‘गोभोजन कथा’ लघुकथा का पाठ बलराम अग्रवाल़ द्वारा बरेली गोष्ठी 89 में किया गया था। पढ़ी गई लघुकथाओं पर उपस्थित लघुकथा लेखकों द्वारा तत्काल समीक्षा की गई थी। पूरे कार्यक्रम की रिकार्डिग कर उसे ‘आयोजन’ (पुस्तक)के रूप में प्रकाशित किया गया था।लगभग 28 वर्ष बाद लघुकथा और उसपर विद्वान साथियों के विचार अध्ययन की दृष्टि से महत्वपूर्ण प्रतीत होते हैं-
गोभोजन कथा
बलराम अग्रवाल
‘‘याद आया।’’ गऊशाला से भी निराश निकलते इन्दर ने पत्नी को बताया, ‘‘अपना बशीर था न……वही जो हाल के दंगों में मारा गया उसकी गाय शायद गर्भिणी है।’’
‘‘छिःं कमाल करती हो,” इन्दर तमतमा गया, ”बशीर के खूँटे पर बँधकर गाय-गाय नहीं रही, बकरा हो गई? याद है दंगाइयों के हाथों से उस गाय को हलाल होने से बचाने के चक्कर में ही जान गई उस बेचारे की…..।”
‘‘दो-चार दस-पाँच दिन का समय बीच में दिया होता, तो कहीं और भी तलाश कर सकते थे हम।’’ उसकी उपेक्षापूर्ण चुप्पी से क्षुब्ध होकर वह पुनः बोला, ‘शुभ मुहूर्त है……..आज ही से शुरू करना होगा। पड़ गई साले ज्योतिषी के चक्कर में।’’
चुप रही माधुरी। क्या कहती! सन्तान प्राप्ति जैसे भावुक मामले में बेजान पत्थर और अव्वल अहमक तक को पीर-औलिया मानकर पूजने लगते हैं लोग। यह तो गाय थी-सजीव और साक्षात्। बशीर की ही सही। घर पहुँचकर कर उसने हाथ-मुँह धोए। लबालब तीन अंजुरी भर गेहूँ का आटा एक बरतन में उल्टा, तोड़कर एक गुड़ का टुकड़ा उसमें डाला और साड़ी के पल्लू से उसे ढाँपकर चल पड़ी बशीर के घर की ओर।
गाय बाहर ही बँधी थी लेकिन गर्भिणी होना तय करने से पहले उसको कुछ देना माधुरी को ज्योतिषी को सलाह के अनुरूप नहीं लगा। सो साँकल खटखटा दी। खूनी आँखों और खूनी चेहरे वाली बशीर की विधवा ने दरवाजा खोला। देखती रह गई माधुरी, यह थी ही ऐसी या…. इन्दर तो एक बार यह भी बताते थे कि बशीर का बच्चा इसके पेट में है।
‘‘क्या हुक्म है।’’
‘‘मैं…..माधुरी हूँ, इन्दर की पत्नी।’’ कभी गाय को तो कभी बशीर की बीवी के पेट को परखती माधुरी जैसे तन्द्रा से जाग उठी…..‘‘आटा लाई हूँ…..ज्यादा तो नहीं, फिर भी-अपनी हैसियत भर…..तुम्हारे लिए जो भी बन पड़ेगा, हम करेंगे।’’ बरतन के ऊपर से पल्लू हटाकर उसकी ओर बढ़ाते हुए उसने कहा, ‘‘संकोच न करो…..रख लो……..बच्चे की खातिर।’’
बशीर की विधवा ने चूनर को अपने पेट पर सरका लिया और फफककर चौखट के सहारे सरकती हुई धीरे-धीरे वहीं बैठ गई।
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विमर्श
डॉ भगवानशरण भारद्वाज
बलराम अग्रवाल अपने शीर्षक से ही ध्यान खींचने वाली लघुकथा में मानवीय संवेदना के उदात्त रूप की व्यजंना सफलता पूर्वक करते हैं।
डॉ.सतीशराज पुष्करणा
बलराम अग्रवाल की लघुकथा ‘‘गोभोजन कथा।’’ मेरी समझ से इस सत्र की सर्वश्रेष्ठ लघुकथा है जो कथ्य, कथानक, शिल्प एवं शीर्षक आदि प्रत्येक स्तर पर एक सुन्दर एवं गठी हुई लघुकथा है जिसमें कहीं भी फालतूपन नहीं और यह कलात्मक एवं मनोवैज्ञानिक होते हुए भी अपने उद्देश्य से कहीं भी विचलित नहीं होती। इस लघुकथा में मूानवीय संवेदनायें बहुत ही शानदार ढंग से उभरी हैं। इस श्रेष्ठ लघुकथा के लिए बलराम बधाई के पात्र हैं।
डॉ. स्वर्ण किरण
द्वितीय सत्र में पठित लघुकथाओं में बलराम की लघुकथा ‘‘गोभोजन कथा’’ का शीर्षक व्यंजक है…यह मानवीय संवेदना की रचना है। गाँव के इन्दर की पत्नी की हमदर्दी, बशीर की विधवा की सहायता, बशीर की गाय, दंगाइयों द्वारा मार डाली गई,इन्दर की पत्नी मालती अपनी हैसियत भर आटा ले आई। बशीर की विधवा ने अपनी चुनर को सरका लिया।
अशोक भाटिया
बलराम अग्रवाल की ‘‘गोभोजन कथा’’- रूढ़ संस्कारों के बीच से लेखक यह बात उभारता है कि जो हमारे सामने है, उसका ख्याल हम नहीं कर रहे और जो नहीं है, उसकी इच्छा कर रहे हैं। जड़ संस्कारों में से एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण की तरफ पाठक को बढ़ाने का काम करती है यह लघुकथा। इसीलिए हम बशीर की विधवा के प्रति सहानुभूति से जुड़ते हैं और इन्दर व माधवी की बालक लेने की इच्छा पर मुहर नहीं लगाते। दरअसल लघुकथा जब तक यथार्थ की जटिलता में नहीं जाएगी, जब तक अर्थ की दृष्टि से अपने आकार का अतिक्रमण नहीं करेगी, तब तक सामाजिक यथार्थ पर उसकी पकड़ ढीली ही रहेगी। यह दोनों लघुकथाएँ जटिल स्थितियों को उठाती हैं। लघुकथा में बाकी साहित्य की तरह हीGeneralization की बजाय Analysation की प्रवृत्ति का होना, आना बहुत जरूरी है।
रामयतन यादव
बलराम अग्रवाल की ‘गोभोजन कथा’ एक श्रेष्ठ लघुकथा होते हुए भी सामान्य पाठकों की ओर से अधिक वाह-वाही लूट सकने में असमर्थ है। उलझे हुए कथानक केन्द्रित होने के कारण यह लघुकथा सहज बोधगम्य नहीं है। ‘गोभोजन कथा’ के केन्द्रीय कथा भाव को समझने के लिए इसे पाठकों को कई बार पढ़ना पड़ेगा।
जगदीश कश्यप
‘गोभोजन कथा’ में साम्प्रदायिक सद्भाव को नये दृष्टिकोण से परखा गया है। गाय के लिए मरने वाले बशीर की कथा से किस प्रकार नायक की पत्नी का अंतस् प्रभावित होता है और इसी का परिणाम होता है कि वह जिस गर्भधारण करने की अवस्था को लेकर गाय को गुड़/आटा खिलाने जाती है और फिर बशीर की पत्नी, जो तंगहाल है, गर्भवती है उसे दे आती है। एक संस्कार से जुड़ी औसत भारतीय औरत का ऐसा बदला रूप अत्यन्त स्वाभाविक है।
डॉ. शंकर पुणतांबेकर
‘गोभोजन कथा’ पर काफी चर्चा हो चुकी है……पारम्परिेक एक जाति का संकुचितता में जकड़ा मन किस तरह एक नारी को मानवीय धरातल पर ला खड़ा करता है इसका चित्रण बलराम अग्रवाल जैसे सशक्त लघुकथाकार के लिए ही सम्भव है। ऐसी ही लघुकथाएँ लघुकथा को प्रतिष्ठा दे सकती हैं…..दे रही है।