जून 2026

संचयनबेटे की नाराज़गी     Posted: June 1, 2015

बेटे की नाराज़गी
बेटा बहुत नाराज था; आज उसने अपनी सारी नाराजगी पिता से प्रकट भी कर दी-“मैं पूरे दो वर्ष चंडीगढ़ रहकर एम0ए0 कर आया, लेकिन आप वहाँ एक बार भी मुझसे मिलने नहीं आए। पहले तो आप अक्सर चंडीगढ़ जाते रहते थे, फिर मेरे रहते क्यों नहीं आए ?”
बेटे की नाराजगी वह समझते हैं, लेकिन उसके प्रश्न का क्या उत्तर दें, यह वह सोच नहीं पा रहे हैं।
पिता को मौन देखकर बेटे ने पुनः प्रश्न किया-“आप दो वर्ष पूर्व मुझे हॉस्टल छोड़ने गए थे; बस, उसके बाद कभी वहाँ जाकर देखा तक नहीं कि मैं हॉस्टल में कैसे रहता हूँ।… ऐसा क्यों डैडी ?”
“तुम्हारी नाराजगी उचित है, बेटे !” इतना ही कह पाए थे वह।
लेकिन बेटा पिता के इस संक्षिप्त उत्तर से सन्तुष्ट नहीं हुआ। अतः अपनी बात को और स्पष्ट करते हुए उसने कहा-“मेरे दोस्त कहते थे कि तुम्हारे डैडी भी कमाल हैं। शुरू में तो तुमसे इतना लगाव था कि स्वयं तुम्हें हॉस्टल छोड़ने आए थे। जाते समय भी बड़े भावुक हो गए थे, आँखें भर आईं थीं।… इतना लगाव था कि तुम भी, हॉस्टल छोड़कर, वापिस रोहतक जाने को तैयार हो गए थे।… लेकिन उसके बाद तुम्हारे डैडी कभी तुम्हें देखने तक नहीं आए, फोन से ही काम चला लिया, बस !”
बेटे की नाराजगी की आँच से वह अन्दर-ही-अन्दर, मोम की तरह, पिघलते जा रहे थे। लेकिन कैसे बताते कि उससे दूर रहकर उन्होंने पिछले दो वर्ष कैसे बिताए हैं। वही जानते हैं कि जिस बेटे से वह कभी पल-भर की भी दूरी सहन नहीं कर पाते थे, उसी से दूर रहने का निर्णय करते समय उन पर क्या बीती होगी।
लेकिन वह जानते हैं, यह ज़रूरी था। यदि वह बेटे से दूर नहीं रहते, तो बेटा, बाप की छाया से दूर, अपने दम पर जीना कैसे सीखता ! सारी उम्र बाप के सीने से चिपककर तो वह नहीं रह सकता था। कभी-न-कभी तो उसे उनके बिना जीवन सीखना ही पड़ता। इसलिए….।
अब वह प्रसन्न थे कि बेटे ने उनसे दूर रहकर, उनके बिना जीना सीख लिया है और आवश्यक आत्मविश्वास भी उसमें आ गया है। अतः बहाना बना दिया-“क्या करता बेटे, इन दो वर्षों में बहुत व्यस्त रहा। काम ही इतना था कि चंड़ीगढ़ जाने के लिए समय ही नहीं निकाल पाया।”
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