नवम्बर 2026

अध्ययन -कक्षलघुकथाकार रावी और जीवन-मूल्य     Posted: March 1, 2018

        लघुकथाओं का सिलसिला एक सुदीर्घ अन्तराल से चला आ रहा है। चाहे संस्कृत हो या मराठी, तमिल हो या अंग्रेजी, सिन्धी या गुजराती लघुकथाएँ अपनी अनिवार्यता प्रमाणित कर चुकी हैं।

यह कहना कि लघुकथा केवल व्यस्त युगीन अनिवार्यता है, इसके कैनवास के साथ अन्याय करना होगा। लघुकथा लम्बे चिन्तन का परिणाम होती है। जो कथाकार जितना सोचता समझता है, उतना ही बोधक अपनी लघुकथाओं के सन्दर्भ में हो सकता है।

हिन्दी कहानी में, खलील जिब्रान की भाँति लघुता और संक्षिप्तता का प्रयोग करनेवाले कथाकार रावी एकान्त-चिन्तक हैं। हाँ, यह दु:खद आश्चर्य अवश्य है कि रावी ने जहाँ लघुकथा जैसी पैनी और कण्डेस्ट विधा अपने लिए चुनी है, वहाँ वह उपन्यासों में भी फैलना-फूटना चाहते हैं। शायद यह उनमें आत्मविश्वास की कमी हो या फिर अधिकता। आज स्पेशलाइज्ड प्रेक्टिशनर होते हैं। वकील, प्राध्यापक, इन्जीनियर भी होते हैं….लेकिन क्रिएटिव लेखक साहित्य की एक ही केन्द्रीय विधा क्यो नहीं चुनना चाहता। बहरहाल, रावी का उपन्यासकार उनके यूटोपियन जीवन-मूल्यों का प्रयोग मात्र है, यह असर उनकी लघुकथाओं पर भी आया है और तब वे बोध-कथाएँ बन गई हैं। लेकिन हिन्दी में लघुकथाओं के ऐतिहासिक क्रम की जब हम बात करते हैं तो रावी को नजरअन्दाज नहीं कर सकते।

लक्ष्मीकान्त वर्मा ने हिन्दी साहित्य कोश (भाग-2) में उनके बारे में लिखा है:

लघुकथाओं में आपकी शैली अधिक निखरकर आई है। छोटी-छोटी कहानियों में जीवन की विविध अनुभूतियों की मार्मिक अभिव्यक्ति हुई हैं। ‘मेरे कथागुरु का कहना है’ (1958 ई.) आपकी बड़ी ही सफल कृति मानी जाती है। यद्यपि आपकी सम्पूर्ण कृतियों पर छायावादी भावबोध का गहरा प्रभाव देखने में आता है। रागात्मक अनूभूतियों और जीवन के निकटस्थ तथ्यों का एक सर्वधा नया पुट आपकी कहानियों में मिलता है।

लघुकथा सृजन की प्रेरणा के सम्बन्ध में उन्होंने स्वयं स्वीकार किया है, इन पंक्तियों के लेखक को लिखे गए अपने पत्र में-‘समाज को अपना शिव और सुन्दरतम देने की उत्कट अभिलाषा ही मेरे निकट..सृजन की प्रेरणा है और यह मेरी दृष्टिमें प्रत्यके कहाीनकार की होनी चाहिए।’

सत्य-शिव-सुन्दर की वार्ता बहुत पारम्परिक हो गई है। इतनी परम्पराजन्य .कि विश्वास नहीं होता….रावी जैसी वैयक्तिक (?) सार्वजनिक जीवन में प्रयोगशील व्यक्ति अपने लेखन में प्रयोगों से किसी हद तक बचना चाहते हों।

अपनी एकाधिक लघुकथाओं में जीवन के दबे-ढँके पहलुओं पर खुले और उन्मुक्त ढंग से उन्होंने चर्चा की है। इस सन्दर्भ में पुनः उनका एक पत्र:

‘प्रायः सम्बन्धों में वासना तथा शारीरिक तत्त्व निःसन्देह अपेक्षित हैं।

मैं कहूँगा-नख से शिख तक-किन्तु तब जब शरीर के किसी भी अवयव पर बन्धन के कँटीले तार न डले हों। समाज, परिवार आदि की ओर से अथवा स्वगत मान्यताओं की ओर से-यदि ऐसे बन्धन हों तो आवश्यक है कि पहले उन्हें दूर कर लिया जाए। तब सहज, उन्मुक्त, समुदार एवं निर्द्वन्द्व मन से-वैसे ही तन से उसका स्पर्श किया जाए; लेकिन इस स्थिति को लाना कठिन है। और उसके लिए गहरे वैचारिक और सामाजिक मन्थन-परिवर्तन की आवश्यकता है।’

खुशी की बात है कि रावी नए निज्ञापन मैत्री क्लब और नया नगर की परिकल्पना के माध्यम से यह कठिन भूमिका निभा रहे हैं। उनके तौर-तरीकों पर किसी को ऐतराज हो सकता है, लेकिन उनकी जिजीविषा की अदम्य अकुलाहट तो रेखांकित करनी ही होगी।

मैंने आरम्भ में ही कहा था; रावी एकान्त-चिन्तक हैं, पर एक आसन समाज-चेतना वह अपने निकट अपने जैसी करना चाहते हैं। ‘साख का सौदा’ आज की वणिक वृत्ति पर प्रारम्भ में अच्छा व्यंग्य करता है, किन्तु उसका अन्त आदर्शवादी है। ‘रूप का मोल’ भी यद्यपि प्रतीक-कथा है किन्तु वह आधुनिक युगबोध के निकट है। ‘चोर’ में आवश्यकतानुसार चुरानेवाली बात समाजवादी धारणा के निकट लगती है; किन्तु आगे चलकर उस चोर का नैयायिक ऋषि बन जाना, कथा को आरोपित प्रवेग दे देता है। ‘मूर्ख और महामूर्ख’ में बेहद तीखी और कण्डेस्ट बात है-जो विश्वास करता है मूर्ख है, जो नहीं करता वह उससे भी बड़ा मूर्ख है। ‘भारवाही’ में कहा गया है…जो प्रारम्भ में अरुचिकर लगनेवाली बोझ ढो लेता है वह अन्ततः सुख और समृ़द्धि का हकदार होता है एव सम्बन्धों की सही भूमिका निभा लेता है। ‘सर्वस्व का दान’ लोक-समृद्धि में संलग्न असली महत्त्वाकांक्षा का प्रतीक है। ‘नारी का नारायण’ में बन्धन और मोह के आवर्त्त को नकारा गया है।….रावी की अधिकतर लघुकथाएँ बोधकथाओं के नजदीक हैं। उनमें एक स्थापित जीवन-मूल्य है।

आज से लगभग ग्यारह वर्ष पूर्व ‘ससांस ’द्वारा आयोजित रावी अभिनन्दन समारोह में उन्होंने जो कुछ कहा था, मुझे आज भी अच्छी तरह याद है…

‘साहित्य में रसात्मकता ही नहीं उपादेयता भी होनी चाहिए।…लेखक प्रतिक्रिया में लय हो जाता है। सृजानात्मक हो प्रतिक्रिया ही लेखक का दूसरा नाम है। किन्तु वह प्रतिक्रिया सृजनात्मक हो तभी उसका महत्त्व और अस्तित्व है। वास्तविकता यह है कि जीवन का दूसरा नाम साहित्य है। इस व्यापक समाज में गन्दी नाम की कोई वस्तु नहीं है, गन्दे तो हमारे दृष्टिकोण हैं जिन्हें बदलना अभी शेष है।’

रावी ने सच ही कहा था-उनकी लघुकथाओं पर व्यापक प्रतिक्रियाएँ हुई हैं….और अगर इसी सामर्थ्य के दस लघुकथाकार भी विकसित हो जाते हैं तो उनकी चेतना को बड़ा बल मिलेगा और लघुकथा की उपेक्षितप्रायः विधा को भी एक सही आयाम।

(गुफाओं से मैदान की ओर से साभार)  

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