नवम्बर 2026

संचयनलघुकथाएँ     Posted: November 1, 2026

1-दाँत खुरचनी

वर्षों से विदेश में रह रहे बेटे को अपनी माँ से मिलने का मन हुआ और वह हिन्दुस्तान आ गया। अपने बेटे को अनायास सामने देखकर माँ भाव विभोर हो गई। उसने उसे अपने गले से लगा लिया और उसके सिर पर हाथ फेरने लगी। तभी बेटे ने अपनी जेब से एक डिब्बी निकाली और अपनी माँ को देते हुए बोला-‘‘रख लो माँ सोने की है, मैं तुम्हारे लिए ही लेकर आया हूँ।’’ माँ ने डिब्बी खोलकर देखी और जोर से हँस पड़ी। हँसते समय उसका खुली हुई डिब्बी सा पोपला खुला हुआ मुँह दिख रहा था। उसके हाथों में सोने की दाँत खुरचनी दबी हुई थी।

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2-सिक्का

 ‘‘अंशुल, चलो बेटा मंदिर चलते हैं।’’ हाथ में पूजा की थाली लिए रीना ने कहा।
 ‘‘लेकिन मम्मी प्रॉमिस करो कि मंदिर की दान पेटी में सिक्का मैं ही डालूँगा।’’
‘‘ठीक है, तुम ही सिक्का चढ़ाना, लेकिन ध्यान रहे, कल की तरह सिक्का गुमा मत देना।’’
‘‘बिलकुल नहीं गुमाऊँगा।’’ कहते हुए अंशुल ने अपनी मम्मी से दस रुपए का सिक्का लेकर अपनी जेब में रख लिया और दोनों मंदिर में आए। रीना पूजा में व्यस्त हो गई। थोड़ी देर बाद उसने अंशुल से कहा-‘‘बेटा सिक्का दान-पेटी में डालो।’’
‘‘सिक्का तो गुम गया।’’
‘‘अंशुल झूठ मत बोलो, सच-सच बताओ, सिक्के का तुमने क्या किया?’’
‘‘नहीं बताऊँगा।’’
‘‘तुमने उन पैसों से जरूर चॉकलेट खा ली होगी।’’ रीना का गुस्सा सातवें आसमान पर था। उसने घर आकर अंशुल को पीटना शुरू कर दिया। तभी उसके पापा राहुल भी आफिस से आ गए। अंशुल दौड़ता हुआ राहुल से लिपटकर जोर- जोर से रोने लगा।
‘‘रीना आखिर बात क्या है, तुम इसको जानवरों की तरह क्यों पीट रही हो?’’ राहुल अंशुल को बचाते हुए बोला।
‘‘आपका लाड़ला बहुत झूठ बोलने लगा है। मैं पिछले कई दिनों से देख रही हूँ, यह मंदिर में चढ़ाने के नाम पर सिक्का मुझसे ले तो लेता है लेकिन बाहर जाकर चॉकलेट खा लेता है।’’ रीना चिल्लाकर बोली।
‘‘अंशुल, तुम्हारी मम्मी सच कह रही हैं क्या?’’
‘‘हाँ पापा, मम्मी यह तो सच कह रही हैं कि मैं उनसे सिक्का ले लेता हूँ लेकिन मैं चॉकलेट नहीं खाता हूँ।’’

‘‘तो फिर वो पैसे कहाँ गए ?’’ राहुल ने अंशुल को दुलारते हुए पूछा।
अंशुल सिसकते हुए बोला- ‘‘पापा मंदिर के बाहर एक बूढ़ी दादी बैठी रहती हैं, उन्हें कोई भी कुछ खाने के लिए नहीं देता, वो बेचारी अक्सर भूखी बैठी रहती हैं। मैं जब भी मंदिर जाता हूँ, तो उन्हें वो दस रुपये का सिक्का दे देता हूँ; ताकि वो कुछ खा लें। पापा भगवान तो किसी से कभी भी कुछ नहीं माँगते हैं, फिर भी लोग उनको ढेर सारा प्रसाद और पैसे चढ़ाते रहते हैं; लेकिन वो बूढ़ी दादी सभी से माँगती रहती हैं फिर भी उन्हें कोई कुछ नहीं देता है।’’
अंशुल का मासूम सा जवाब सुनकर रीना का मन आत्मग्लानि से भर उठ और उसकी आँखों से अश्रुधारा फूट पड़ी।

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3-बायपास

तेजस्व अपनी ससुराल इन्दौर से सपत्नीक अपने घर जबलपुर लौट रहा था। भोपाल के नजदीक बायपास पर उसने अपनी कार के ड्राइवर से बोला- ‘‘भोपाल सिटी के अंदर गाड़ी ले चलो। अम्मा-बाबूजी भइया के पास हैं। उनसे मिलते हुए चलेंगे। एक साल हो रहा है, दीवाली पर उनको भइया के पास छोड़कर आए थे।’’ तेजस्व की बात सुनकर रचना एकदम भड़क गई । वह तुरन्त तेजस्व से बोली ‘‘आपको समझ में नहीं आता है क्या….? अपना बिट्टू घर में अकेला है, पड़ोसी कब तक उसको देखेंगे । अम्मा बाबूजी से मिलने जाओगे, तो बहुत देर हो जाएगी ना, नहीं अभी सीधे जबलपुर ही जाएँगे।’’

गाड़ी अपनी रफ्तार से भोपाल शहर को पीछे छोड़ते हुए बायपास से जबलपुर की तरफ जा रही थी। तेजस्व रचना से बोला कि लगता है खून के रिश्ते भी अब बायपास से चल रहे हैं। वह अपनी अम्मा-बाबूजी को याद करते हुए चुपचाप बैठा हुआ था। तभी उसके बड़े भाई का फोन आ गया।
‘‘तेजस्व, अम्मा-बाबूजी तुमको बहुत याद कर रहे हैं, तुम मिलने आ जाओ न।’’
‘‘भइया, अभी मैं बाहर हूँ। नेटवर्क ठीक से नहीं मिल रहा है सो अभी अम्मा- बाबूजी जी से बात भी नहीं हो पाएगी। घर पहुँचकर सुबह बात कर लूँगा।’’
तेजस्व ने अपना फोन बंद कर दिया और अपनी गीली आँखें पोंछने लगा। उसने तिरछी नजर से रचना की तरफ देखा। वो भाव शून्य होकर आँखें बंद किए हुए थी।

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4-समर्पित

सुबह फोन पर घंटी आई। धीरज ने अलसाते हुए बिस्तर पर ही फोन उठा लिया। फोन पर उसकी साली ने कहा-‘‘जीजाजी, माँ की तबियत ज्यादा बिगड़ गई है। वो जीजी को याद कर रही हैं।’’
‘‘ठीक है, मैं शालनी को भेज देता हूँ लेकिन मैं अभी नहीं आ सकता हूँ। मेरी माँ भी लम्बे समय से बिस्तर पर है।’’
धीरज ने फोन रखते हुए शालनी को आवाज दी। शालनी आ गयी तो उसने बताया-‘‘शालनी, तुम्हारी छोटी बहिन का फोन था। वहाँ माँ की तबियत ठीक नहीं है। तुम आज ही मायके चली जाओ।’’
‘‘नहीं मैं अभी कैसे जा सकती हूँ। यहाँ माँ जी बिस्तर पर हैं। उनकी देख-रेख कौन करेगा?’’
‘‘इस बात की चिन्ता तुम बिल्कुल मत करो। मैं हूँ न यहाँ पर, मैं मैनेज कर लूँगा।
 ‘‘आप समझिए। माँ जी को नहलाना-धुलाना सभी कार्य आप कैसे कर पाएँगे?’’
‘‘अरे..ऽऽ तुम समझ क्यों नहीं रही। वहाँ से फोन आया था तो तुमको जाना चाहिए। तुम जल्दी तैयारी करो जाने की वहाँ।’’
‘‘देखिए वहाँ मेरी दो बहिनें और जीजाजी हैं उसके पास। वे सम्हाल रहे हैं न मेरी माँ को, लेकिन यहाँ आप इनकी इकलौती संतान हैं। मेरा यहाँ होना जरूरी है। मैं माँ जी को ऐसी हालत में कैसे छोड़ सकती हूँ। आखिर माँ तो माँ होती है। मैं अपना घर छोड़कर आपके परिवार में पूरी तरह समर्पित हो चुकी हूँ। आपकी माँ की सेवा मैं अपनी माँ समझकर ही कर रही हूँ।’’
शालनी के हठी स्वभाव को धीरज भलीभांति जानता था। शालनी उसके पास से जा चुकी थी और माँ जी बिस्तर साफ कर रही थी। धीरज के कानों में शालनी के शब्द गूँज रहे थे-‘‘माँ तो माँ होती है!” वह चुपचाप उठा और खुद शालनी की माँ को देखने उनके पास जाने की तैयारी करने लगा।


कुछ देर बाद वह अपनी ससुराल सासू माँ को देखने निकल गया था। रास्ते भर वह शालनी के शब्दों को बार-बार दुहरा रहा था। आखिर माँ तो माँ ही होती है।

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5-शर्मसार

‘‘सुनो जी, आपकी माँ अपने कमरे के बाहर घूमती रहती है। लगता है वो दरवाजे पर कान लगाकर हमारी बातें सुनती रहती है। यह अच्छी बात नहीं है।’’
‘‘तुम दावे के साथ कैसे कह सकती हो कि मेरी माँ ऐसा करती है।’’
अभय ने आक्रोशित होकर पूछा तो अवि सफाई देते हुए कहने लगी- ‘‘आपको अगर मेरी बात पर यकीन न हो तो, आप कुछ देर बाद खुद ही देख लेना, दरवाजे के नीचे से आती हुई रोशनी में आपको उनकी परछाई दिखेगी।’’
कुछ देर बाद अवि ने अभय को इशारा किया । अभय ने देखा तो उसे वाकई एक परछाई नजर आई। अब उसे अवि की बात पर यकीन हो गया था। उसने अवि से कहा- ‘‘तुम सच कह रही थीं। अभी सो जाओ, मैं कल सुबह माँ से इस बारे में बात करूँगा।’’ अभय को रात-भर नींद नहीं आई।

सुबह होते ही उसने दरवाजा खोला तो अवाक रह गया क्योंकि माँ दरवाजे पर अपना सिर टिकाए हुए सो रही थी। उसने आवेशित होकर कहा-“लगता है रातभर दरवाजे पर कान लगाए तुम्हारी नींद लग गई। आखिर तुम क्या चाहती हो माँ। बुढ़ापे में तुम्हारी ऐसी हरकतें देख-सुनकर मुझे शर्म आती है।’’ वह गुस्से से लाल होकर लगातार बोले जा रहा था।

माँ उसके आरोपों को सुनकर हैरान थी। उसने काँपते स्वर में कहा-“बेटा तू जो समझ रहा है, ऐसा कुछ भी नहीं है। मैं तो प्रभु भजन में अपना बुढ़ापा काट रही हूँ। तुम लोगों की बातें भला मैं क्यों सुनूँगी।’’ अवि भी उनकी बातें सुनकर जाग चुकी थी। उसने तुनककर कहा-’‘ओह, तो रातभर दरवाजे के पास बैठकर प्रभु भजन करती हो।’’

माँ अपने ऊपर लगाए जा रहे आरोप से आहत हो बोली-“बेटा, मेरे कमरे का पंखा खराब पड़ा हुआ है। रात में गरमी की वजह से मेरा हाल बेहाल हो जाता है। पसीने में तरबतर हो जाती हूँ। इधर तुम्हारे कमरे में चल रहे एसी की हवा से यहाँ कुछ ठंडक सी महसूस होती है तो कुछ राहत मिलती है और दो घड़ी चैन की नींद आ जाती है। बस इसीलिए इधर बैठ जाती हूँ।’’
माँ की बात सुनकर अभय शर्मसार हो गया। अवि भी खामोश हो उसका मुँह ताकने लगी।

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