“सर आपको मेरी लघुकथा कैसी लगी?” लघुकथा गोष्ठी के उपरांत चाय के दौरान नवोदित लघुकथाकार ने आकर पूछा था।
वह किसी पर भी कोई टिप्पणी नहीं करना चाहते थे ,सो हल्का सा मुस्कराकर बोले, “देखिए, बहुत-सी लघुकथाएँ सुनीं, आपकी कौन -सी थी ठीक ठीक याद नहीं, किन्तु सभी का प्रयास सराहनीय रहा।”
“सर आपने अपने वक्तव्य में कहा था कि कुछ लघुकथाएँ अनावश्यक विस्तार लिये थीं, मेरी… उनमें तो नहीं?”
“देखिए मैं स्मरण नहीं कर पा रहा आपने कौन सी लघुकथा सुनाई, आज वक्ता काफी रहे, लघुकथा में लोगों की रुचि देखकर अभिभूत हूँ, चाय का आनंद लें, कभी फिर चर्चा करेंगे आपकी लघुकथाओं पर।”
वरिष्ठ लघुकथाकार व समीक्षक ने शालीनता से कहा।
” अब लघुकथा दोहराए जाने की स्थिति उत्पन्न हो चुकी थी कि थोड़ी- सी दूरी पर खड़े उनके समकक्ष ने उनकी कठिनाई भाँपते हुए उन्हें पुकार लिया और उन्हें दूसरी ओर ले गए।
“भाई साहब भला बचाया आपने!”
“क्या वास्तव में आपको उनकी लघुकथा याद नहीं थी, मेरी समझ में गोष्ठी की सबसे निम्न प्रस्तुति थी वह।”
“अरे मुँह पर यूँ कहना अच्छा नहीं होता।”
“किसी को तो राह दिखानी ही होगी।”
“आप जानते नहीं ,शायद वह यहाँ के प्रसिद्ध उद्योगपति परिवार से हैं और उनके परिवार की ओर से हर वर्ष एक स्मृति सम्मान समारोह आयोजित किया जाता है, मेरा नाम इस बार की प्रस्ताव सूची में है…”
“….”
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