हरिबाबू ने नज़र घुमाकर देखा, तो उन्हें अपने ड्राइंग–रूम की हर चीज़ बड़ी सस्ती और घटिया नज़र आई। ‘यह भी कोई डा्रइंग–रूम है !’ सोचकर वह उदास से हो गये।
ड्राइंग–रूम तो धीर साहब का है, एकदम फस्स क्लास। कल जन्म–दिन की बधाई देने गये, तो देखते ही रह गये। क्या सोफ़े, रंगीन टी0वी0, वी0सी0आर0 और जि थे ! और क्या डेकोरेशन थी, वाह !!
और हां, शो–केस में कितने शो–पीस सजे थे, एक से बढ़कर एक, पीतल के, लकड़ी के, संगमरमर के ! एक रेक तो पूरे–का–पूरा खिलौनों से भरा था और हर खिलौना कितना क़ीमती, खूबसूरत और चमचमाता हुआ लगता था।
क्षण–भर के लिए हरिबाबू कहीं खो गये थे कि तभी उनके चुन्नू–मुन्नू ‘पपा आ गये, पपा आ गये’ का शोर मचाते हुए अन्दर घुस आये। फिर उछलते–गाते–झूमते उन दोनों ने, पूरे ड्राइंग–रूम को, एक संगीतमय ताज़गी से तर कर दिया।
हरिबाबू के चेहरे पर हल्की–सी मुस्कान झलक आई। बस, फिर क्या था, दोनों बच्चे चढ़ बैठे उनके कंधों पर और लगे उछल–उछलकर खेलने।
अब पुन: निगाह डाली, तो हरिबाबू को अपनी सारी–की–सारी चीजें बदली हुई नज़र आइ।
‘धीर साहब के ड्राइंग–रूम में सब कुछ तो है, लेकिन ऐसे सजीव खिलौने तो नहीं हैं।’ उन्होंने अपने आप से कहा और बच्चों को कसकर छाती से लगा लिया।
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अगस्त 2026
देशखिलौने Posted: March 1, 2015
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