पड़ेगा न।’ बड़ा- सा पतीला, जिसमें कई छोटे-छोटे से बर्तन थे,उसे को उठाते हुए वंदना ने जवाब दिया।
‘छोटी ! पूरी शादी वंदना ने बहुत अच्छे से सँभाली। रस्मों के साथ-साथ मेहमानों का भी पूरा ध्यान रखा । केटरिंग, टैंट और पैलेस सभी का इंतज़ाम भी बहुत अच्छी तरह सँभाला।’ मौसी वंदना की तारीफ के पुल बाँधते हुए माँ से बोली। भिगौने में दूध उबल कर ऊपर तक आ रहा था।
वंदना एक एक बर्तन लिस्ट से मिला कर टिक करने के साथ ही मौसी की बातें सुनकर गर्व से फूली जा रही थी ।
‘सही कह रही हो जिज्जी ! देखो ना ! अब बहू से छोटी सी बात क्या हुई कि सौरभ उसका पिछलग्गू बन बहन की शादी में नहीं आया। वंदना ने सब कुछ ऐसा सँभाला कि सौरभ की कमी तक महसूस नहीं होने दी। हमारी वंदना तो बेटों जैसी बेटी है….।’
टन्नन्न…… की आवाज से अचानक सभी चौंक गए। वंदना के हाथ से पतीला छिटक गया था और सभी बर्तन इधर उधर बिखर गऍं। और दूध उबल कर बाहर गिर रहा था।
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6-सहारा
‘रामचरन ! ये चांदनी और कनेर कैसे एक तरफ झुके पड़े हैं?’ सुबह की गुनगुनी धूप में लॉन की आराम कुर्सी पर पसरे पत्नी से चाय का कप पकड़ते हुए साहब का ध्यान अनायास पौधों पर पड़ा ।
‘उरातमाआँधीकेमारेसाब! दुई-एक दिनमाखुदैही ठीकहुईजहिएँ!’ क्यारी की गुड़ाई करते रामचरन ने जवाब दिया।
‘गैराज से बांस ले आओ और दोनों पौधों को सहारा लगा दो।’
‘हओ साहेब!’ खुरपा छोड़ रामचरन गैराज की तरफ बढ़ा
‘राम-राम कक्का!’ गैराज में ड्राइवर रघु कार की डिग्गी खोलते हुए बोला
‘जैरामजीकीरग्घू! आजतोबड़ीजल्दीआयगए? बहुरियाठीकतोहै?’
‘हमेंअभीअस्पतालजाईनाहीमिलाहैकाका! कल साम कौनोमसीनबिगड़गईफैक्ट्रीमा, ऊकासामानलानेमालिकभेजेथेहमका। ईसुसरीगाड़ीहुऐसेबखतपरधोकाकरदीस।बड़ीमुस्किलसेमिस्त्रीमिलारातमें । इस कारन वापिसी मे देर होए गई, अबआयमिलाहै।बससामानधरकेजाहिएरहेहैं। तुमसुनाओ काकीकाबुखारउतरगया?’ उनींदे से लाल हुई आँखे मलता हुआ रघु बोला ।
‘अरे बिटवा! हम गरीबन के बुखार तौ साहूकार के करज जैसन है जो चढ़त ही जात है । बड़े डागडर को ही दिखान होइ। दुई-एक दिन मा पगार मिल जाई तब ले जैहै।’ ठंडी आह भरते हुए रामचरन ने कहा
‘साहब से कह का देखो तनिक। बहुत नरम दिल हैं सायद कौनों जुगाड़ बन जाए।’ सामान उठा कर लॉन की तरफ जाते हुए रघु हौले से बोला
‘बहुत टाइम लगा दिया पहुंचने में रघु। अब जल्दी से रेलवे स्टेशन जा कर वेटिंग रूम से इंजीनियर साहब को साथ लेकर फैक्ट्री पहुँचो। कल से काम बंद पड़ा है।’
‘नमस्ते सर! नमस्ते बीबी जी! सर मुझे तो अस्पताल जाना है। मेरी घरवाली…।’
‘ओह हां ! अभी अस्पताल में ही है वो ? अब तबीयत कैसी है उसकी? मैं फैक्ट्री मुनीम जी को फोन कर देता हूं तुम्हे कुछ रूपए दे देंगे । अच्छे से ध्यान रखना उसका और कोई जरूरत हो तो बेहिचक बता देना। अब जल्दी स्टेशन पहुँचो।’ अखबार का पन्ना पलटते हुए साहब ने कहा
‘मेहरबानी सर ।’ चेहरे पर कृतज्ञता के भाव लिए रघु उल्टे पाँव लौट पड़ा।
पीछे क्यारी में बांस गाड़ने बैठै रामचरन की आंखों में चमक और हाथों में तेज़ी आ गई ।
‘आपने बहुत सिर पर चढ़ा रखा है नौकरों को । इनका तो ये आए दिन का रोना है। अभी पिछले हफ्ते ही तो आपने इसे रुपये दिए थे और अब फिर से । वैसे भी दो दिन बाद तो सैलरी देनी ही है।’ पास बैठी पत्नी थोड़ी तल्खी से बोली ।
‘समझा करो भाग्यवान! इनकी ज़़रूरतों की भट्ठी में पैसों का ईंधन डालते रहना चाहिए तभी ये लोग एहसानमंद और आश्रित बने रहते हैं । बिजनेस करने के लिए ये सब करना ही पड़ता है।’ खीसें निपोरते साहब की आवाज़ में शातिरपना था।
रामचरन के हाथ सहसा रुक गए एक दो पल कुछ सोचने के बाद उसने पौधों को सहारा देने के लिए गाड़े बाँस निकाल फेंके और गहरी सांस भरकर फिर से गुड़ाई में जुट गया ।
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