महावीर राजी ने अपनी लघुकथाओं में पात्रों के माध्यम से अपने समय की मनुष्य विरोधी क्रूरताओं को चित्रित किया है। शिल्प की कलाकारी इन्हीं लघुकथाओं में चमक और अर्थवत्ता प्रदान करती है। प्रवाहमय भाषा लघुकथाओं को रोचक और पठनीय बनाती है, और पाठक स्वयं ही गहरे विमर्श को विवश हो जाते हैं, क्योंकि महावीर राजी की लघुकथा गुणवत्ता से पहचानी जाती हैं और उनमें समकालीन त्रासदी का बोझ और करुणा बनी रहती है, इसलिए महावीर राजी लघुकथाओं में कलात्मक अभिव्यक्ति देखने को मिलती है। इसी क्रम में मैंने लघुकथा के सशक्त हस्ताक्षर महावीर राजी की तीन लघुकथाओ का विश्लेषण प्रस्तुत करने के लिए चयन किया है, जो इस प्रकार है-
1- जेन-जी पंच…
महावीर राजी की लघुकथा ‘जेन-जी पंच… में एक टिपिकल चरित्र है शम्भू। यह पुलिस का हवलदार है, जिसे हम दिल से पसन्द नहीं करते, उसे अनजाने ही सामाजिक स्पेस देते चले जाते हैं, और एक दिन बस स्टैण्ड पर ठेला-रेहडी वालों को ही खाने-कमाने का जरिया बना लेता है, वह यह सब वह वर्दी की आड़ में करता है। संवेदनहीन होकर वह अपने विभाग को बदनाम करता है। स्थानीय ठेला-रेहडी वालों में आतंक का पर्याय बन जाता है, और जब पानी सिर से गुजरने लगता है तो मंगरू, झंटू और गोवर्धन की रेहडी तक का बढ़ता दुस्साहस डेगना की रेहडी तक आते-आते सिकुडकर दीनहीन हो जाता है।
लघुकथा सीधी-सादी शैली में इस तरह कही गई है कि उसमें अर्न्तनिहित व्यंग्य पुलिस की ओढ़ी हुई नैतिकता को तार-तार करके पुलिस की शोषक प्रवृत्ति को अभिव्यक्त करती हुई नजर आती है। जैसा कि सुकेश साहनी जी ने इस लघुकथा पर चर्चा करते हुए कहा है- ‘‘यह लघुकथा केवल पुलिस के विरुद्ध नहीं है; बल्कि गरीबी और अभाव से जुझते ठेला-रेहडी वालों को भी उतनी ही प्रमुखता से रेखांकित करती है।’’
‘जेन-जी पंच…’ लघुकथा की भाषा व शिल्प के महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता; लेकिन इस लघुकथा का समाज के अन्तर्विरोधों और शोषित वर्ग के सरोकारों का पूरी ईमानदारी से सूक्ष्म पड़ताल करना महत्त्व रखता है। यह लघुकथा समसामयिक विमर्श को आमन्त्रित करती अपनी अर्थवत्ता तलाशती नजर आती है। वरिष्ठ लघुकथाकार ‘सुकेश साहनी’ ने कथादेश के जुलाई-अगस्त 2026 अंक में महावीर राजी की इस लघुकथा को लेकर कहा है, ‘‘जेन-जी पंच… में लेखक का रचना कौशल देखते ही बनता है। पहली पंक्ति के साथ लघुकथा की विषयवस्तु और लेखक की भाषा पाठक को पलक झपकते ही लघुकथा के समापन तक बहा ले जाती है। मनोनुकूल समापान पाकर पाठक तृप्त हो जाता है।’’
(लघुकथा जेन-जी पंच… कथादेश के जुलाई-अगस्त 2026 अंक में और लघुकथा डॉब्ट कॉम के अक्टूबर अंक में प्रकाशित)
2- चिनक
चिनक लघुकथा में आरक्षण एक चिनक की तरह सामने आता है। इसका संदर्भ है सामान्य वर्ग का सामान्य होना व्यवहारतः बहुत मुश्किल है। आरक्षण के सम्बन्ध में उसकी सामान्य होने की प्रक्रिया अत्यन्त दुरूह है। सामान्य वर्ग में पैदा होना और आरक्षण नीति को लेकर सामान्य बने रहना इतना आसान नहीं है जितना हम मानते हैं। हमारे अन्तस्थ संस्कार हमारी परम्पराएँ, हमारा स्वभाव, हमारा सांस्कृतिक परिवेश आरक्षण के कारण हमें सामान्य होते-होते अधबीच में रोक देता है।
इस लघुकथा का विशिष्ट संदर्भ यह है कि शर्मा जी सारी आजादी का उपभोग करें, जो चाहें, जैसा चाहे करें उन्हें कोई रोके-टोके नहीं; लेकिन यही सब कुछ जब दूसरा (आरक्षित वर्ग) माँगने लगे तो… लिजलिजी सवर्णी दम्भ से तिलमिला जाते हैं।
चिनक लघुकथा में शर्मा जी ऐसा चरित्र है जो नई आरक्षण नीति को सिद्धान्त और व्यवहार दोनों स्तरों पर अपनाने को तैयार नहीं हैं। जीवन के हर क्षेत्र में वे सामन्तवाद के हिमायती हैं। कमर में चिनक आ जाने से गिन्नी के सुझाव पर सुगनचन्द नेवगी (नाई) के उल्टे जन्मे बेटे का पैर अपनी कमर से छुआ लेते हैं , जिस कारण शर्मा जी के शारीरिक और मानसिक दोनों दर्द एक साथ छलक उठते हैं, जिसको महावीर राजी ने एक जादू की तरह रचा है। इसे पढ़कर ही महसूस किया जा सकता है एक लम्बे समय तक इस लघुकथा का सम्मोहन बना रहता है।
(लघुकथा ‘चिनक’ लघुकथा डॉट कॉम के फरवरी 2024 अंक में प्रकाशित)
3- नाम में क्या नहीं रखा है…
‘नाम में क्या नहीं रखा है…’ यह शीर्षक महावीर राजी की एक लघुकथा का बड़ा अजीब सा है, लेकिन पीड़ा, उपेक्षा, क्षोभ और संवेदना से भरपूर मार्मिक लघुकथा है, जो पाठक को झकझोर देती है।‘नाम में क्या नहीं रखा है…’ कोठी के नौकर के नाम से अभिजात्य की तुलना के क्रम में विभिन्न नामों का मार्मिक उल्लेख है। लघुकथाकार के भीतर का जोश शुरू होता है- कोठी पर लगी नेम प्लेट से- यजुवेन्द्र प्रताप सिंह, संयुक्त सचिव, समाज कल्याण मंत्रालय। जिसमें सामाजिक समरसत्ता व न्याय के लिए कार्य होता है।
अम्मा बाबू जी अपने अफसर बेटे की कोठी पर आए हैं, वहाँ बेटा सभी का परिचय कराता है। अम्मा की नजरें लम्बे-लम्बे सफेद झबरैले बालों वाले पिल्ले पर गई, तो अम्मा उसे कुत्ता कह देती है, जिससे पिल्ला कूँ कूँ करता गुर्रा उठता है, और पोती उसका नाम टाइगर बताती है, साथ ही साथ दादी से कहती है कि उसे टाइगर बोलो।
‘‘ओके-ओके, हैलो टाइगर!’’ अम्मा ने टाइगर को गोद में लेकर पुचकारा। और अम्मा यह कोठी का नौकर है। क्या नाम है रे? बाबू जी ने पूछा, तो इसके पहले कि नौकर हुलसकर बता पाता यजुवेन्द्र बोल पड़ा, ‘‘नौकर तो नौकर ही होता है न पापा। नौकर का क्या तो नाम और क्या धाम!’’
पाठक यजुवेन्द्र के व्यवहार से समझ जाता है कि टाइगर पालतू कुत्ता है, जिसका नाम सम्मान से लिया जाता है, और नौकर आवारा, जिसका नाम क्या… जिसे कालिया कह दो या जाति नाई है तो नौवा… कहकर हाँक दो।
यजुवेन्द्र के ऐसे परिचय से सब हँसते हैं, नौकर भी ही-ही कर सूखी हँसी हँसता है; लेकिन उसके भीतर एक भट्टी धधक उठती है, जिसे वह बाथरूम में आग्नेय नजरों से बाँएँ हाथ पर गुदे ‘नित्यानंद ठाकुर’ के पिस्तई गोदने को घूरते हुए शांत करता है। ऐसी भाव संवेदना को लघुकथा में उडेल देना सहज नहीं है। लघुकथा समाज कल्याण मंत्रालय को सोचने के लिए एक प्रभावी संकेत देती है।
(लघुकथा ‘नाम में क्या नहीं रखा है…’ हंस के जनवरी 2025 अंक में और लघुकथा डॉट कॉम के अक्टूबर 2025 अंक में प्रकाशित)