पिछले कई वर्षों में लघुकथा संग्रहों व लघुकथा संकलनों की बयार सी चली है और एक के बाद एक सार्थक प्रयास सामने आ रहे हैं। इन संकलनों व संग्रहों से गुज़रने के बाद यह बात तो साफ़ हुई है कि
लघुकथा साहित्य में अपने पूरे ज़ोर से दस्तक दे रही है। उसके स्वरूप में जो परिवर्तन आ रहा है उसमें कथ्य की नवीनता प्रमुख है, साथ ही आँचलिक भाषा का प्रयोग बहुतायत से हो रहा है। संवेदनाएँ खुल कर व्यक्त की जा रही हैं। यह शुभ संकेत है। प्रस्तुतीकरण में शायद कुछ प्रयोग भी हों।सबसे नवीन प्रकाशित संकलन लघुकथा अनवरत 2017 लघुकथा यात्रा का महत्वपूर्ण आयाम है। पुराने व नवीन लघुकथाकारों की रचनाएँ लिये लघुकथा विकास यात्रा की नई उपलब्धियों का दस्तावेज़ है। प्रारम्भ का लेख रचनाकारों को लघुकथा लेखन के सम्बन्ध में जागरूक करता है। सम्पादक द्वय श्री सुकेश साहनी एवं श्री रामेश्वर काम्बोज का सार्थक श्रम इस संकलन में निहित है। उन्होंने लघुकथाकारों की उत्तम रचनाओं का चयन कर एक उल्लेखनीय संकलन को रूप दिया है। वे दोनों ही लघुकथा विधा को समर्पित हैं, लेखन, विकास, प्रसार गोया कि सभी क्षेत्रों में ख़ामोशी से संलग्न हैं।
दिवंगत रचनाकारों की रचनायें कालजयी हैं तथा इस अंक की उपलब्धि हैं। ख्यातिप्राप्त लघुकथाकारों की समृद्ध रचनाएँ सार्वकालिक हैं तथा नई पीढ़ी को अच्छे लेखन के लिए उत्साह प्रदान करती हैं, साथ ही मार्ग दर्शन भी करती हैं। इन रचनाओं में हानि (आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री) आम आदमी (शंकर पुणताम्बेकर) चलोगे (रमेश बतरा) सूखे पेड़ की हरी शाख (जगदीश कश्यप) चिंगारी (विक्रम सोनी) पेट (पारस दासोत) माँ (सतीश राज पुष्करणा) दो बूँद ज़िंदगी (रामकुमार आत्रेय) एक गरम रात (डॉ. उपेन्द्र प्रसाद राय) बताया गया रास्ता (डॉ. कमल चोपड़ा) बिगबॉस (माधव मागदा), फ़र्क पड़ेगा (मुरलीधर वैष्णव) ,इंतज़ाम (राजेश उत्साही) प्रमुख हैं। ये रचना. कथ्य, संवेदना, प्रस्तुतीकरण व भाषा में श्रेष्ठ हैं।
अब बात उठती है कुछ अन्य पुराने और नए रचनाकारों की, अपने भरपूर प्रयासों के साथ वे इस अंक में भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। प्रस्तुतीकरण, कथ्य व संवेदना की दृष्टि से उन लघुकथाओं में सूद समेत, मरहम (दीपक मशाल) अँधेरा (अनिता मंडा) आँखों देखी (प्रभात दुबे) अपरिपक्व (चंद्रेश कुमार छतलानी) माँ की फ़ोटो (गौतम कुमार सागर) फूल, अशुभ (डॉ. पद्मजा शर्मा) वृद्धाश्रम.को.इन (डॉ. पूरन सिंह) जगह (सुधीर द्विवेदी) संवाद (सतीश राठी) मैं बंधन मुक्त (सत्या शर्मा कीर्ति) भरोसा, चाबी का खिलौना (विभा रश्मि) भीड़ (सारिका भूषण) सच्ची सुहागन (सविता मिश्रा) अप्रत्याशित (नीरज सुधांशु) नज़राना (श्याम बाबू) सपनों का गुलमोहर (कमल कपूर) राजा नंगा है (संध्या तिवारी) विलुप्तता (कांता रॉय) आस्था (त्रिलोक सिंह ठकुरेला) हड़ताल का अर्थ (धीर मौर्य) उल्लेखनीय हैं।
भाषा के सौंदर्य की नज़र से अँधेरा (अनिता मंडा) संवाद (सतीश राठी) मैं बंधन मुक्त (सत्या शर्मा कीर्ति) चाबी का खिलौना (विभा रश्मि) नज़राना (श्याम बाबू) सपनों का गुलमोहर (कमल कपूर) कथाएँ उल्लेखनीय हैं।
अंत में बस इतना ही कि संकलन सार्थक बन पड़ा है कथ्य की नवीनता, ताज़गी, भाषा का सौंदर्य दृष्टिगत है। प्रस्तुतीकरण में प्रयोग नहीं हैं। इक्का-दुक्का कथाओं को छोड़ कर व्यंग भी नहीं है।संकलन का मुखपृष्ठ आकर्षक है। पेपर व प्रिंटिंग में गुणवत्ता है। श्री भूपाल सूद जी ने गुरुतर भार उठा रखा है, आगे भी उनसे अच्छे साहित्य की उम्मीद है।
-0- लघुकथा अनवरत : सम्पादक द्वय-सुकेश साहनी-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’,पृष्ठ: 284; मूल्य: 600 रुपये;संस्करण:2017,प्रकाशक-अयन प्रकाशन 1/20,महरौली , नई दिल्ली-110030