‘‘ऐ चणादास मोठमल, क्या हाल है तेरा?’’ यह कहकर मैंने अपने बालसखा के कंधे पर थाप लगाई।
‘‘अरे जज साब आप!….बहुत दिनों से पधारे।’’ अचानक मुझे देख उसकी बीमार आँखों में चमक आ गई।
‘‘फिर वही जज साहब की रट….भगवाना, तू नहीं सुधरेगा।’’ मैंने उसकी दुकान पर ताजी सिकी मूँगफली के कुछ दाने मुँह में डालते हुए उसे मीठी–सी डाँट लगाई।
‘‘कहाँ आपन इत्ते बड़े जज और कहाँ मैं एक मामूली भड़भूंजा।’’ वह फिर भी धनुष की तरह झुका हुआ अपनी औकात से चिपका ही रहा।
‘‘एक बात सुन यार, जितनी बढ़िया मूँगफली तू सेंकता है न, शायद उतना बढ़िया मैं फैसला नहीं लिखा पाता रे।’’ मैंने उसके गाल पर एक प्रेम–भरी चपत लगाई और वहाँ से खिसक पड़ा।
कुछ दूरी से मैंने उसे मुड़कर देखा तो वह अभी भी भीगी पलकों के साथ खड़ा मेरी अपलक देख रहा था।
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अक्तुबर 2026
संचयनउत्कृष्टता Posted: February 1, 2015
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