उस शख्स की न सूरत चित से उतर पा रही है, न सीरत। खुश मिजाज व्यक्तित्व और रोशनी बिखेरता वह गौर वर्ण चेहरा। सरल–हृदय। द्वेष -भाव से मुक्त एक समर्थ रचनाकार। तभी तो जिस किसी ने उसके न रहने का समाचार सुना, विषाद से भर आया। किसी के न रहने का असली दु:ख क्या होता 
कोई चार दशकों का हमारा साथ था। हमने अनेक साहित्यिक यात्राएँ साथ–साथ की। पंजाब और उाराखण्ड को हमने खंगाल डाला था। दो बार पटना भी गए। मेरी उनसे निकटता तीन वजहों से थी–एक :नगर निगम में हम सहकर्मी थे। दो : दोनों लेखक बिरादरी से थे। तीन : सुरेश एक सहृदय,सजन,सभ्य व्यक्ति थे। इतने वर्षों के साथ सवरधिक प्रबल कारण यही था। सुरेश के पास न कोई जोड़ तोड़ था, न दिखावा,न आत्मश्लाघा का भाव। दर्प को उन्होने विखंडित किया हुआ था। एक सफल और चर्चित लघुकथाकार होने का पाण्डित्य ओढ़े वह यहाँ -वहाँ नहीं डोलते फिरते थे। रचना प्रकाशन के लिए संपादक को खुश करने की कभी कोशिश नहीं की। दूसरों का छपा पढ़ते थे ,तो तत्काल बधाई देते थे। जब कई रचनाकारों का दूसरों का छपा देख दिल बैठ जाता है, सुरेश खुले दिल से उसका स्वागत करते थे।
सुरेश शर्मा, जिनका असल नाम सुरेन्द्र शर्मा था, ने लेखन की शुरूआत कहानियों से की थी। उनके तीन कथा संग्रह छोटे लोग, शोभा और थके पाँव हैं। छोटे लोग का लोकार्पण वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी ने किया था। एक मजेदार बात यह थी कि उनकी प्राय: सभी कहानियों की नायिकाओं का नाम शोभा था। इसका रहस्य मैं अंत तक न जान सका। खैर मित्रों की सलाह और आलोचनाओं को सही परिपेक्ष्य में स्वीकार कर सुरेश ने आत्मसमीक्षा की और कहानियों का मार्ग छोड़ लघुकथा लेखन के दुर्गम मार्ग को अपनाया। दुर्गम इस दृष्टि से एक सार्थक,प्रभावी लघुकथा लिखना, कहानी–उपन्यास लिखने से अधिक कठिन और चुनौती पूर्ण काम है। बीच में डॉ. राजेन्द्र कुमार शर्मा के साथ मिलकर ‘कहानी और कहानी शीर्षक से तीन कहानी संकलनों का संपादन किया था। इनमें देश के लब्ध प्रतिष्ठित कथाकारों की कहानियाँ शामिल की गई थी।
सुरेश शर्मा की प्रथम लघुकथा ‘मानव धर्म ’ साप्ताहिक युग प्रभात में प्रकाशित हुई थी। इसके पश्चात 1987 से इस सिलसिले का प्रभाव अभी तक जारी था। पर यहाँ भी जल्दबाजी नहीं थी। धैर्य उनकी बड़ी पूँजी थी। वर्ष भर में वह मुश्किल पाँच–छह लघुकथाएँ लिखते थे। घटित और रचित के बीच पर्याप्त अंतराल होता था। विसंगत समाज के प्रति उनका वक्रिच आक्रोश व्यंग्य के रूप में उनकी लघुकथाओं में व्यक्त होता था। उनकी लघुकथाओं की सारी शक्ति सिमट कर अंतिम पंक्ति में आती थी और पाठक की चेतना को झंकृत करती थी। उनकी हर लघुकथा का प्रथम पाठक मैं होता था। मेरे सुझाओं से असहमति का साहस भी उनमें था।
लघुकथा विधा के प्रति उनके लगाव का प्रमाण यह है कि अपने निजी, एकल लघुकथा संग्रह छपवाने का तनिक मोह न पालते हुए, उन्होंने अन्य लघुकथाकारों की लघुकथाओं का संपादन कर दो लघुकथा संकलनों का प्रकाशन किया था। ‘काली माटी’ और ‘बुज़ुर्ग जीवन की लघुकथाएँ’ संकलन बहुत चर्चित रहे। बहुत बाद में, मित्रों के बार–बार कहने पर उनका प्रथम एकल लघुकथा संग्रह ‘अंधे बहरे लोग’ वर्ष 2013 में प्रकाश में आया। ऐसे समय में जब लोग दूसरों को धकियाते हुए आगे निकलने की जुगाड़ में लगे रहते हैं, सुरेश शर्मा का निरपेक्ष बने रहना सचमुच स्तुत्य है।
सुरेश शर्मा के मानवीय और नैतिक दृष्टिकोण को चंद घटनाओं के माध्यम से समझा जा सकता हैं ।तीन बेटियों के पिता संयुक्त परिवार में भी सबका ध्यान रखते थे। सबकी सहायता के लिए तत्पर रहते थे। उनके दोनों भतीजे–संजू और राजू उनकी बराबर देख भाल करते थे। सुरेश भी उनपर जान छिड़कते थे।
एक महत्त्वपूर्ण अर्धसरकारी संस्थान की प्रमुख सुरेश की नजदीकी रिश्तेदार थी। उपकृत करने की दृष्टि से उन्होने सुरेश के समक्ष प्रस्ताव रखा था कि वे संस्थान की मुख पत्रिका के लिए, चाहे नाममात्र के लिए ही सही, सम्पादकीय सहयोगी बन जाए और बदले में पाँच हजार वेतन पाते रहे। सुरेश शर्मा ने साफ इंकार कर दिया। जो काम मुझे आता नहीं, जो काम मैं करूँगा नहीं ,घर बैठे उसके लिए वेतन क्यों लूँ? बिना कुछ किए–धरे (न हींग लगे, न फिटकरी) पाँच हजार की आय, पत्रिका में निमित नाम–प्रकाशन और संपादन के रूप में होने वाली पूछ–परख का मोह आज कितने लोग छोड़ पाते है। कोई सच्चा योगी–वैरागी ही यह कर सकता है। इशाक अश्क की साहित्यिक पत्रिका ‘संमातर’ में सुरेश शर्मा का नाम बतौर सहायक संपादक जाता था। इसके लिए सुरेश ने न चाहा था, न कभी कोई कोशिश की थी। यह तो अश्क जी का सुरेश के प्रति स्नेह और आदर भाव था। मगर सुरेश को जब लगा कि पत्रिका के संपादन में उनका कोई सक्रिय सहयोग नहीं है तो उन्होंने अपना नाम संपादन–मंडल से हटवा लिया। उनकी दरियादिली के ऐसे अनेक उदाहरण है। एक मित्र को रुपए उधार दिए ,तो न कभी लौटाने के लिए तगादा किया, न कभी अहसान जताया।
ऐसे विलक्षण व्यक्तित्व के धनी के बिछोह से सभी का शोकाकुल होना स्वाभाविक है। इस कथन को औपचारिक न माना जाए कि उनका जाना एक अपूर्णनीय क्षति है। मानवीय सरोकारों वाले ऐसे उदारमना व्यक्तियों की प्रजाति आज लुप्त होती जा रही है। इसे बचाने की कोशिश हर प्रबुव्द्ध की होनी चाहिए। आचारण और चरित्र की ईमानदारी से ही संभव है। आचरण जो लेखन में हो और जीवन में भी। सुरेश शर्मा के प्रति यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
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जून 2026
चर्चा मेंसुरेश शर्मा : एक विलक्षण व्यक्तित्व Posted: May 1, 2015
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